30 मार्च, 2022 का दिन खास था। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी सफेद टोयोटा मिराई से संसद पहुंचे थे। यह सिर्फ एक वाहन की सवारी नहीं थी, बल्कि एक विचार की शुरुआत थी। मिराई, का जापानी में अर्थ होता है ‘भविष्य’। वाकई यह भारत के ऊर्जा भविष्य की झलक थी। गडकरी का यह कदम केवल तकनीक के प्रति समर्थन नहीं था, बल्कि एक संदेश था, ‘‘हम पर्यावरण के प्रति गंभीर हैं और भारत का भविष्य हाइड्रोजन में छिपा है। यह भविष्य का ईंधन है- सस्ता, स्वदेशी व प्रदूषण मुक्त।’’
तीन वर्ष बाद मार्च 2025 में जब वे फिर से हाइड्रोजन फ्यूल सेल कार से संसद आए तो यह सिर्फ प्रदर्शन नहीं, बल्कि नीति का हिस्सा था। इस बार उन्होंने स्पष्ट कहा, “भारत को आत्मनिर्भर बनाना है, प्रदूषण से मुक्त करना है और ऊर्जा के नए साधनों को अपनाना है।” इन तीन वर्षों में पायलट परियोजनाएं, सरकारी बजट, उद्योग सहभागिता, मार्ग परीक्षण-ये सभी स्वरूप आकार लेने लगे। तो क्या यह भारत की फ्यूचर कार है? भारत में हाइड्रोजन मोबिलिटी सिर्फ एक प्रयोग नहीं, बल्कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता और स्वच्छ पर्यावरण की दिशा में एक ठोस कदम बन चुकी है। जब केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी दूसरी बार संसद हाइड्रोजन कार से पहुंचे, तो यह संकेत था कि देश में अब यह तकनीक आकार ले चुकी है। 2030 तक 10 लाख हाइड्रोजन वाहन सड़कों पर उतारने का लक्ष्य इसका प्रमाण है।
भविष्य की एक झलक
गडकरी हाइड्रोजन को ‘भविष्य का ईंधन’ बताते हैं। इसकी वजह है, हाइड्रोजन फ्यूल सेल वाहन हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बिजली बनाता हैं, जिससे केवल पानी की बूंदें निकलती हैं। न धुआं, न प्रदूषण। एक बार टैंक भरने पर कार 600–700 किमी. चलती है और 5 मिनट में रीफिल हो जाती हैं। गडकरी के अनुसार, 80 रुपये प्रति किलो हाइड्रोजन से 400 किमी. की दूरी तय की जा सकती है। वे कहते हैं, ‘‘हमें पेट्रोल-डीजल के आयात पर निर्भरता कम करनी होगी। हम ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करेंगे, इसके स्टेशन बनाएंगे और भारत इसे निर्यात करने वाला देश बनेगा।’’
पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में हाइड्रोजन कारें सस्ती हैं। ग्रीन हाइड्रोजन देश में ही उत्पादन हो सकता है, इसलिए पैसे की बचत होगी। महत्वपूर्ण बात यह कि लंबी दूरी के लिए यह इलेक्ट्रिक-बैटरी वाहनों की तुलना में अधिक सफल है। यह न सिर्फ सड़कों को, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को भी नई दिशा दे सकती है।
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन

25 जुलाई, 2025 को भारत ने चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (आईसीएफ) में निर्मित पहली स्वदेशी हाइड्रोजन-चालित ट्रेन का सफल परीक्षण किया। इस उपलब्धि के साथ भारत, जर्मनी, फ्रांस और जापान जैसे देशों की सूची में शामिल हो गया है, जो रेलवे में हाइड्रोजन तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। यह कदम ‘नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन’ लक्ष्य की दिशा में एक बड़ा प्रयास है।
आईसीएफ में निर्मित और रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड ऑर्गनाइजेशन (आरडीएसओ) लखनऊ द्वारा डिजाइन की गई इस हाइड्रोजन ट्रेन में कुल 8 कोच हैं, जिनमें दो कोच हाइड्रोजन सिलेंडर और फ्यूल सेल सिस्टम के लिए हैं। यह ट्रेन 110 किमी/घंटा की रफ्तार से चलती है और एक बार में 2,638 यात्री ले जा सकती है। इसका 1,200 हॉर्सपावर वाला इंजन इसे दुनिया की सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेनों में शामिल करता है।
