अगस्त का महीना, अंग्रेज और भारत की आजादी
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अगस्त का महीना, अंग्रेज और भारत की आजादी

सन 1608 में यह दिन भारत के लिए दुर्भाग्य एवं दुर्दशा का दिन सिद्ध हुआ क्योंकि इस दिन सूरत के बंदरगाह पर हेक्टर जहाज ने लंगर डाला और उसमें से विलियम हॉकिंस नामक लुटेरा अपने कुछ साथियों के संग भारत में उपस्थित हुआ।

Written byडॉ. रामकिशोर उपाध्यायडॉ. रामकिशोर उपाध्याय
Aug 25, 2025, 01:57 pm IST
in भारत

अगस्त का महीना भारतीय इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है । अपने देश में अगस्त में तीन महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं। इन तीनों घटनाओं को जन्म देने वाली दुर्भाग्यपूर्ण चौथी घटना भी इसी माह में घटित हुई। इस चौथी घटना पर अधिक विचार नहीं किया जाता, जबकि सबके मूल में यही है। व्यापार के माध्यम से किसी देश पर किस प्रकार कब्जा किया जा सकता है इसकी केस स्टडी भी इस घटना के आधार पर की जा सकती है। यह दिन है 24 अगस्त। सन 1608 में यह दिन भारत के लिए दुर्भाग्य एवं दुर्दशा का दिन सिद्ध हुआ क्योंकि इस दिन सूरत के बंदरगाह पर हेक्टर जहाज ने लंगर डाला और उसमें से विलियम हॉकिंस नामक लुटेरा अपने कुछ साथियों के संग भारत में उपस्थित हुआ। कहने को यह ईस्ट इंडिया ट्रेडिंग कंपनी के व्यापारी थे, जिसकी स्थापना लंदन के कुछ व्यापारियों ने मिलकर चंदे के माध्यम से की थी। जब ये लुटेरे व्यापारी के भेष में आगरा की ओर चले तो वहां इनकी भेंट मुगल शासक सलीम उर्फ जहांगीर से हुई। जहांगीर के बारे में कम ही लोग जानते हैं कि वह चौबीस घंटे शराब में धुत्त रहने वाला मुगल शासक था। उसके बारे में एक कहावत प्रचलित थी, “एक बोतल शराब हो,आधा किलो कबाब हो ,नूरजहां का राज हो।”

कहते हैं ईस्ट इंडिया कंपनी के लोगों का सलीम ने बहुत भव्य स्वागत किया। यह भी संभव है कि अंग्रेजों ने सलीम को शराब पिलाकर प्रसन्न किया हो, जो भी हो इस स्वागत के बारे में टिप्पणी करते हुए लॉरी कॉलिन्स ने अपनी पुस्तक आधी रात की आजादी में लिखा है कि जहांगीर ने अंग्रेजों का जो स्वागत किया वह इनके लिए इतना अभूतपूर्व था कि यदि उसकी एक झलक भी ईस्ट इंडिया ट्रेडिंग कंपनी के 125 हिस्सेदारों को मिल गई होती तो वे द्वेष या शर्म से अपनी -अपनी हिस्सेदारी छोड़ देते। कहने का भाव यह है कि उस समय अंग्रेजों का आर्थिक और सामाजिक स्तर बहुत ही निम्न स्तर का था। कॉलिंस ने इसी पुस्तक में अंग्रेजों की आर्थिक स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा है कि जब अंग्रेज जहांगीर से मिले उस समय जहांगीर इतना धनवान था कि उसकी तुलना में इंग्लैंड की रानी की हैसियत भारत की किसी मामूली सूबेदारिनी से अधिक नहीं थी। कितने आश्चर्य की बात है कि यह सूबेदारनी के स्तर की महिला सम्राटों की जननी और संसार के सबसे धनी देश भारत की महारानी बन बैठी। वह भी छल और षडयंत्र रच कर।

वर्तमान पीढ़ी को यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि अंग्रेजों का जैसा महिमामंडन बाद में किया गया वह झूठ एवं मनगढ़ंत है। भारत पर कब्जा करने से पहले इंग्लैंड के किसान भारत के किसान की तुलना में अत्यंत दरिद्र एवं निन्दित जीवन जी रहे थे। अंग्रेज जब भारत से गए तब वे भारत को उस स्थित में पहुंचा गए जिस स्थिति में सन 1600 से पहले वे स्वयं हुआ करते थे। चूंकि जहांगीर का शासन पूरे भारत पर नहीं था इसलिए जहांगीर ने इन लुटेरों को भारत में अपने शासित प्रदेश में व्यापार करने की अनुमति प्रदान कर दी। ईस्ट इंडिया ट्रेडिंग कंपनी के लोग भारत से मसाले, नील, शक्कर आदि वस्तुएं ले जाकर अपने देश में बेचते थे और उन दिनों वे 200 प्रतिशत लाभ कमाते थे। भारत में जब उनके पांव स्थिर हुए तो वे धीरे-धीरे भारत के शासक ही बन बैठे। इस प्रकार भारत में अगस्त के महीने में ही अंग्रेजी साम्राज्य के बीज बोए गए।

