आज पूरी दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.) के गुणों और अवगुणों की चर्चा हो रही है। ए. आई. ने यह सिद्ध कर दिया है कि यह सिर्फ एक टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि दुनिया में बढ़ते आर्थिक विकास की एक बड़ी ताकत बन चुकी है। इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (आई.एम.एफ.) की रिपोर्ट बताती है कि ए.आई. में न सिर्फ दुनियाभर की तरक्की को तेज करने की क्षमता है, बल्कि यह उद्योग, स्वास्थ्य, शिक्षा और नवाचार जैसे कई क्षेत्रों में नए युग की शुरुआत कर रही है। हालांकि, इस तेजी से बढ़ती तकनीकी के साथ एक चुनौती भी सामने आ रही है और वह है ए.आई. को चलाने वाले डेटा सेंटर्स (यानी इंटरनेट पर मौजूद जानकारी को स्टोर और प्रोसेस करने वाले बड़े-बड़े सर्वर फार्म) की जबरदस्त बिजली खपत। मैकिन्से एंड कंपनी की रिपोर्ट इस ओर इशारा करती है कि यदि इस ऊर्जा मांग को सही दिशा में नहीं मोड़ा गया, तो यह स्थिति भविष्य में हमारे ऊर्जा संसाधनों पर दबावकारी और पर्यावरण के लिए भी एक संभावित खतरा बन सकती है।
लेकिन, यहीं भारत एक नई उम्मीद लेकर उभरता है। अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बिजली उपभोक्ता होने के बावजूद, भारत इस चुनौती को एक सुनहरे अवसर में बदलने की ओर अग्रसर है। भारत में भले ही डेटा सेंटर्स की संख्या बढ़ रही है और अधिकतर बिजली अब भी कोयले से बनती है, लेकिन इसके बावजूद भारत कोशिश कर रहा है कि ए.आई. चलाने के लिए ज्यादा से ज्यादा सौर और पवन जैसे नवीकरणीय स्रोतों से बनने वाली बिजली का इस्तेमाल हो, ताकि पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे और देश आगे चलकर ऐसी साफ तकनीक का बड़ा केंद्र बन सके।
पंजाब में ए. आई. से चला ट्रैक्टर
गत 22 जुलाई को पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पी.ए.यू.) ने अपने शोध फार्म में बिना चालक वाले ट्रैक्टरों का प्रदर्शन किया और ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जी.एन.एस.एस.) पर आधारित ऑटो-स्टीयरिंग प्रणाली का लोकार्पण किया। इस कार्यक्रम का नेतृत्व पी.ए.यू. के कुलपति डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने किया। यह प्रणाली एक अमेरिकी कंपनी द्वारा विकसित की गई है और इसे नए या पुराने ट्रैक्टर पर 3.5 लाख रुपए खर्च करके लगाया जा सकता है। डॉ. गोसल के अनुसार, ‘ऑटो-स्टीयरिंग प्रणाली एक उपग्रह-निर्देशित, कंप्यूटर-सहायता प्राप्त उपकरण है, जिसे ट्रैक्टर संचालन के दौरान स्टीयरिंग को स्वचालित करने के लिए डिजाइन किया गया है। कई उपग्रह समूहों से प्राप्त संकेतों को सेंसर और एक टचस्क्रीन कंट्रोल कंसोल के साथ जोड़कर यह प्रणाली ट्रैक्टरों को सटीक और पूर्व निर्धारित पथों पर निर्देशित करती है।’
बिजली खपत और डेटा सेंटर्स
2023 में दुनिया भर के डेटा सेंटर्स ने लगभग 500 टेरावाट-घंटे (ऊर्जा की एक इकाई, जो एक ट्रिलियन वाट-घंटे के बराबर होती है) बिजली की खपत की। यह खपत जर्मनी (550 टेरावाट-घंटे) और फ्रांस (475 टेरावाट-घंटे) जैसे विकसित देशों की कुल सालाना बिजली खपत के लगभग बराबर है। मैकिन्से एंड कंपनी का अनुमान है कि 2030 तक यह खपत बढ़कर 1,500 टेरावाट-घंटे हो सकती है। यानी लगभग भारत की मौजूदा सालाना बिजली खपत (1,557 टेरावाट-घंटे, वित्त वर्ष 2023-24) जितनी। यह दिखाता है कि आने वाले समय में सिर्फ डेटा सेवाओं को संभालने के लिए ही एक देश जितनी बिजली की जरूरत पड़ सकती है।
