नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार, 26 अगस्त से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के दूसरे दिवस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अपना व्याख्यान दिया।
ऋषियों की तपस्या और राष्ट्र का बल
सरसंघचालक जी ने कहा- विश्वकल्याण की इच्छा रखने वाले, सृष्टि के रहस्य को जानने वाले ऋषियों ने तपोदीक्षा धारण की। उन्होंने ऊपर-ऊपर की औपचारिकताओं को दूर करके दुर्धर्ष तप की दीक्षा ली और तपस्या की। उसी तपस्या से राष्ट्र का बल और ओजस उत्पन्न हुआ। उसी बल और ओज से हमारा राष्ट्र सशक्त और स्थिर बना।
इसीलिए परंपरा से हमारी संस्कृति ने हमें यह सिखाया है। हमारे पूर्वजों का आदेश है कि यह देश “प्रसूता से सकल आशा अधिकृत जन्म, नाग स्वर्ण चरित्र शिक्षा रत्न, पृथ्वी विज्ञान सर्व माना” — अर्थात यह देश प्राचीन है, पूज्य है, और मानवता का मार्गदर्शक है। बड़े भाई जैसा। इसलिए इस देश के लोग ऐसा जीवन जिएँ कि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति भारत आकर जीवन की विद्या सीखे।
जीवन में विविधता है, सृष्टि में विविधता है, परस्पर विरोध भी है। टकराव भी होता है। लेकिन यह सब विविधता अंततः एकता का आविष्कार है। इसलिए सबको मानना, सबको संभालना और सबको साथ लेकर चलना ही जीवन की विद्या है। यही हमारी विचारधारा है।
हम कहते हैं — “सर्वे सुखिनः सन्तु” — सब सुखी हों।
“सर्बत दा भला” — सबका भला हो। Maximum good of maximum people नहीं, बल्कि सबका कल्याण। यह तभी संभव है जब समन्वय स्थापित किया जाए। और समन्वय स्थापित करने के लिए मनुष्य को, क्योंकि वह बुद्धिमान है और सृष्टि का नियंता माना गया है, अपने ऊपर संयम लाना पड़ेगा। त्याग करना पड़ेगा।
कबूतर और बाज की कथा
सरसंघचालक जी ने एक कथा का उदाहरण देते हुए कहा— एक कथा है कबूतर और बाज की।
बाज कबूतर का भक्षक है। एक बार बाज कबूतर का पीछा करने लगा। कबूतर भागकर शिबि नामक राजा की शरण में गया। राजा ने पहचान लिया कि यह कबूतर भयभीत है, इसके पीछे बाज लगा है। उसने कबूतर को छुपा लिया।
बाज राजा के पास पहुँचा और बोला — “राजन! एक कबूतर यहाँ आया है। मैं भूखा हूँ। वह मेरा आहार है। उसे आपने छिपा रखा है। उसे छोड़ दीजिए।”
राजा ने कहा — “वह शरणागत है। उसकी रक्षा करना मेरा धर्म है। मेरी प्रजा की रक्षा करना मेरा धर्म है। मैं तुम्हें उसे खाने नहीं दूँगा।”
अब देखिए — सृष्टि में विविधता है, विरोध भी है। एक ओर बाज, दूसरी ओर कबूतर। केवल बुद्धि और तर्क से चलें तो समाधान क्या होगा? या तो कबूतर मरे या बाज भूखा मरे।
बाज ने राजा से कहा — “आप धर्म की दुहाई दे रहे हैं, लेकिन मुझे भी तो प्रकृति ने धर्म दिया है — भक्षण का। यदि मैं भोजन नहीं करूँगा, तो तुम्हारी तरह शाक-सब्ज़ी खाकर तो जीवित नहीं रह सकता। आप मेरे धर्म की भी हानि कर रहे हैं।”
राजा ने कहा — “तुम्हारी बात सही है। बिना भोजन किए तुम्हारा जीवन नहीं चल सकता। प्रत्येक का जीवन बचाना ही धर्म है। तो तुम्हारा भी धर्म है, कबूतर की रक्षा करना मेरा भी धर्म है। इसलिए समाधान यह है कि कबूतर का मांस तुमको नहीं मिलेगा, परंतु उसके वजन के बराबर मैं अपना मांस काटकर तुम्हें दूँगा।”
सरसंघचालक जी ने आगे कहा- यही धर्म है… धर्म का अर्थ है — सबका कल्याण। जहाँ दुःख उत्पन्न होता है, वह धर्म नहीं है। धर्म को निभाने के लिए त्याग करना पड़ता है। धर्म की रक्षा करने से संपूर्ण सृष्टि की रक्षा होती है। विविधता का संरक्षण भी होता है और उसका समुचित प्रबंधन भी।
आज का विश्व और भौतिकवाद
उन्होंने कहा- आज का विश्व देखें तो यह बात भुला दी गई है। लगभग 300–350 वर्षों से व्यक्तिवाद और उपभोगवाद का अतिरेक हुआ है। भौतिकवाद और उपभोक्तावादी दृष्टिकोण के कारण जीवन की विद्या भटक गई है। उसमें भद्रता और संस्कार नहीं रहा।
महात्मा गांधी ने सात सामाजिक पाप बताए थे —
- Wealth without work – बिना श्रम की संपत्ति।
- Pleasure without conscience – विवेकहीन भोग।
- Knowledge without character – चरित्रहीन ज्ञान।
- Commerce without morality – नैतिकता विहीन व्यापार।
- Science without humanity – मानवता विहीन विज्ञान।
- Religion without sacrifice – त्यागहीन धर्म।
- Politics without principles – सिद्धांतहीन राजनीति।
आज ये सातों पाप संसार में सर्वत्र बढ़ रहे हैं। उपाय क्या है?