इन्हें भारत से खदेड़ने के लिए सबसे बड़ा आन्दोलन भारत छोड़ो आन्दोलन भी अगस्त में ही हुआ, जिसे अगस्त क्रांति के नाम से जाना जाता है । अगस्त क्रांति 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के रूप में हुई । यह संयोग ही है कि अगस्त में अंग्रेजों का भारत में प्रवेश हुआ और अगस्त में ही उन्हें भारत छोड़ने के लिए राजनीतिक आंदोलन किया गया तथा अगस्त में 15 अगस्त के दिन उन्हें भारत से सदैव के लिए बाहर कर दिया गया। किन्तु अगस्त क्रांति 1942 के बाद अर्थात 1947 तक, पांच वर्षों में अपने देश में ऐसा क्या हुआ जिसके कारण अंग्रेजों को भागना पड़ा।

भारत के आम नागरिक को आज तक इस विषय में सत्य इतिहास नहीं बताया गया। ठीक इसी प्रकार सलीम उर्फ़ जहांगीर से लाइसेंस लेने वाली ईस्ट इंडिया ट्रेडिंग कंपनी ने सलीम से व्यापार का लाइसेंस लिया था, सत्ता का नहीं। फिर भी यह गप्प चल निकली कि अंग्रेजों ने मुगलों से सत्ता प्राप्त की थी। भारत में 1857 के पहले ब्रिटिश सरकार या रानी का शासन नहीं था, वह ईस्ट इंडिया ट्रेडिंग कंपनी का अनधिकृत कब्जा था, जिसे भारत के लोगों ने एक साथ अस्वीकार कर दिया। इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है। किन्हीं कारणों से कंपनी एजेंटों को पूरी तरह खदेड़ा नहीं जा सका किंतु अंग्रेज इतने भयभीत हुए कि 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत के राजाओं से संधि ट्रीटी करके भारत को रानी विक्टोरिया के शासन के अधीन घोषित कर दिया। ईस्ट इंडिया ट्रेडिंग कंपनी से मराठों और सिक्ख राजाओं के भयंकर युद्ध हुए। उस समय तक मुगल शासन नाम मात्र का रह गया था, फिर भी अंग्रेजों ने मुसलमानों को झूठी पट्टी पढ़ाई कि हमसे पहले तुम्हारा ही शासन था। मुसलमानों को इस झूठ के आधार पर मुस्लिम शासन की मांग करने के लिए उकसाया गया और मुसलमान नेताओं ने भी इस झूठ को दोहराना आरंभ कर दिया। दुर्भाग्य से देश का विभाजन भी अगस्त माह में ही हुआ।

15 अगस्त के दिन भारत स्वाधीन तो हुआ किन्तु सत्ता किन लोगों को मिली और क्यों मिली ? सत्ता हस्तांतरण का खेल किन शर्तों पर खेला गया आदि विषयों को लेकर भी देश की जनता को स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। कुछ लोग स्वयंभू देश के भाग्य विधाता बन बैठे। प्रथम प्रधानमंत्री कौन होगा, इसका निर्णय किन लोगों ने किया ? किस पद्धति से किया आदि बातें अब छन छन कर सामने आ रही हैं। स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले कुछ लोगों को अधिक महत्व दिया गया तथा कुछ के योगदान को लगभग विस्मृत कर दिया गया, ऐसा क्यों किया गया? कई क्रांतिकारी स्वतंत्र भारत में घोर उपेक्षा के शिकार हुए। आजादी के कुछ योद्धा राजनीतिक विद्वेष से जेल भेजे गए और कुछ की कई पीढ़ियों को सत्ता की मलाई मिलती रही क्यों? ये प्रश्न भी अगस्त माह में पूछे जाने चाहिए। इस समय अगस्त 2025 में सबसे अधिक चर्चित मुद्दा है भारत विभाजन। भारत विभाजन के असली दोषी कौन थे? 14 अगस्त 1947 के दिन भारत का रक्त रंजित विभाजन हुआ। लगभग 73 वर्ष बाद मोदी सरकार ने 14 अगस्त के दिन को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में स्मरण करने का निश्चय किया और अब चर्चा है कि विभाजन विभीषिका को पाठ्य पुस्तकों तक ले जाने की तैयारी चल रही है। लोग पूछ रहे हैं कि विभाजन का सच अब तक क्यों छिपाया है? यह कैसी विडंबना है कि अगस्त में क्रांति का आह्वान करने वाली कांग्रेस सत्ता प्राप्त करने के लिए विभाजन विभीषिका पर अगस्त भ्रांति फैला रही है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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