भारत, अमेरिका (4,000 टेरावाट-घंटे) और चीन (7,500 टेरावाट-घंटे) के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बिजली उपभोक्ता है। भारत की कुल बिजली खपत में उद्योग (41.8 प्रतिशत) और घरेलू इस्तेमाल (24.3 प्रतिशत) का सबसे बड़ा हिस्सा है। अब, तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर्स भी इसमें एक नया बड़ा योगदान देने लगे हैं।
इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (आई.ई.ई.एफ.ए.) की रिपोर्ट बताती है कि भारत में डेटा सेंटर्स की बिजली खपत तेजी से बढ़ रही है। 2024 में इनकी कुल बिजली जरूरत 1.4 गीगावाट थी, और 2030 तक यह बढ़कर 9 गीगावाट तक पहुंच सकती है। (1 गीगावाट इतनी बिजली होती है जिससे करीब 10 लाख घरों की सालाना जरूरत को पूरा किया जा सकता है।)
इस अनुमान का मतलब यह है कि अगले कुछ वर्षों में अकेले डेटा सेंटर्स ही भारत की कुल बिजली खपत का लगभग तीन प्रतिशत उपयोग करने लगेंगे और ये आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल तकनीक के विकास के साथ-साथ ऊर्जा की मांग भी जबरदस्त रूप से बढ़ेगी। देश के बड़े शहर जैसे मुंबई, बेंगलूरु, चैन्ने और नोएडा अब डेटा सेंटर्स के मुख्य केंद्र बनते जा रहे हैं। 2023 में भारत में 900 मेगावाट (1 गीगावाट=1,000 मेगावाट) की नई डेटा सेंटर क्षमता जुड़ी, जो यह दर्शाती है कि भारत में इंटरनेट, क्लाउड कंप्यूटिंग और आई. ए. से जुड़ी गतिविधियां बहुत तेज़ी से बढ़ रही हैं। अनुमान है कि 2027 तक यह क्षमता 8 गीगावाट तक पहुंच सकती है।
बिजली की बढ़ती मांग
फिलहाल भारत में लगभग 74 प्रतिशत बिजली उत्पादन कोयले जैसे पारंपरिक स्रोतों से होता है (वित्त वर्ष 2023-24)। हालांकि, इस हिस्सेदारी के 2026 तक घटकर 68 प्रतिशत होने का अनुमान है। अगर यह मांग यूं ही जारी रही, तो 2025 से 2030 के बीच ए.आई. और डेटा सेंटर्स से जुड़ी बढ़ती बिजली खपत के कारण 1.7 गीगाटन अतिरिक्त ग्रीनहाउस गैसें (यानी वे गैसें जो धरती को गर्म करती हैं) वातावरण में जा सकती हैं। यह मात्रा इटली जैसे देश के 5 साल के कुल प्रदूषण के बराबर होगी।

हालांकि बिजली की बढ़ती जरूरतें एक बड़ी चुनौती हैं, लेकिन भारत इस चुनौती को अवसर में बदलने के लिए तेजी से काम कर रहा है। 2024 तक भारत की स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़कर 203.18 गीगावाट थी। इसमें सूरज की रोशनी से बनने वाली बिजली यानी सोलर एनर्जी की हिस्सेदारी 85.47 गीगावाट है, जबकि हवा से बनने वाली पवन ऊर्जा 47.95 गीगावाट तक पहुंच गई है।
सिर्फ 2025 की पहली छमाही में ही स्वच्छ ऊर्जा से बिजली का उत्पादन 24.4 प्रतिशत बढ़कर करीब 13,443 करोड़ यूनिट तक पहुंच गया। इसका मतलब यह है कि भारत अब पारंपरिक कोयला आधारित बिजली पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहता। वह डिजिटल सेवाओं और डेटा सेंटर्स की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए साफ-सुथरे, टिकाऊ स्रोतों का सहारा ले रहा है। ये आंकड़े इस तरफ इशारा करते हैं कि भारत एक ऐसी डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, जहां ए.आई. का विकास होगा, लेकिन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना।
तेजी से होगा आर्थिक विकास
