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RSS के 100 वर्ष : भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संघ

1925 में आरएसएस की औपचारिक स्थापना से पहले ही इसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार स्वतंत्रता संग्राम के एक सक्रिय सेनानी थे, जो आजादी के आंदोलन की भट्टी में तपकर निकले थे। असहयोग आंदोलन के दौरान डॉ. हेडगेवार के भाषणों में इतनी प्रखरता थी कि तत्कालीन नागपुर के जिला कलेक्टर सिरिल जेम्स इरविन ने उन्हें एक वर्ष तक सार्वजनिक भाषण देने से प्रतिबंधित करने का आदेश जारी कर दिया

Written byशाश्वत पाणिग्राहीशाश्वत पाणिग्राही
Aug 20, 2025, 10:00 pm IST
inभारत, संघ @100

इतिहास केवल वह नहीं है जो लिखा गया है, वह भी है जो छुपा रह गया। भारत की स्वतंत्रता की भव्य कथा में सुर्खियां कुछ चुनिंदा लोगों के ही हिस्से में आईं। लेकिन ऐसे भी कुछ थे, जो आजादी के आंदोलन की पिछली गलियों से गुजरे, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के। उनमें से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के हजारों स्वयंसेवक थे – अनुशासित, समर्पित और संकल्पित; जिन्होंने बलिदान को मिट्टी में अंकित कर दिया और जहां-जहां राष्ट्र ने रक्त बहाया, वहां वे मौजूद थे।

इस अक्टूबर आरएसएस अपने शताब्दी वर्ष की दहलीज पर है, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 79वें स्वतंत्रता दिवस संबोधन में संघ की व्यक्ति निर्माण से लेकर राष्ट्र निर्माण तक की व्यापक भूमिका की सराहना की है। ऐसे में यह बिल्कुल समीचीन है कि हम इतिहास के पन्ने फिर से पलटें और स्वतंत्रता संग्राम में संघ के अक्सर उपेक्षित योगदानों पर दृष्टि डालें। आरएसएस के स्वयंसेवकों ने, जो मौन बलिदान में विश्वास रखते थे, केवल ब्रिटिश साम्राज्य से ही नहीं बल्कि उपनिवेशवाद द्वारा बोए गए आत्म-संदेह के गहरे रोग से भी संघर्ष किया। फिर भी वामपंथी इतिहासकारों के कारण उनके बलिदान को जान-बूझकर भारत की स्वतंत्रता संग्राम की कथा से मिटा दिया गया।

स्वतंत्रता आंदोलन में आरएसएस संस्थापक

1925 में आरएसएस की औपचारिक स्थापना से पहले ही इसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार स्वतंत्रता संग्राम के एक सक्रिय सेनानी थे, जो आजादी के आंदोलन की भट्टी में तपकर निकले थे। कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वतंत्रता का संकल्प घोषित करने से ठीक नौ वर्ष पहले, 1920 में डॉ. हेडगेवार नागपुर इकाई के संयुक्त सचिव के रूप में कार्यरत थे और उन्होंने पूर्ण स्वराज की मांग करते हुए एक प्रस्ताव रखा था। प्रस्ताव में कहा गया था- “कांग्रेस का लक्ष्य है पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना, एक भारतीय गणराज्य की स्थापना करना, और विश्व के अन्य राष्ट्रों को पूंजीवादी साम्राज्यवाद के शोषण और अत्याचार से मुक्त कराना।”

असहयोग आंदोलन के दौरान डॉ. हेडगेवार के भाषणों में इतनी प्रखरता थी कि तत्कालीन नागपुर के जिला कलेक्टर सिरिल जेम्स इरविन ने उन्हें एक वर्ष तक सार्वजनिक भाषण देने से प्रतिबंधित करने का आदेश जारी कर दिया। लेकिन डॉ. हेडगेवार निरुत्साहित नहीं हुए। उनका लिखित उत्तर और भी प्रज्वलित था- इतना कि जज स्मैली ने टिप्पणी की, “इनका बचाव वक्तव्य इनके भाषण से भी अधिक राजद्रोही है।” अदालत ने उन्हें एक वर्ष के कारावास की सजा सुनाई।

