सरसंघचालक परंपरा
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होम संघ @100

RSS  के 100 वर्ष : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सरसंघचालक परंपरा और संगठन की जीवंतता

अब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छह सरसंघचालक हुए हैं। आद्यसरसंघचालक थे डॉ. हेडगेवार। इसके बाद क्रमश: श्रीगुरुजी, श्री बालासाहब देवरस, श्री रज्जू भैया और श्री कुप्.सी. सुदर्शन ने सरसंघचालक के नाते स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया। वर्तमान में श्री मोहनराव भागवत सरसंघचालक के रूप में संघ विचार परिवार के अभिभावक हैं

Written byविजय कुमारविजय कुमार
Aug 27, 2025, 01:26 pm IST
in संघ @100

संघ एक विकासशील संगठन है। केवल शाखा या विविध कार्य ही नहीं, तो अनेक परंपराएं भी स्वयं विकसित होती चलती हैं। पारिवारिक संगठन होने के कारण यहां हर काम के लिए संविधान नहीं देखना पड़ता। जो लोग संघ की कार्यप्रणाली को जानते हैं, उनके लिए यह सामान्य बात है।

विजय कुमार
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ

यदि हम सरसंघचालक परंपरा को देखें, तो परम पूज्य डॉ. हेडगेवार को उनके सहयोगियों ने बिना उनकी जानकारी के सरसंघचालक बनाया। डॉक्टर जी ने इस अवसर पर कहा, ‘‘आपका आदेश मानकर मैं यह जिम्मेदारी ले रहा हूं; पर जैसे ही मुझसे योग्य कोई व्यक्ति आपको मिले, आप उसे यह दायित्व दे देना। मैं एक सामान्य स्वयंसेवक की तरह काम करूंगा।” जब उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया, तो उन्होंने अपने सहयोगियों से परामर्श कर अपने ऑपरेशन से पूर्व सबके सामने श्रीगुरुजी को बता दिया कि मेरे बाद आपको काम संभालना है। इस प्रकार संघ को द्वितीय सरसंघचालक की प्राप्ति हुई।

जब श्रीगुरुजी को लगा कि अब यह शरीर दीर्घकाल तक साथ नहीं दे पाएगा, तो उन्होंने भी अपने सहयोगी कार्यकर्ताओं से परामर्श किया और एक पत्र द्वारा श्री बालासाहब देवरस को नवीन सरसंघचालक घोषित किया। वह पत्र उनके देहांत के बाद खोला गया था। इससे यह धारणा बनी कि यह जिम्मेदारी आजीवन होती है तथा पूर्व सरसंघचालक अपनी इच्छा से किसी को भी नियुक्त कर सकते हैं। संघ विरोधी इसे एक गुप्त संगठन तो कहते ही थे; पर अब उन्होंने इसे अलोकतांत्रिक भी मान लिया।

श्री बालासाहब देवरस ने अपने सामने ही नए सरसंघचालक की नियुक्ति की। उन्होंने स्वास्थ्य बिगड़ने पर अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) को नया सरसंघचालक घोषित किया। रज्जू भैया और सुदर्शन जी ने भी ऐसा ही किया। इस प्रकार संघ में एक नई परंपरा विकसित हुई। इस घटनाक्रम को एक और दृष्टिकोण से देखें। जब बालासाहब ने दायित्व से मुक्ति ली, तब उनका स्वास्थ्य बहुत खराब था। वे पहिया कुर्सी पर ही चल पाते थे। मुंह में बार-बार थूक भर जाता था। बोलने में बहुत कठिनाई होती थी। उनके लिखित संदेश ही कार्यक्रमों में पढ़े जाते थे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष : राजपथ से लालकिले तक संघ

अपने दैनिक काम वे किसी के सहयोग से ही कर पाते थे। अतः उनकी दायित्वमुक्ति को सबने सहजता से लिया। दूसरी ओर रज्जू भैया ने जब कार्यभार छोड़ा, तो वे पूर्ण स्वस्थ तो नहीं; पर प्रवास करने योग्य थे। उन्हें भाषण देने में असुविधा होती थी; पर बातचीत वे सहजता से करते थे। दायित्वमुक्त होकर भी वे प्रवास करते रहे। अर्थात् यदि वे चाहते, तो कुछ वर्ष और यह जिम्मेदारी निभा सकते थे; पर उन्होंने उचित व्यक्ति पाकर कार्यभार छोड़ दिया। पांचवें सरसंघचालक श्री कुप्. सी. सुदर्शन दायित्वमुक्ति तक काफी स्वस्थ थे।