ए.आई. और स्वच्छ ऊर्जा मिलकर भारत के विकास की दिशा बदल सकती हैं और ऐसा बदलाव ज्यादा दूर नहीं है। ई.वाई. की एक रिपोर्ट के अनुसार, जनरेटिव ए.आई. (यानी ऐसी ए.आई. जो खुद से नई सामग्री जैसे टेक्स्ट, इमेज, कोड आदि तैयार कर सकती है) के प्रभाव से भारत 2029-30 तक अपनी जी.डी.पी में लगभग 30 से 36 लाख करोड़ रुपए तक की बढ़ोतरी कर सकता है। यह जी.डी.पी में सामान्य विकास दर से 5.9 प्रतिशत से 7.2 प्रतिशत अधिक हो सकता है, जो भारत को विकास की वैश्विक दौड़ में बहुत आगे ले जा सकता है। नीति आयोग की रिपोर्ट का अनुमान है कि 2035 तक अकेले ए.आई. ही भारत की जी.डी.पी में लगभग 79.5 लाख करोड़ रुपए तक का योगदान दे सकती है। यानी आने वाले वर्षों में ए.आई. देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार बनने जा रही है। नैसकॉम के अनुसार, डेटा और ए.आई. दोनों साथ मिलकर 2025 तक भारत की जी.डी.पी में लगभग 37.31 लाख करोड़ से 41.45 लाख करोड़ रुपए तक का योगदान दे सकती हैं। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कृषि, हेल्थकेयर और वित्तीय सेवाओं जैसे ऐसे क्षेत्रों से आएगा जो सीधे जनता की ज़रूरतों से जुड़े हुए हैं। इसका मतलब यह है कि ए.आई सिर्फ कंपनियों के लिए नहीं, बल्कि आम लोगों के जीवन को भी बेहतर बना सकती है।
पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था
भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन का लक्ष्य तय किया है। 2024 तक यह क्षमता 203.18 गीगावाट तक पहुंच चुकी है। यानी भारत पहले से ही इस दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है। पिछले 10 साल में स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में 396 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भारत का डेटा सेंटर सेक्टर आने वाले वर्षों में एक विशाल बाजार बनने जा रहा है। 2025 तक इस सेक्टर के बाजार मूल्य का लगभग 58,000 करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। इन डेटा सेंटर में भारी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है और भारत इस मांग को स्वच्छ ऊर्जा के माध्यम से पूरा करने की दिशा में अग्रसर है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इन क्षेत्रों में निवेश और तेजी से बढ़ती क्षमताएं भारत को 2028 तक 5.2 खरब डॉलर (लगभग 430 लाख करोड़ रुपए) की मजबूत अर्थव्यवस्था बना सकती हैं।
अब भारत के पास वह सुनहरा अवसर है, जब ए.आई. और स्वच्छ ऊर्जा मिलकर देश का भविष्य हर मायने में बदल सकती हैं- अर्थव्यवस्था, समाज और पर्यावरण-तीनों को साथ लेकर। अनुमान है कि ए.आई. और स्वच्छ ऊर्जा 2030 तक भारत में खोल सकती हैं करोड़ों रोज़गार के अवसर। वैसे ए.आई. को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है यह नौकरियां खत्म करेगी या बनाएगी? दोनों बातें हैं। ये नौकरियां समाप्त भी कर सकती हैं और बढ़ा भी सकती हैंं। हालांकि बढ़ने की बात अधिक होती है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का अनुमान है कि ए.आई. और उससे जुड़े सेक्टर 2030 तक भारत में लगभग 4 करोड़ नई नौकरियां पैदा कर सकते हैं। ई.वाई. की रिपोर्ट कहती है कि जनरेटिव ए.आई. 2030 तक भारत में लगभग 3.8 करोड़ मौजूदा नौकरियों का स्वरूप बदल देगी। उसमें 24 प्रतिशत काम पूरी तरह से स्वचालित हो जाएंगे और 42 प्रतिशत कामों में ए.आई. इंसानों की सहयोगी बन कार्य क्षमता को बढ़ाएगी।

स्वच्छ ऊर्जा में नौकरियों की संभावना
स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र भारत में लाखों लोगों के लिए नए रोजगार के रास्ते खोल सकता है। जैसे-जैसे देश में सूरज की रोशनी से बिजली बनाने वाले सोलर पैनल, हवा से बिजली पैदा करने वाले पवन टरबाइन, और बिजली को जमा करने वाली ऊर्जा बैटरियों का इस्तेमाल बढ़ेगा, वैसे-वैसे इनसे जुड़ी नौकरियों की मांग भी तेजी से बढ़ सकती है। इसमें सोलर और विंड एनर्जी इंजीनियर, तकनीशियन, प्रोजेक्ट मैनेजर और मेंटेनेंस स्टाफ जैसे रोजगार शामिल हैं। इसके अलावा, इंस्टॉलेशन सुपरवाइज़र, क्वॉलिटी कंट्रोल एक्सपर्ट, ग्रिड ऑपरेटर, साइट सर्वेयर, सेफ्टी ऑफिसर, और एनर्जी ऑडिटर जैसे तकनीकी और प्रबंधन से जुड़े पदों की भी मांग बढ़ सकती है।
