नई दिल्ली । दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के प्रथम दिवस पर कार्यक्रम में “संघ और स्वयंसेवकों की संगठन निर्माण में भूमिका” पर व्याख्यान देने के बाद सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने “हिंदू राष्ट्र की अवधारणा और संघ में समर्पण” पर प्रकाश डाला।
राष्ट्र और नेशन का अंतर
सरसंघचालक जी ने कहा- हम हिंदू राष्ट्र के अंगभूत हैं। इसलिए पूरे हिंदू समाज का दायित्व है कि वह वैसा बने जैसा उसे होना चाहिए। हमारी संगठित कार्यशक्ति ही पूरे समाज की संगठित शक्ति है। जब हम हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं, तब यह पश्चिमी “नेशन” की परिभाषा से अलग है। नेशन की अवधारणा में स्टेट जुड़ा होता है, लेकिन राष्ट्र के लिए स्टेट आवश्यक नहीं है। भारत का राष्ट्र पहले से अस्तित्व में है, चाहे सत्ता बदलती रही हो। उन्होंने कहा- भारत में अनेक राजाओं और व्यवस्थाओं के बावजूद राष्ट्र हमेशा बना रहा। चाहे अंग्रेज हों, तुर्क-अरब हों या अन्य विदेशी शासन- हमारा राष्ट्र कभी समाप्त नहीं हुआ। राष्ट्र का अस्तित्व सत्ता से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक एकता से जुड़ा है।
समान न्याय और समावेशी दृष्टिकोण
सरसंघचालक जी ने कहा- हिंदू राष्ट्र का अर्थ किसी का विरोध करना या किसी को अलग करना नहीं है। यह समावेशी विचार है। यहां प्रजा को संप्रदाय, पंथ या भाषा के आधार पर भेदभाव के बिना समान न्याय मिलता है।
संघ का उद्देश्य
उन्होंने कहा- संघ किसी विरोध या प्रतिक्रिया में खड़ा नहीं हुआ है। उसका उद्देश्य संपूर्ण समाज का संगठन करना है। यह संगठन किसी विशेष समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि समाज को मजबूत बनाने के लिए है। जैसे व्यायाम शरीर को स्वस्थ करने के लिए होता है, वैसे ही संगठन समाज की स्वाभाविक आवश्यकता है। व्यायाम लड़ाई के लिए नहीं होता, लेकिन ताकत काम आती है। उसी प्रकार संगठन बिना किसी विरोध के समाज को मजबूत करता है।
डॉ. हेडगेवार की सीख
सरसंघचालक जी ने कहा- संघ की स्थापना के समय डॉ. हेडगेवार ने कहा था कि संगठन के जीवन में तीन अवस्थाएँ आती हैं—उपेक्षा, विरोध और स्वीकार्यता। उपेक्षा की अवस्था में लोग संघ को नकारते थे और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को अस्वीकार करते थे।
संघ के शुरुआती प्रचारक
उन्होंने बताया कि संघ के शुरुआती प्रचारक बिना किसी साधन के समाज में गए। भागलपुर, बिहार में पहले प्रचारक जब पहुँचे तो उनके पास केवल सवा रुपया बचा था। रहने का ठिकाना नहीं था, भोजन के लिए भुना चना बेचने वाले से दोस्ती कर ली। उसी के सहारे वे समाज में काम करते रहे।
संघ कार्य में समाज का सहयोग
संघ पिछले 100 वर्षों से संपूर्ण समाज के संगठन का कार्य कर रहा है। कठिन परिस्थितियों और उपेक्षा के बावजूद यह यात्रा निरंतर आगे बढ़ी है और समाज में गहरे परिवर्तन लाए हैं। शाखा शुरू होने के बाद स्वयंसेवकों को समाज ने हमेशा सहयोग दिया। एक बाल स्वयंसेवक के घर की माताजी ने न केवल भोजन की व्यवस्था की, बल्कि यह सुनिश्चित किया कि उनके पुत्र जैसे प्रचारक को प्रतिदिन समय पर भोजन मिले। समाज ने जैसे सम्भाला, वैसे संघ कार्यकर्ता आगे बढ़ते रहे।
विरोध और संघर्ष की यात्रा
सरसंघचालक जी ने कहा- संघ को लंबे समय तक कड़े विरोध और झूठे आरोपों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि 1948 में गुरुजी के घर पर हमला हुआ। लेकिन गुरुजी ने स्वयंसेवकों को रोक दिया और कहा— “यह अपना ही समाज है। यह समाज जब अपने को सराहता है तो अच्छा लगता है। वही अगर मारने आता है तो मेरे घर के आँगन में मेरा रक्त बहेगा, समाज का रक्त नहीं बहेगा। आप सब लोग वापस जाइए”।
यह वृत्ति थी। क्योंकि संघ कार्य का आधार क्या है..? कोई विरोध नहीं, कोई प्रतिक्रिया नहीं। शुद्ध सात्त्विक प्रेम ही हमारे कार्य का आधार है। जिस आधार पर हम विविधता में एकता देखते हैं। वह तो सत्यरूप है, प्रेम और करुणारूप है।
अपनत्व और वसुधैव कुटुंबकम्