अन्य देशों में 500-600 हॉर्सपावर वाले इंजन हैं। भारतीय रेलवे पहले चरण में 35 हाइड्रोजन ट्रेनों का संचालन करेगा। एक ट्रेन की लागत लगभग 80 करोड़ रुपये और एक मार्ग के लिए ढांचा तैयार करने में 70 करोड़ रुपये खर्च होंगे। रेल मंत्रालय ने 111.83 करोड़ रुपये से एक पायलट परियोजना शुरू की है।
इसका उद्देश्य डीजल इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट्स (डीईएमयू) ट्रेनों को हाइड्रोजन ईंधन में बदल कर उत्तर रेलवे में जींद-सोनीपत खंड पर चलाना है। इसी के तहत दिल्ली मंडल के अंतर्गत हरियाणा में जींद से सोनीपत तक 89 किमी मार्ग पर इसका परीक्षण किया गया, जो काफी हद तक सफल रहा। भविष्य में कालका-शिमला जैसे पर्यटन मार्गों पर भी यह ट्रेन चलाई जाएगी। रेलवे का लक्ष्य 2030 तक ‘नेट-ज़ीरो कार्बन एमिटर’ बनना है। इसके लिए 2,800 करोड़ की योजना के तहत हाइड्रोजन ट्रेन, ईंधन उत्पादन, भंडारण और वितरण प्रणाली विकसित की जा रही है।
हाइड्रोजन ट्रेन जरूरी क्यों? : हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेनों का परिचालन विशेष रूप से उन क्षेत्रों में उपयोगी होगा, जहां रेलवे विद्युतीकरण कठिन या महंगा है। भारत ने 2023 में ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ पहल शुरू की थी ताकि पर्वतीय और धरोहर मार्गों पर डीजल की जगह स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग किया जा सके। इस ट्रेन की खास बात यह है कि यह हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के संयोजन से बिजली उत्पन्न करती है और किसी भी हानिकारक गैस का उत्सर्जन नहीं करती। हाइड्रोजन तकनीक न केवल कार्बन उत्सर्जन घटाएगी, बल्कि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटन को बढ़ावा देगी। यह कदम ऊर्जा सुरक्षा,स्वच्छ पर्यावरण और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ी पहल है।
दुनिया में हाइड्रोजन ट्रेन : भारत से पहले पांच देश-जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और चीन-हाइड्रोजन ट्रेनों का संचालन कर चुके हैं।
पायलट परियोजना
हालांकि, भारत में हाइड्रोजन वाहन अभी प्रारंभिक चरण में ही हैं, लेकिन नीति और उद्योग सहभागिता इस पालयट परियोजना को स्पष्ट दिशा प्रदान कर रही है। आज लेह में 5 हाइड्रोजन बसें चल रही हैं, जो 350 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम करने और 230 टन शुद्ध ऑक्सीजन उत्पन्न करने में मदद करेगा, जो लगभग 13,000 पेड़ों से उत्सर्जित आक्सीजन के बराबर है। सोचिए, बिना एक पेड़ लगाए, हमने प्रकृति को कितना लौटाया! क्या यह स्वच्छ हवा वापस पाने की दिशा में बड़ा कदम नहीं है? यह सिर्फ तकनीकी प्रदर्शन नहीं, बल्कि भारत की वायु गुणवत्ता सुधार यात्रा का एक छोटा, लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो स्वस्थ जीवन की दिशा में एक बड़ा कदम है। भारत में पायलट परियोजना के तहत हाइड्रोजन फ्यूल सेल कार टोयोटा मिराई का परीक्षण पहले से ही चल रहा है। हालांकि, अभी देश में कुछ दर्जन हाइड्रोजन वाहन ही हैं, पर नीति, उद्योग और पायलट परियोजनाओं के जरिए इस दिशा में तेजी से काम हो रहा है। भारत को ग्रीन हाइड्रोजन का वैश्विक केंद्र बनाने के उद्देश्य से 4 जनवरी, 2023 को नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन शुरू हुआ था। इसके तहत 19,744 करोड़ का बजट है और 9 रिफ्यूलिंग स्टेशन बनाए जा रहे हैं। देश में 5 पायलट परियोजनाएं चल रही हैं, जिनमें 37 हाइड्रोजन वाहन (15 फ्यूल‑ सेल और 22 H2‑ICE गाड़ियां) शामिल हैं। ये वाहन देश के 10 प्रमुख मार्गों पर चलेंगे, जैसे-ग्रेटर नोएडा-दिल्ली-आगरा, भुवनेश्वर-कोणार्क-पुरी, अमदाबाद- सूरत-मुंबई आदि। इसके लिए लगभग 208 करोड़ का बजट रखा गया है।
भागीदारी और भविष्य
नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन में रिलायंस, टाटा मोटर्स, अशोक लीलैंड, एनटीपीसी, एचपीसीएल, बीपीसीएल, आईओसी जैसी कंपनियां साझीदार हैं। गुजरात के जामनगर में रिलायंस करीब 25 वाणिज्यिक वाहनों (22 H2‑ICE ट्रक, 2 फ्यूल‑-सेल ट्रक व 1 बस) का परीक्षण कर रही है। 2030 तक भारत 50 लाख टन हाइड्रोजन उत्पादन कर सकता है, जिससे 1 लाख करोड़ का ईंधन आयात बच सकता है। हालांकि, इसमें कुछ चुनाैतियां हैं, जैसे- भारत में हाइड्रोजन कारों की सीमित उपलब्धता, हाइड्रोजन का उत्पादन, परिवहन व भंडारण के साथ-साथ हाइड्रोजन रीफ्यूलिंग स्टेशनों की भी कमी है। फिर भी, सरकार और कंपनियां इस दिशा में तेजी से काम कर रही हैं। गडकरी का मानना है कि अगले कुछ सालों में हाइड्रोजन कारें आम लोगों की पहुंच में होंगी। सरकार का लक्ष्य 2030 तक हाइड्रोजन इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाकर इसे मुख्यधारा में लाने का है।
दुनिया में स्थिति
दुनिया में हाइड्रोजन कारें अभी शुरुआती दौर में हैं। जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, अमेरिका और चीन जैसे देशों ने इस तकनीक को अपनाया है। 2022 तक दुनिया भर में लगभग 70,200 हाइड्रोजन फ्यूल‑ सेल वाहन बिक चुके थे, लेकिन 2023‑-24 में बाजार में इनकी हिस्सेदारी कम रही। बैटरी इलेक्ट्रिक वाहन की तुलना में इनकी बिक्री लगभग 0.02 प्रतिशत रही। टोयोटा मिराई एक प्रमुख मॉडल है, जिसकी 2022 में दुनियाभर में 3,924 इकाइयां बिकीं। 2023 में 4,023 और 2024 में केवल 1,702 इकाइयां बिकीं। जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, अमेरिका, चीन में हाइड्रोजन कार उपलब्ध है, पर इनकी बिक्री बहुत सीमित है। कुल मिलाकर, 2023 तक दुनिया भर में लगभग 87,600 हाइड्रोजन फ्यूल सेल वाहन चल रहे थे। इनमें अधिकतर जापान और दक्षिण कोरिया में थे। दुनिया में दिसंबर 2024 तक हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशन की संख्या 980 थी। इनमें 550 से अधिक एशिया (जापान, चीन, दक्षिण कोरिया सहित) और अमेरिका में 52 (50 कैलिफोर्निया, 1 हवाई व 1 वाशिंगटन) हैं। भारत इस तकनीक को तेजी से अपना रहा है और हाइड्रोजन वाहनों का निर्माता-निर्यातक बनने की दिशा में अग्रसर है।
एक नई शुरुआत
भारत में हाइड्रोजन मोबिलिटी की दिशा में एक नई शुरुआत हो चुकी है। सरकार टोयोटा मिराई जैसी हाइड्रोजन कारों के प्रदर्शन के लिए टोयोटा किर्लोस्कर औरआईसीएटी के साथ मिलकर काम कर रही है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत देश में 50 लाख मीट्रिक टन प्रति वर्ष हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है, जिससे एफसीईवी (फ्यूल सेल इलेक्ट्रिक वाहन) को बढ़ावा मिलेगा।
हाइड्रोजन कारें लंबी दूरी, कम रीफ्यूलिंग समय और शून्य कार्बन उत्सर्जन जैसी खूबियों के कारण ईवी के बाद अगली क्रांति मानी जा रही हैं। हालांकि, बुनियादी ढांचे और लागत जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं, पर सरकार और उद्योग जगत मिलकर तेजी से समाधान की ओर बढ़ रहे हैं। मार्केट रिसर्च फ्यूचर के अनुसार, भारत का हाइड्रोजन फ्यूल सेल वाहन बाजार 2024 में लगभग 242.67 मिलियन अमेरिकी डॉलर था। यह उद्योग 2025 में 393.74 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2035 तक 4,724.86 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है। इस अवधि (2025-35) के दौरान भारत के हाइड्रोजन फ्यूल सेल वाहन बाजार की वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) लगभग 25.345 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
भारत की विशाल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता इसे हरित हाइड्रोजन उत्पादन का वैश्विक केंद्र बना सकती है। यह न केवल पर्यावरण को बचाएगा, बल्कि देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर भी ले जाएगा।


