प्रवास एवं सार्वजनिक भाषण में उन्हें कुछ कठिनाई नहीं थी; पर जब उन्हें लगा कि श्री मोहनराव भागवत के रूप में एक सुयोग्य एवं ऊर्जावान कार्यकर्ता सामने है, तो उन्होंने जिम्मेदारी छोड़ दी। अर्थात् उन्होंने वही किया, जो डॉ. हेडगेवार ने पदभार लेते समय कहा था कि जब भी मुझसे अधिक योग्य कार्यकर्ता आपको मिले, आप उसे सरसंघचालक बना दें। यह है एक परंपरा में विश्वास और दूसरी का विकास।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय नागपुर में डॉ. हेडगेवार स्मृति मंदिर में श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

पुरानी नींव, नया निर्माण

एक अन्य दृष्टि से विचार करें। डॉक्टर जी का अंतिम संस्कार रेशिम बाग में हुआ। वहां उनकी समाधि (स्मृति मंदिर) है। उसका बाह्य रूप मंदिर जैसा है; पर वहां पूजा, पाठ, घंटा, भोग, आरती, प्रसाद आदि कुछ नहीं है। डॉक्टर जी की भव्य प्रतिमा तीन ओर से खुली है। अर्थात् संघ में व्यक्ति का महत्व है; पर व्यक्ति पूजा का नहीं। द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी ने देहांत से पूर्व तीन पत्र लिखे थे। दूसरे पत्र में उन्होंने कहा था कि डॉक्टर जी की तरह उनका कोई स्मारक न बनाएं। स्मृति मंदिर के सामने ही उनका अंतिम संस्कार हुआ। वहां यज्ञ ज्वालाओं के रूप में एक छोटा ‘स्मृति चिन्ह’ बना है। उस पर संत तुकाराम की वे पंक्तियां उत्कीर्ण हैं, जिनके द्वारा श्रीगुरुजी ने अपने तीसरे पत्र में सब स्वयंसेवकों से क्षमा मांगी थी। श्री बालासाहब देवरस एक कदम और आगे गए।

उन्होंने पहले ही कह दिया था कि रेशिमबाग को हमें सरसंघचालकों का श्मशान स्थल नहीं बनाना है। इसलिए मेरा अंतिम संस्कार सामान्य श्मशान में किया जाए। उनका देहांत पुणे में हुआ; पर उन्होंने नागपुर में काफी समय बिताया था। वहां उनके अनेक मित्र व सम्बन्धी थे। अतः उनकी देह को नागपुर लाकर गंगाबाई घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। रज्जू भैया का देहांत पुणे में हुआ।

उन्होंने एक बार कहा था कि जहां उनका देहांत हो, वहीं अंतिम संस्कार कर देना। ऐसा ही हुआ। स्पष्ट है कि सभी सरसंघचालकों ने स्वयं को विशिष्ट से सामान्य की ओर क्रमशः अग्रसर किया। किसी समय संघ पर मराठा, ब्राह्मणवादी और चितपावन ब्राह्मणवादी होने का आरोप लगाया जाता था; पर उत्तर प्रदेश के प्रो. राजेन्द्र सिंह और कर्नाटकवासी सुदर्शन जी के सरसंघचालक बनने के बाद इन लोगों के मुंह सिल गए। जो लोग संघ को लकीर का फकीर कहते हैं, उन्हें सरसंघचालक परंपरा का अध्ययन करना चाहिए। 100 वर्ष में इसमें अनेक परिवर्तन हुए हैं। यह संघ की जीवंतता का प्रतीक है।

Topics: 100 years of the Sanghसामाजिक और सांस्कृतिक बदलावSarsanghchalak traditionRSSShri Balasaheb DeorasKup.C. Sudarshantradition of leadership of the Sanghfounder of the SanghDr. Hedgewarfunctioning of the SanghMohanrao Bhagwatसंघ के संस्थापकShri Gurujiसंघ की कार्यप्रणालीRajju Bhaiyaसंगठन का विकासपाञ्चजन्य विशेषसामूहिक नेतृत्व
विजय कुमार
विजय कुमार
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ [Read more]
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