सरसंघचालक जी ने आगे कहा कि संघ केवल हिंदू समाज के लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व को एक परिवार मानने के सिद्धांत पर चलता है। स्वयंसेवक अपनेपन की इसी भावना को लेकर गाँव, देश और विश्व तक अपने कार्य का विस्तार करते हैं। संघ के स्वयंसेवकों ने हमेशा यही मन में रखा कि यह सब होगा, लेकिन सब अपने हैं। और जैसा मैं कहता हूँ—संघ हिंदू के नाते चलता है।
तो हिंदू का यह अपनापन केवल हिंदू के लिए नहीं है। वसुधैव कुटुंबकम् है। वही बीज रूप में हम परिवार में अपनेपन के आधार पर चलते हैं। हम गाँव को अपना गाँव मानकर चलते हैं, देश को अपना देश मानकर चलते हैं। यह क्रमिक विस्तार हमारा होता है। यही मनुष्य जीवन के क्रमिक विकास का अर्थ है, यही विश्व विकास का अर्थ है।
यह ध्यान में रखकर स्वयंसेवक हमेशा बढ़ते रहे। पास में कुछ नहीं था—केवल स्वयंसेवकों की निष्ठा, श्रद्धा और विश्वास। इसके आधार पर संपूर्ण चार स्वयंसेवकों के आधार पर हम चले।
स्वावलंबन और कार्यकर्ता निर्माण
सरसंघचालक जी ने कहा- हमने अपनी पद्धति में भी यही रखा है कि संघ को स्वयंसेवक चलाएँ। हम परावलंबी नहीं हैं। हम सब मामलों में स्वावलंबी हैं। “मैन, मनी एंड एम्युनिशन”—हमारे पास कार्यकर्ता नहीं थे। हमने रेडीमेड कार्यकर्ता नहीं लिए। हमने अपने कार्यकर्ता खुद बनाए। वे बनते हैं। कार्यकर्ता बनते हैं, वे शाखाएँ चलाते हैं। शाखाएँ चलती हैं तो कार्यकर्ता बनते हैं। अधिक शाखाएँ खुलती हैं, अधिक कार्यकर्ता बनते हैं।
गुरुदक्षिणा : समर्पण की परंपरा
सरसंघचालक जी ने बताया कि संघ में चंदा या दान की जगह “गुरुदक्षिणा” की परंपरा है। यह हर स्वयंसेवक का समर्पण है। इसके लिए बच्चे-बच्चे तक अपनी आदतें बदलकर पैसे बचाते हैं। यह देश के लिए समर्पित होने की मेरी प्रतिज्ञा है। तो वास्तव में समर्पण मेरा कितना है—भावना की दृष्टि से कितनी उत्कटता पर है, इसका टेस्ट करते हुए वे सालभर जमा करते हैं।
स्वयंसेवकों की प्रेरणादायक प्रसंग
सरसंघचालक जी ने बताया कि शामू पवार नाम का एक स्वयंसेवक था। वह नौवीं में पढ़ता था। माता-पिता दोनों मजदूर थे। रोज की रोटी रोज की कमाई से बनती थी। ऐसा घर, ऐसी झोपड़ी—वहीं वह रहता था। गुरुदक्षिणा में उसके गण ने तय किया कि प्रत्येक स्वयंसेवक को ₹21 गुरुदक्षिणा देनी चाहिए। उसका गण का लक्ष्य था। तो उसने माताजी से मूंगफली बनवाई—सॉल्टेड पीनट्स। और तीन महीने तक इंटरवल में सिनेमा टॉकीज में जाकर वह बेचता था। ₹21 जमा हो गए। उसने बेचना बंद कर दिया। घर में रुपए रख दिए। 15 दिन बाद गुरुदक्षिणा समर्पण का कार्यक्रम था।
उसने घर में बताया कि गुरुदक्षिणा है। 15 दिन तक उस घर में, जहाँ रोज की कमाई से पेट भरता था, वहाँ ₹21 रखा रहा। किसी ने हाथ नहीं लगाया। जिसे उसने जाकर गुरुदक्षिणा में समर्पित किया।
सरसंघचालक जी ने आगे कहा कि मैं बचपन में शाखा में जाता था तो मुझे याद है, वहाँ एक डिब्बा रखा था। हमें कुछ मिलता तो घर से ज़्यादा कुछ लाना संभव नहीं था। लेकिन कभी-कभार मिल जाता। कोई मेहमान आ गए, जाते समय कुछ रख दिया। पर रखते भी ज़्यादा नहीं थे। वह पुराना छेद वाला ताँबे का पैसा होता था, तो वही हम उस डिब्बे में डालते थे। पूरा नागपुर के रेशमबाग का परिसर डॉक्टर साहब का स्मारक— स्मृति मंदिर जो बना है, या दिल्ली का कार्यालय—सब स्वयंसेवकों ने बनाया। संघ संपूर्ण स्वावलंबी संगठन है।
संघ की निस्वार्थ वृत्ति
सरसंघचालक जी ने आगे कहा कि इसलिए हम लोग, अपनी दृष्टि से विचार करके जो अच्छा लगता है, वह बोल सकते हैं। जो खराब लगता है, वह भी बोल सकते हैं। लेकिन बोलने के पीछे कोई विरोध की भावना नहीं है। संघ न किसी विरोध में चलता है और न किसी बैर भाव से। “ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।” और दोस्ती कहें तो सब अपने हैं। सबके प्रति प्रेम है। उस प्रेम के आधार पर और स्वयंसेवकों की निष्ठा, तपस्या के आधार पर हम यहाँ तक पहुँचे हैं। कितने बड़े त्याग हुए, कितने बड़े बलिदान हुए—उस पर हम खड़े हैं। यह हम जानते हैं। उनके प्रति मन में जो भाव है, उसका वर्णन मैं नहीं कर सकता। ऐसे भाव हमारे सबके मन में हैं। और संघ को हमको आगे ले जाना है। क्यों ले जाना है..? क्योंकि भारत को खड़ा करना है।

















