बिहार में मतदाता सूची विवाद: विपक्ष की अराजकता, चुनाव आयोग पर हमला
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बिहार में मतदाता सूची विवाद: विपक्ष की अराजकता, चुनाव आयोग पर हमला

भारत निर्वाचन आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के 56 घंटे के भीतर हटाए गए मतदाताओं की सूची को सार्वजनिक करने के बाद विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद), ने अपनी प्रतिक्रियाओं को और तीखा कर दिया है।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु'
Aug 20, 2025, 01:00 pm IST
in बिहार

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत 65 लाख नाम हटाए जाने का मुद्दा सियासी तूफान का केंद्र बन गया है। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के 56 घंटे के भीतर हटाए गए मतदाताओं की सूची को सार्वजनिक करने के बाद विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद), ने अपनी प्रतिक्रियाओं को और तीखा कर दिया है। इन दलों ने न केवल चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं, बल्कि संवैधानिक संस्था के खिलाफ धमकी भरे लहजे और अपशब्दों का भी इस्तेमाल किया है। विपक्ष की इन प्रतिक्रियाओं को लेकर सत्तारूढ़ दल और कई विश्लेषक इसे बिहार में अराजकता फैलाने की साजिश करार दे रहे हैं।

चुनाव आयोग की कार्रवाई

भारत निर्वाचन आयोग ने 17 अगस्त 2025 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष के आरोपों का जवाब दिया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने स्पष्ट किया कि एसआईआर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष है। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग न तो किसी पक्ष के साथ है और न ही विपक्ष के खिलाफ। सभी दल हमारे लिए समकक्ष हैं। वोट चोरी जैसे आरोप आधारहीन और संविधान का अपमान हैं।” आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के तहत 65 लाख हटाए गए मतदाताओं की सूची को जिला-वार और बूथ-वार वेबसाइट पर अपलोड किया, जिसमें नाम हटाने के कारण- जैसे मृत्यु, स्थानांतरण, डुप्लीकेट रिकॉर्ड या फर्जी नाम- विस्तार से दर्ज किए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि मतदाता सूची की जानकारी पारदर्शी और खोज योग्य होनी चाहिए, ताकि नागरिक यह जांच सकें कि उनका नाम सूची में है या नहीं। इस कदम को आयोग ने तत्काल लागू करते हुए सूची को सार्वजनिक किया, लेकिन इसके बाद विपक्ष का रुख और आक्रामक हो गया।

विपक्ष की प्रतिक्रिया: आग उगलते बयान

सूची के सार्वजनिक होने के बाद कांग्रेस और राजद ने इसे अपनी जीत के रूप में पेश किया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने संविधान को बचाने का काम किया है। यह चुनाव आयोग की हार है, जो बीजेपी के इशारे पर गरीबों और अल्पसंख्यकों के वोट छीनने की साजिश रच रहा था।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आयोग ने जानबूझकर प्रक्रिया को अस्पष्ट रखा और अब दबाव में सूची जारी की।

राजद नेता तेजस्वी यादव ने पटना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “चुनाव आयोग नीतीश कुमार और बीजेपी की कठपुतली बन गया है। 65 लाख मतदाताओं के नाम काटना, खासकर उन क्षेत्रों में जहां विपक्ष का प्रभाव है, यह लोकतंत्र की हत्या है। हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं, लेकिन आयोग की नीयत पर सवाल बरकरार हैं।” तेजस्वी ने यह भी दावा किया कि कई जीवित लोगों को मृत बताकर उनकी वोटर आईडी हटाई गई, जिसके लिए उन्होंने राघोपुर में सात लोगों से मुलाकात का हवाला दिया।

कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने तो आयोग के प्रति अपमानजनक टिप्पणी करते हुए कहा, “चुनाव आयोग बीजेपी का प्रवक्ता बनकर काम कर रहा है। अगर सीसीटीवी से निजता भंग होती है, तो 45 दिन तक डेटा क्यों रखा जाता है? अनुराग ठाकुर को मशीन रीडेबल लिस्ट कैसे मिल गई?” उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनौती देते हुए कहा, “आप कौन होते हैं हमें जवाब देने वाले? चोरी बंद करें, हम ‘वोट चोरी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल बंद कर देंगे।”

धमकियां और अपशब्द: विपक्ष का उग्र रवैया

विपक्ष का रवैया केवल आरोपों तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस और राजद नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाना बनाते हुए धमकी भरे बयान दिए। बिहार कांग्रेस के सह प्रभारी शाहनवाज आलम ने कहा, “अगर चुनाव आयोग के मन में मैल नहीं था, तो राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के तुरंत बाद जवाब क्यों नहीं दिया? बीजेपी को बचाने के लिए आयोग को आगे किया गया है।” राजद के मृत्युंजय तिवारी ने तो आयोग को “बीजेपी आयोग” करार देते हुए कहा, “यह केंद्र सरकार की स्क्रिप्ट पढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी यह प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों कर रहा है?”