क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत की स्वच्छ ऊर्जा क्षमता 360 से 370 गीगावाट तक पहुंच सकती है, जिससे अनुमानित 10 से 15 लाख नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं। ये नौकरियां मुख्यतः गुजरात, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्यों में मिल सकती हैं, जहां सौर और पवन संसाधन भरपूर मात्रा में मौजूद हैं।
डेटा सेंटर्स में नई नौकरियां
डेटा सेंटर्स का तेजी से विस्तार भी भारत में एक नया रोजगार क्षेत्र बन सकता है। इनसे जुड़े क्षेत्रों जैसे डेटा सेंटर प्रबंधन, ए.आई. और मशीन लर्निंग, साइबर सुरक्षा, और क्लाउड कंप्यूटिंग में विशेषज्ञों की मांग तेजी से बढ़ सकती है। इनमें डेटा वैज्ञानिक, सॉफ्टवेयर डेवलपर, मशीन लर्निंग इंजीनियर, डेटा सेंटर ऑपरेटर, क्लाउड आर्किटेक्ट, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ, नेटवर्क इंजीनियर और आईटी इन्फ्रास्ट्रक्चर टेक्नीशियन जैसी भूमिकाएं उभर रही हैं। अनुमान है कि 2025 तक भारत का डेटा सेंटर बाजार लगभग 58,000 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है, जिससे 5 से 7 लाख तक नई नौकरियों की संभावना है।
आईटी-बीपीएम में नई नौकरियां
आईटी और बीपीएम (बिजनेस प्रोसेस मैनेजमेंट) क्षेत्र भी एक मजबूत रोजगार इंजन बना हुआ है। इसमें सॉफ्टवेयर डेवलपर, टेक्निकल सपोर्ट एग्जीक्यूटिव, नेटवर्क इंजीनियर, क्लाउड सर्विस मैनेजर, सिस्टम एनालिस्ट, बिज़नेस एनालिस्ट, डेटा एंट्री ऑपरेटर, कस्टमर सर्विस प्रतिनिधि, कंटेंट मॉडरेटर, क्वालिटी एनालिस्ट, आईटी प्रोजेक्ट मैनेजर, और डिजिटल मार्केटिंग विशेषज्ञ जैसे कई काम लगातार उभर रहे हैं। अनुमान है कि यह उद्योग 2026 तक लगभग 29 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है, जिसकी सालाना वृद्धि दर के करीब 10 प्रतिशत रहने की संभावना है।

स्मार्ट तकनीकों से नए रोजगार
भारत में कुछ नए क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहे हैं- जैसे स्मार्ट शहरों का निर्माण, बिजली के स्मार्ट सिस्टम, ग्रीन हाइड्रोजन (एक ईंधन जो पानी से बनाया जाता है और जिससे प्रदूषण नहीं होता), और बैटरियां, जो बिजली को जमा करके बाद में इस्तेमाल करने लायक बनाती हैं। इन सभी क्षेत्रों में आने वाले समय में लाखों नए रोजगार मिल सकते हैं। जैसे-जैसे भारत में स्मार्ट सिटी और आधुनिक बिजली व्यवस्था (स्मार्ट ग्रिड) विकसित हो रही है, वैसे-वैसे इन क्षेत्रों में विशेषज्ञों की जरूरत बढ़ रही है। इन कामों में शामिल हैं: ए.आई. डेवलपर, डेटा एनालिस्ट, स्मार्ट ग्रिड ऑपरेटर, पर्यावरण इंजीनियर, शहरी नियोजन विशेषज्ञ (अर्बन प्लानर), आई.ओ.टी (इंटरनेट ऑफ थिंग्स) इंजीनियर, स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम डिजाइनर, ग्रीन बिल्डिंग एक्सपर्ट, एनर्जी ऑडिटर, सिस्टम इंटीग्रेटर। ई.वाई. की रिपोर्ट के अनुसार, ‘ए.आई फॉर इंडिया 2030’ जैसी पहलों के जरिए 2025 तक भारत में लगभग 41.45 लाख करोड़ रुपए की आर्थिक वृद्धि हो सकती है, जिससे 2–3 लाख नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं। सरकार ने 2030 तक हर साल 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन बनाने का लक्ष्य तय किया है। इससे ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन तकनीशियन, केमिकल इंजीनियर, बैटरी डिज़ाइन इंजीनियर, बैटरी टेस्टिंग टेक्नीशियन, ईवी (इलेक्ट्रिक वाहन) चार्जिंग स्टेशन ऑपरेटर, पावर सिस्टम प्लानर, ऊर्जा भंडारण प्रणाली विशेषज्ञ, ईवी मेंटेनेंस स्टाफ, इलेक्ट्रिकल सेफ़्टी एक्सपर्ट जैसे लोगों को काम मिलेगा।