जेल से रिहा होने के बाद डॉ. हेडगेवार ने एक गहरी घोषणा की- “नैतिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत एकता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता निरर्थक होगी।” इसी विश्वास के साथ उन्होंने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, ताकि उस विचार को स्वरूप और शक्ति मिल सके।

स्वतंत्रता आंदोलन में नई ऊर्जा भरता आरएसएस

1929 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित हुआ। इस ऐतिहासिक निर्णय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए डॉ. हेडगेवार ने सभी आरएसएस शाखाओं को संदेश भेजा- “हमें प्रसन्नता है कि एआईसीसी ने अब अपने लक्ष्य को इतनी स्पष्टता से व्यक्त किया है। इसलिए, इस संगठन का समर्थन और सहयोग करना हमारा कर्तव्य है — यह तो स्वाभाविक है।”

1930 में महात्मा गांधी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ किए जाने पर डॉ. हेडगेवार ने स्वयं इसमें सक्रिय भाग लेने का निर्णय लिया। आर.एस.एस. के सरसंघचालक के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ कुछ समय के लिए डॉ. एलवी परांजपे को सौंप दीं। डॉ. परांजपे ने स्वयंसेवकों से कहा— “जो आंदोलन में भाग लेना चाहते हैं, वे अवश्य लें। अन्य लोग इस नवोदित संगठन के लिए कार्य करें। असली कार्य है ऐसे लोगों का संगठन करना जो इस राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर सकें।”

यवतमाल में सत्याग्रह में भाग लेने के लिए रवाना होने से पूर्व, नागपुर में सैकड़ों स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए डॉ. हेडगेवार ने कहा— “यह भ्रम न पालें कि वर्तमान आंदोलन ही स्वतंत्रता का अंतिम संघर्ष है। असली संघर्ष इसके बाद शुरू होगा, और आने वाले उस संघर्ष में पूर्ण बलिदान के लिए तैयार रहना। हम इस सत्याग्रह में इसलिए भाग ले रहे हैं क्योंकि हमें विश्वास है कि यह हमें स्वतंत्रता की ओर एक और कदम आगे ले जाएगा।”

डॉ. हेडगेवार को नौ माह के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई और उन्हें अलोका जेल में बंद किया गया, जहां सैकड़ों स्वयंसेवक उनके साथ कैद रहे। इनमें ग्यारह स्वयंसेवकों को चार-चार माह के कठोर कारावास की सजा दी गई।

संगठन का अडिग ब्रिटिश-विरोधी रुख जल्द ही औपनिवेशिक शासन की नजर में आ गया। सेंट्रल प्रोविंसेज़ एवं बेरार पुलिस की एक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि डॉ. हेडगेवार की भागीदारी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में “नई ऊर्जा का संचार” किया। असंख्य आरएसएस स्वयंसेवकों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया, जबकि अनेक ने चुपचाप लेकिन दृढ़ समर्थन दिया। नागपुर, वर्धा, पुणे और लाहौर जैसे शहरों में शाखाओं ने गुप्त अभ्यास और अध्ययन मंडलियों का आयोजन किया, जिनमें स्वयंसेवकों को आत्मरक्षा और सामुदायिक संगठन का प्रशिक्षण दिया जाता था ताकि स्वतंत्रता आंदोलन में नई ऊर्जा भरी जा सके।

कई स्वयंसेवक गुप्त रूप से प्रतिबंधित राष्ट्रवादी साहित्य का प्रसार कर रहे थे, क्रांतिकारियों को पुलिस निगरानी से बचाने में मदद कर रहे थे, और कड़े दमन के दौर में भोजन व सूचनाओं की आपूर्ति श्रृंखला बनाए रख रहे थे। इनमें से एक थे लक्ष्मणराव भिड़े (संघ के प्रारंभिक प्रचारकों में से एक), जिन्होंने क्रांतिकारियों के साथ घनिष्ठ समन्वय में कार्य किया और ब्रिटिश पुलिस की लगातार प्रताड़ना सही।