उपभोगवाद का संकट
उपाय पर बात करते हुए उन्होंने कहा- यदि उपभोग ही जीवन का लक्ष्य है, यदि भौतिकता से परे कोई सत्य नहीं है, तो जीवन का कोई अर्थ नहीं बचता। जन्म और मृत्यु — इन दो सीमाओं के बीच जीना है। न जन्म अपने वश में है, न मृत्यु। बीच का समय केवल उपभोग में गँवाना हो तो यही होगा कि कोई किसी का गला काटे, किसी के पेट पर पैर रखे और अपना सुख साधे। यही जंगल का राज है।
आज दुनिया में यही हो रहा है। अपने उपभोग को ही प्रमुख मानकर बाकी का क्या होगा, इसकी चिंता नहीं। इसी कारण विकास के साथ-साथ पर्यावरण की हानि हो रही है और मानव समाज संकट में पड़ रहा है।
विश्व में समस्या और कलह
सरसंघचालक जी ने कहा कि दुनिया में जो सारी समस्या और कलह दिखाई दे रही है, वह नई नहीं है। पहले महायुद्ध के बाद लीग ऑफ नेशंस बनी। दूसरा महायुद्ध हुआ, तब यू.एन.ओ. (संयुक्त राष्ट्र संघ) बना। तीसरा महायुद्ध प्रत्यक्ष रूप से शायद न हो, पर यह कहना कठिन है कि वह नहीं चल रहा है। आज दुनिया में अशांति है, कलह है, कट्टरपन बढ़ रहा है।
कट्टरता और नया संकट
उन्होंने कहा- जीवन में किसी प्रकार की भद्रता या संस्कार न हो, ऐसी इच्छा रखने वाले लोग इस कट्टरता का प्रचार कर रहे हैं। जो हमारे मत के विरोध में बोलेगा, उसे “कैंसल” कर देंगे — यह नया शब्द भी प्रचलित हो गया है। यह बहुत बड़ा संकट है। सब देशों पर, अगली पीढ़ी पर इसका प्रभाव पड़ रहा है। बड़े-बड़े लोग और अभिभावक चिंतित हैं। क्यों..? क्योंकि जोड़ने वाला तत्व नहीं है। हम सब अलग-अलग हैं। पर्यावरण का नाश और विकास के बीच मेल नहीं बैठ रहा। चर्चा बहुत होती है, उपाय भी सुझाए जाते हैं, लेकिन परिणाम सामने नहीं आते। क्यों? क्योंकि जब तक मनुष्य अपनी आवश्यकताओं पर संयम नहीं डालेगा, तब तक उपाय सफल नहीं होंगे। संयम करना ही पड़ेगा।
धर्म ही समाधान
सरसंघचालक जी ने कहा- दुनिया को अपना दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा। और वह दृष्टिकोण है — धर्म। यहाँ धर्म का अर्थ केवल रिलीजन नहीं है। धर्म पूजा-पाठ, खान-पान आदि से परे है। धर्म वह है जो मोक्ष की ओर ले जाने वाला मार्ग है। विभिन्न रिलीजन उसी धर्म तक पहुँचने के साधन हैं। लेकिन इन सबको चलाने वाला, इन सबके पीछे का मूल तत्व धर्म है।
धर्म में विविधता का स्वीकार है। धर्म संतुलन सिखाता है —
- मुझे भी जीना है, प्रकृति को भी जीना है।
- व्यक्ति को भी जीना है, समाज को भी जीना है।
- सबकी सत्ता है।
अति-व्यक्तिवाद नहीं चाहिए, लेकिन व्यक्ति का महत्व भी है। व्यक्ति की सत्ता है, समाज की सत्ता है, सृष्टि की सत्ता है। सबकी अपनी जगह है, अपनी मर्यादा है। इन्हें पहचानकर संतुलित ढंग से जीवन जीना ही धर्म है। धर्म का यही नियम है — संतुलन।
मध्यम मार्ग की परंपरा
उन्होंने कहा- यह धर्म हमें किसी एक छोर पर जाने नहीं देता। इसलिए हमारे यहाँ “मध्यम मार्ग” की परंपरा रही है। अपने जीवन को धार्मिक जीवन बनाना और फिर उसे सारी दुनिया को देना — यही आज की आवश्यकता है।
आज की दुनिया और भारतवर्ष
