इतिहास की विकृति या चिह्नित षड्यंत्र !
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केरल : नेताजी सुभाषचंद्र बोस को लेकर वामपंथियों का दुराग्रह नई बात नहीं

केरल राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद की कक्षा चार की पाठ्यपुस्तक में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लेकर किया गया आपत्तिजनक दावा महज एक तथ्यात्मक गलती नहीं, इतिहास को विकृत करने का प्रयास है

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 27, 2025, 07:49 am IST
inविश्लेषण, केरल

‘सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों के डर से जर्मनी भाग’ केरल सरकार के स्कूल की हैंडबुक में ऐसा दावा किया गया है। जब विवाद बढ़ा तो सरकार ने सफाई दी कि इस गलती के लिए केरल राज्य शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) का एक सदस्य जिम्मेदार है। केरल के शिक्षा मंत्री वी शिवनकुट्टी ने बयान भी दिया ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में हुई इस गलती के लिए जिम्मेदार एससीईआरटी सदस्य पर भविष्य में शैक्षणिक कार्य करने पर रोक लगाने का आदेश दिया गया है’। बहरहाल, नेताजी सुभाषचंद्र बोस को लेकर वामपंथियों का दुराग्रह नई बात नहीं है। वामपंथी पहले भी ऐसा करते रहे हैं।

दरअसल, वर्तमान विवाद केरल राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद की कक्षा चार की हैंडबुक को लेकर हुआ। भले ही सरकार विवाद बढ़ने पर इसे तथ्यात्मक गलती बता रही हो, लेकिन यदि वामपंथियों के इतिहास को देखें तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस को लेकर उनके विचार सही नहीं रहे। इस लिहाज से इतिहास को जान-बूझकर विकृत करने का गंभीर प्रयास है। सुभाष चंद्र बोस ने भारत की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके बारे में यह कहना कि वे डर से भाग गए, उनकी वीरता का अपमान है। बोस डर से नहीं, बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने और एक सैन्य मोर्चा बनाने के दृढ़ संकल्प के साथ भारत से बाहर गए थे।

पहले भी किया है अपमान

वामपंथी पहले भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस के लिए अपने मुखपत्रों में अपमानजनक कार्टून छापते थे। 1940 में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी पुस्तिका ‘बेनकाब दल व राजनीति’ में नेताजी को ‘अंधा मसीहा’ कहा गया था। उनके कामों को ‘सिद्धांतहीन अवसरवाद’ कहा गया। इसके बाद धीरे-धीरे नेताजी के प्रति कम्युनिस्ट शब्दावली हिंसक और गाली-गलौज से भरती गई। जैसे ‘काला गिरोह’,‘गद्दार बोस’, ‘दुश्मन के जरखरीद एजेंट’, ‘तोजो और हिटलर के अगुआ दस्ते’, ‘राजनीतिक कीड़े’, ‘सड़ा हुआ अंग जिसे काटकर फेंकना है’ आदि। ये तमाम विशेषण सुभाष बोस और उनकी सेना आईएनए (इंडियन नेशनल आर्मी) के लिए थे। तब कम्युनिस्ट मुखपत्रों एवं पत्रिकाओं में नेताजी के कई कार्टून छपे थे, जिससे कम्युनिस्टों की घोर अंधविश्वासी मानसिकता की झलक मिलती है (उन पर सधी नजर रखने वाले इतिहासकार स्व. सीताराम गोयल के सौजन्य से वे कार्टून उपलब्ध हैं)।

अधिकांश कार्टूनों में सुभाष बाबू को ‘जापानी, जर्मन फासिस्टों का कुत्ता या बिल्ली’ जैसा दिखाया गया है, जिससे उसका मालिक जैसे चाहे खेलता है। एक कार्टून में बोस को तोजो का मुखौटा तो अन्य में भारतवासियों पर जापानी बम गिराने वाला दिखाया गया है। ऐसे ही एक कार्टून में बोस को ‘गांधीजी की बकरी छीनने वाला’ दिखाया गया। एक कार्टून में तोजो एक गधे के गले में रस्सी डाले सवारी कर रहा है। उस गधे का मुंह बोस जैसा बना था। दूसरे में बोस को ‘तोजो का पालतू क्षुद्र बौना’ दिखाया गया था। दरअसल वामपंथियों का चरित्र ही भारत के गौरवपूर्ण इतिहास और पराक्रम को उपहास का विषय बनाकर प्रस्तुत करने वाला रहा है। आजादी के आंदोलन के दौरान वामपंथी अंग्रेजों की खुशामद में व्यस्त थे। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय कम्युनिस्टों ने ब्रिटिश साम्राज्य का समर्थन किया था।