कई विपक्षी नेताओं ने सोशल मीडिया पर भी आयोग के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया। एक एक्स पोस्ट में राजद समर्थक ने लिखा, “चुनाव आयोग अब बीजेपी का पालतू बन गया है। यह लोकतंत्र को बेच रहा है।” इस तरह की भाषा ने न केवल आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए, बल्कि संवैधानिक संस्था की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई।

क्या विपक्ष भूल गया कि एक संवैधानिक संस्था है आयोग

एक टीवी डिबेट में राजद के युवा प्रवक्ता ने चुनाव आयोग पर ‘लुच्चपना’, ‘कमीनगी’ और ‘ढीठाई’ जैसे आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। यह भूलते हुए कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, प्रवक्ता ने भाषाई मर्यादा को तार-तार किया। शो के होस्ट ने भी इन शब्दों को ‘अनुचित’ करार दिया।

संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान उसी संविधान से उपजता है, जिसे राहुल गांधी प्रतीकात्मक रूप से प्रदर्शित करते हैं। लेकिन उनके व्यवहार से नहीं लगता कि वे इसकी गरिमा को आत्मसात करते हैं।

राजद प्रवक्ता की भाषा उनकी पार्टी की संस्कृति को दर्शाती है, जहां अमर्यादित शब्दों का प्रयोग उनकी पहचान बन गया है। ‘वोट चोर’ जैसे शब्दों का बार-बार इस्तेमाल और वरिष्ठ नेताओं के प्रति असम्मानजनक रवैया राजद की छवि को धूमिल करता है। सवाल उठता है: क्या राजद अपने प्रवक्ताओं को चुनते समय भाषाई शिष्टाचार और मर्यादा पर ध्यान नहीं देता? यह अकेले इस प्रवक्ता की गलती नहीं, बल्कि राजद की प्रवक्ता चयन प्रक्रिया पर सवाल उठता है, जो ऐसी भाषा और व्यवहार को बढ़ावा देती है।

सत्तारूढ़ दलों का पलटवार

बीजेपी और जेडीयू ने विपक्ष के इस रवैये को अराजकता फैलाने की कोशिश करार दिया। बीजेपी प्रवक्ता सैयद शाहनवाज हुसैन ने कहा, “चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि वह निष्पक्ष है। विपक्ष अपनी हार की बौखलाहट में संवैधानिक संस्था को बदनाम कर रहा है। जो लोग फर्जी वोटरों को बचाना चाहते हैं, वे बिहार की जनता को जवाब दें।” जेडीयू की प्रवक्ता अंजुम आरा ने कहा, “विपक्ष को अगर पारदर्शिता पर भरोसा है, तो वह शपथपत्र के साथ सबूत पेश करे। धमकियां देना और गाली-गलौज करना उनकी हताशा दिखाता है।”

चुनाव आयोग का कड़ा रुख

चुनाव आयोग ने विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि एसआईआर प्रक्रिया में सभी राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट्स (बीएलए) ने सहयोग दिया है। आयोग ने वीडियो जारी कर दिखाया कि कांग्रेस और राजद के जमीनी कार्यकर्ता इस प्रक्रिया में सक्रिय हैं, जबकि उनके नेता दिल्ली में विरोध का नाटक कर रहे हैं। ज्ञानेश कुमार ने राहुल गांधी को सात दिन का अल्टीमेटम देते हुए कहा, “या तो वे अपने आरोपों के समर्थन में शपथपत्र दें, या देश से माफी मांगें।”

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि ड्राफ्ट सूची में गलतियों को ठीक करने के लिए 15 दिन का समय दिया गया है, और कोई भी मतदाता जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास अपील कर सकता है।

अराजकता की साजिश?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष का यह रवैया न केवल चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है, बल्कि बिहार में अराजकता का माहौल पैदा करने की कोशिश भी है। विपक्ष को अपनी बात रखने का हक है, लेकिन धमकी देना और अपशब्दों का इस्तेमाल लोकतंत्र की मर्यादा के खिलाफ है। यह उनकी हार की बौखलाहट है। कई विश्लेषकों ने यह भी चेतावनी दी कि इस तरह की सियासत से बिहार में मतदाताओं के बीच भ्रम और अविश्वास पैदा हो सकता है।

बिहार में मतदाता सूची विवाद ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि चुनावी मौसम में सियासत कितनी तीखी हो सकती है। चुनाव आयोग ने पारदर्शिता का दावा करते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन किया, लेकिन विपक्ष का आक्रामक रवैया और धमकी भरे बयान लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी हैं। सवाल यह है कि क्या यह विवाद सचमुच मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए है, या यह बिहार में अराजकता का माहौल बनाकर सियासी लाभ लेने की कोशिश है? आने वाले दिन इस सवाल का जवाब देंगे।

Topics: Voter List DisputeElectoral Politics BiharCongressVoter List Dispute in BiharSupreme CourtElection Commission of IndiaTejashwi YadavBihar Assembly Elections 2025SIR
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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