सरसंघचालक जी ने कहा- आज की दुनिया संबंधों को तरस रही है। और संबंध बनाए भी जाते हैं, देखे भी जाते हैं, माने भी जाते हैं। दुनिया का सबसे आगे बढ़ा हुआ देश इस परंपरा का धनी है — और वह है भारतवर्ष। क्योंकि भारतवर्ष की परंपरा ही यही है।
स्वामी विवेकानंद कहा करते थे — “Every nation has a message to deliver, a mission to complete, a destiny to fulfil.” भारत की नियति (destiny) क्या है? वे कहते थे — भारत धर्मप्राण देश है। समय-समय पर दुनिया को धर्म देना भारत का कर्तव्य है।
आर्थिक उन्नति और संकट
उन्होंने कहा- आज की समस्याओं का समाधान भी धर्म-दृष्टि से ही होगा। आर्थिक उन्नति का प्रश्न आता है, परंतु आर्थिक उन्नति पर्यावरण के लिए विनाशकारी सिद्ध हो रही है। आर्थिक उन्नति के कारण गरीब और अमीर के बीच की दूरी सर्वत्र बढ़ रही है। दक्षिण के देश शिकायत करते हैं कि उनका शोषण किया जा रहा है। चर्चा होती है, उपाय सुझाए जाते हैं, कभी-कभी लीपापोती जैसे समाधान भी होते हैं, पर समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है।
पर्यावरण, शांति और असफल प्रयास
उन्होंने कहा- पर्यावरण की चर्चा होती है, उदारता की चर्चा होती है, शांति की चर्चा होती है। अच्छे-अच्छे लोग इस दिशा में कार्य कर रहे हैं, परंतु परिणाम नगण्य हैं। क्यों? क्योंकि जब तक हम इसे प्रामाणिकता से नहीं सोचेंगे, जब तक संयम और संतुलित विचार अपने जीवन में नहीं उतारेंगे, तब तक समाधान संभव नहीं है। इसके लिए धर्म-दृष्टि को समझना आवश्यक है।
धर्म एक शाश्वत तत्व
सरसंघचालक जी ने कहा- यह धर्म किसी विशेष समाज की खोज नहीं है। यह सृष्टि के प्रारंभ से है, जैसे गुरुत्वाकर्षण है। आप मानें या न मानें, गुरुत्वाकर्षण तो है ही। यदि आप उसे मानकर चलेंगे तो जीवन सरल होगा, नहीं मानेंगे तो ठोकर खाएँगे।
इसी प्रकार धर्म भी है। एक छोटे से कण के स्फोट से यह विशाल विश्व बना। उसकी गति को पहचानना और उसके अनुरूप जीवन चलाना ही धर्म है। यह प्राकृतिक नियम है। धर्म का पालन करने के लिए अनुशासन, संयम और त्याग लाना पड़ता है। यही धर्म विश्वधर्म है।
हिंदू समाज जब संगठित होगा, तभी वह इस धर्म को दुनिया तक पहुँचा सकेगा। विश्वधर्म ही विश्वशांति का प्रवर्तक है।
धर्म का अर्थ कन्वर्जन नहीं
उन्होंने कहा- धर्म को दुनिया में पहुँचाने का अर्थ यह नहीं कि हम सबको जाकर कन्वर्जन कराएँ। धर्म का अर्थ कन्वर्जन नहीं है। धर्म तो एक सत्य तत्व है, जिसके आधार पर सब चलता है। यही स्वभाव है, यही कर्तव्य है। जैसे — पानी का धर्म है तरलता, अग्नि का धर्म है जलाना।
इस प्राकृतिक गति को पहचानकर मनुष्य-जीवन का पुनर्निर्माण करना होगा। यही धर्म से चलना है। धर्म उपदेश से नहीं, आचरण से फलता है। न प्रिंटिंग से, न कन्वर्जन से, बल्कि उदाहरण और अभ्यास से। इसीलिए भारतवर्ष का लाइफ-मिशन है — ऐसा जीवन जीना, ऐसा आदर्श खड़ा करना कि दुनिया उसका अनुकरण कर सके। हर देश अपने-अपने स्वभाव और विविधता के अनुसार उस मॉडल का पुनर्निर्माण कर सके।
