पर्यावरण संरक्षण
भारत में स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग पर्यावरण को बचाने में मदद कर सकता है। इससे बिजली की बचत, प्रदूषण में कमी और ऊर्जा का सही इस्तेमाल संभव हो सकता है। उदाहरण के तौर पर, डेटा सेंटर्स बहुत ज़्यादा बिजली खाते हैं, लेकिन अगर इन्हें लिक्विड कूलिंग (यानी ठंडा करने के लिए पानी या किसी तरल पदार्थ का इस्तेमाल) जैसी नई तकनीकों से ठंडा किया जाए और इनकी बिजली की जरूरत सौर और पवन ऊर्जा से पूरी की जाए, तो इनकी बिजली खपत को 20 से 30 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। इससे ऊर्जा की बचत होगी और कार्बन प्रदूषण भी घटेगा। भारत सरकार ने 2023 में ग्रीन बॉन्ड्स (ऐसा सरकारी कर्ज जिससे मिलने वाला पैसा सिर्फ पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों पर खर्च किया जाता है) के ज़रिए लगभग 16,000 करोड़ रुपए जुटाए। यह पैसा सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे साफ ऊर्जा स्रोतों पर खर्च किया जा रहा है।
ऊर्जा दक्षता में ए.आई. का प्रयोग
स्मार्ट ग्रिड और एनर्जी एफिशिएंसी मैनेजमेंट सिस्टम (ऊर्जा दक्षता प्रबंधन प्रणाली) जैसी ए.आई. तकनीकों की मदद से अब बिजली के उत्पादन और वितरण को और अधिक संतुलित और कुशल बनाया जा रहा है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि कहां, कितनी बिजली चाहिए और किस स्रोत से आपूर्ति होनी चाहिए, जिससे बिजली की बर्बादी रुकेगी। उदाहरण के तौर पर, टाटा पावर जैसी कंपनियां अब ए.आई. का इस्तेमाल करके पहले से यह पता लगाने लगी हैं कि अगले दिन कितनी सौर ऊर्जा पैदा होगी। इससे बिजली के ग्रिड को पहले से तैयार किया जा सकता है, जिससे न बिजली की कमी होगी और न ज्यादा उत्पादन की बर्बादी।
तकनीक बनाएगी आत्मनिर्भर
‘ए.आई. फॉर इंडिया 2030’ एक बड़ी पहल है, जिसमें भारत सरकार, नैसकॉम और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम मिलकर काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य है ए.आई. जैसी तकनीक को खेती, स्वास्थ्य और शहरों की योजना जैसे जरूरी क्षेत्रों में इस्तेमाल करना, ताकि आम लोगों की जिंदगी बेहतर और आसान हो सके। साथ ही, सरकार की पी.एल.आई (प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव) स्कीम और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स देश में नई तकनीकों और निवेश को बढ़ावा दे रहे हैं। जो कंपनियां भारत में ए.आई., स्वच्छ ऊर्जा या तकनीकी से जुड़ी परियोजनाएं शुरू करेंगी, उन्हें सरकार आर्थिक मदद और कर में छूट दे रही है। इससे न केवल नई नौकरियां पैदा होंगी, बल्कि भारत तकनीक के जरिए आत्मनिर्भर भी बनेगा। भारत अब सिर्फ तकनीक का इस्तेमाल करने वाला नहीं, बल्कि दुनिया को दिशा देने वाला देश बन रहा है। हाल ही में भारत ने जी.पी.ए.आई. (ग्लोबल पार्टनरशिप ऑन ए.आई.) की अध्यक्षता की, जहां दुनिया भर में ए.आई. से जुड़े फैसलों में भारत की अहम भूमिका रही। भारत ने यह साफ किया कि ए.आई. का फायदा सिर्फ अमीर देशों तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि गरीब और विकासशील देशों को भी बराबरी का मौका मिलना चाहिए। यह दिखाता है कि भारत तकनीक को सबकी पहुंच में लाना चाहता है, ताकि इसका लाभ हर नागरिक और हर क्षेत्र तक पहुंच सके।

