आरएसएस और भारत छोड़ो आंदोलन

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब कांग्रेस नेतृत्व को बड़े पैमाने पर जेलों में डाल दिया गया, तब आरएसएस और इसके स्वयंसेवक जन-व्यवस्था बनाए रखने, पीड़ितों को राहत पहुंचाने और ब्रिटिश दमन के सामने डटकर खड़े रहने के लिए आगे आए। कई स्वयंसेवकों ने गिरफ्तारी भी दी।

महाराष्ट्र के सतारा में, स्वयंसेवकों ने क्रांतिकारियों की सहायता के लिए गुप्त नेटवर्क बनाए। विदर्भ में, उन्होंने गांधी जी के प्रतिबंधित भाषणों का प्रसार किया और जेल जाने का जोखिम उठाया। चिमूर और आष्टी में, आरएसएस कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस जुलूसों का नेतृत्व किया, जिन्हें प्रचंड विद्रोहों में बदल दिया गया और पुलिस थानों पर धावा बोला। बंगाल, पंजाब और बिहार में, उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को अपने घरों में शरण दी।

1942 के एक पत्र में, प्रख्यात कांग्रेस नेता आचार्य कृपलानी ने उन उथल-पुथल भरे दिनों में आरएसएस के स्वयंसेवकों के अटल संकल्प का उल्लेख करते हुए लिखा – “कांग्रेस के दमन के समय आर.एस.एस. के स्वयंसेवकों ने निस्वार्थ भाव से कार्य किया।” उस दौर की ब्रिटिश खुफिया रिपोर्टों में भी “आर.एस.एस. खतरे” के बढ़ते प्रभाव को स्वीकार किया गया – एक ऐसी शक्ति जो वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध, अत्यंत अनुशासित और जिसमें घुसपैठ करना असंभव था।

आजाद हिंद फौज: स्वयंसेवक भी थे साथ

अनेक स्वयंसेवक आज़ाद हिंद फ़ौज की ओर आकर्षित हुए, क्योंकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस में उन्होंने अडिग देशभक्ति का साक्षात स्वरूप देखा। नगरों और गाँवों में असंख्य स्वयंसेवकों ने चुपचाप आईएनए भर्ती अभियानों को सहयोग दिया — बैठकें आयोजित कीं, संदेश पहुँचाए, शरण प्रदान की और उस लक्ष्य के लिए निःशब्द कार्य करते रहे, जो उनके हृदय में गर्जना करता था।

अज्ञात, अडिग, अटूट

आरएसएस के स्वयंसेवक भारत माता को बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए डटे रहे। जब आंधियों ने टिमटिमाती ज्योति को बुझाने की कोशिश की, तब उन्होंने उसे अपने प्राणों से बचाया। उन्होंने राष्ट्र के फटे हुए ताने-बाने को ताली या प्रशंसा के लिए नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को अखंड रखने के लिए सीया।

इतिहासकारों द्वारा उपेक्षित, उनकी गाथा पाठ्यपुस्तकों में नहीं, बल्कि उन लोगों के हृदयों में अंकित है जिन्हें उन्होंने बचाया। कोलकाता की तंग गलियों से लेकर दिल्ली के भीड़भाड़ वाले शरणार्थी शिविरों तक। आज भी उनकी विरासत सांस लेती है – उस स्वयंसेवक में जो बाढ़ के पानी में उतरकर अजनबियों को बचाता है, उस युवक में जो सूर्योदय से पहले शाखा में जुटता है। उनके लिए भारत माता का आशीर्वाद ही सबसे बड़ा पुरस्कार था, और आज भी है।

(लेखक वरिष्ठ मल्टीमीडिया पत्रकार हैं।)

Topics: भारत छोड़ो आंदोलन आरएसएसआजाद हिंद फौज स्वयंसेवकRSS contribution freedom struggleDr. KB Hedgewarडॉ. केशव बलिराम हेडगेवारआरएसएस 100 वर्षRSS 100 Yearsआरएसएस स्वतंत्रता संग्रामस्वतंत्रता आंदोलन में संघ का योगदान
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