केरल सरकार के स्कूलों की हैंडबुक (चित्र साभार, केरल कौमुदी)

समाज का दायित्व

आज जब केरल की पाठ्यपुस्तक में ऐसा तथ्य सामने आता है तो यह केवल एक राज्य या एक गलती का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह प्रश्न सम्पूर्ण भारतीय समाज के सामने खड़ा होता है। क्या हम अपने राष्ट्रीय नायकों को इस तरह बदनाम करने वालों को बिना जवाबदेह ठहराए छोड़ देंगे? यह केवल इतिहास का अपमान नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के मानस को विषाक्त करने की साजिश है। शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों को सत्य, साहस और त्याग की प्रेरणा देना होना चाहिए, न कि उन्हें गलत तथ्यों से गुमराह करना।

इसलिए यह आवश्यक है कि इस प्रकार की विकृतियों पर केवल खेद या माफी पर्याप्त न मानी जाए बल्कि कठोर और ठोस कार्रवाई हो। इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने वालों पर कानूनी और शैक्षणिक दोनों स्तरों पर प्रतिबंध लगाया जाए। यही नेताजी सुभाष चंद्र बोस की स्मृति के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी।

राष्ट्रीय नायक हैं सुभाष चंद्र बोस

नेताजी सुभाषचंद्र बोस का केवल एक ही लक्ष्य था-भारत की पूर्ण स्वतंत्रता। उनका मानना था कि भारत की आजादी की लड़ाई केवल अहिंसा और प्रार्थना से नहीं लड़ी जा सकती, बल्कि इसके लिए संगठित सैन्य शक्ति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है। उन्होंने न केवल आजाद हिंद फौज का गठन किया, बल्कि देश के भीतर और विदेशों में रह रहे भारतीयों में स्वतंत्रता की ज्योति जगाई। यह कहना कि वे ‘डर कर भाग गए’ उनका घोर अपमान है। सुभाष बोस सिर्फ एक किताब का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि एक स्थायी राष्ट्रीय नायक हैं। केरल सरकार को इस बात का जवाब देना होगा कि क्या यह महज एक चूक थी या इतिहास को विकृत करने का जान-बूझकर किया गया एक प्रयास।

महान स्वतंत्रता सेनानी के प्रति इस तरह के शब्द और तथ्यों से छेड़छाड़ को ‘त्रुटि’या चूक कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। हैंडबुक तैयार करते समय सावधानी बरती जाती है। इन्हें कई स्तरों पर जांचा जाता है। लोगों का कहना है यह ‘माकपा के नेतृत्व वाली केरल सरकार और उसकी एजेंसियों का एक प्रयोग लगता है। उन्होंने यह टटोलने की कोशिश की है कि इस तरह के ऐतिहासिक विकृतियों पर समाज कैसे प्रतिक्रिया देता है।’ नेताजी द्वारा बनाई गई आजाद हिंद फौज ब्रिटिश शासन के लिए एक बड़ी चुनौती थी और यह आज भी लोगों को प्रेरित करती है। ऐसे में केवल एक माफी और ‘भविष्य में सावधानी’ का वादा काफी नहीं है। केरल और पूरे देश के लोगों को यह जानने का अधिकार है कि ऐसी गंभीर गलती को होने ही क्यों दिया गया और इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई की जाएगी।

Topics: नेताजी सुभाष चंद्र बोसवामपंथियों के इतिहासLeftistपाञ्चजन्य विशेषभारत की आजादीnational heroIndian IndependenceGreat Freedom FighterV SivankuttyवामपंथीHistory of LeftistsNetaji Subhash Chandra Boseराष्ट्रीय नायकमहान स्वतंत्रता सेनानीवी शिवनकुट्टी
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