नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार, 26 अगस्त से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के दूसरे दिवस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा- हिंदुत्व किसी संकीर्णता का नाम नहीं है, बल्कि इसका सार सत्य, प्रेम और अपनापन है। यही भावना भारत को विश्व के लिए बड़े भाई के रूप में प्रस्तुत करती है, ताकि पूरी दुनिया जीवन की विद्या भारत से सीख सके।
धर्म का अर्थ और मध्यम मार्ग
सरसंघचालक जी ने स्पष्ट किया कि धर्म का अर्थ केवल पूजा, पंथ या कर्मकांड नहीं है। धर्म का वास्तविक अर्थ है विविधता को स्वीकार करना और संतुलित जीवन जीना। यही संतुलन भारत की परंपरा का मध्यम मार्ग है, जो दुनिया को शांति और समन्वय की राह दिखाता है।
महात्मा गांधी की चेतावनी और आज की स्थिति
उन्होंने कहा कि बीते ढाई-तीन सौ वर्षों में जड़वाद और उपभोक्तावादी विचारों ने जीवन की भद्रता को कम किया है। महात्मा गांधी द्वारा बताए गए सात सामाजिक पाप— काम बिना परिश्रम, आनंद बिना विवेक, ज्ञान बिना चरित्र, व्यापार बिना नैतिकता, विज्ञान बिना मानवता, धर्म बिना बलिदान और राजनीति बिना सिद्धांत— आज और अधिक बढ़ गए हैं।
संघ की 100 साल की यात्रा और निष्ठा
उन्होंने कहा- संघ की यात्रा उपेक्षा और विरोध के वातावरण में शुरू हुई। स्वयंसेवकों ने अपने त्याग और निष्ठा के बल पर संघ को इन कठिन कालखंडों से पार लगाया। कई बार विरोध और कटु अनुभव आए, लेकिन स्वयंसेवकों के हृदय में संपूर्ण समाज के लिए शुद्ध सात्त्विक प्रेम ही रहा और वही आज भी संघ कार्य का आधार है।
अनुकूल समय और स्वयंसेवकों की सोच
सरसंघचालक जी ने कहा कि अब समय अनुकूल है और समाज की मान्यता भी है। विरोध बहुत कम हो गया है, लेकिन फिर भी स्वयंसेवक सुविधाभोगी नहीं बनते। उनका लक्ष्य है—संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन। इसके लिए संघ चार सिद्धांतों पर कार्य करता है: सज्जनों से मैत्री, असज्जनों की उपेक्षा, अच्छे कार्य पर आनंद और दुर्जनों के प्रति करुणा।
संघ कार्य : हिम्मत वालों का काम
उन्होंने कहा- संघ में स्वयंसेवकों को कोई प्रोत्साहन (इंसेंटिव) नहीं मिलता, बल्कि कई बार व्यक्तिगत हानि भी उठानी पड़ती है। लेकिन इस निस्वार्थ सेवा से उन्हें जीवन में सार्थकता और आनंद मिलता है। यही प्रेरणा उन्हें सतत परिश्रमशील बनाए रखती है। लोग जब पूछते हैं कि संघ में आकर क्या मिलेगा, तो डॉ. भागवत का उत्तर है—“कुछ नहीं मिलेगा, बल्कि जो है वह भी चला जाएगा। हिम्मत है तो करो।” संघ का कार्य केवल निस्वार्थ सेवा है, जिसमें व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि समाज और विश्व के कल्याण का भाव है।
संघ का ध्येय और सात्त्विक प्रेम
सरसंघचालक जी ने बताया कि संघ का ध्येय व्यक्तिगत नहीं है। यह एक भव्य लक्ष्य की ओर सामूहिक यात्रा है। स्वयंसेवकों का संबंध शुद्ध सात्त्विक प्रेम पर आधारित है, जो मोह का नहीं बल्कि समाज और विश्व कल्याण का संबंध है। यही उन्हें निस्वार्थ सेवा के पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
















