आगामी 1 सितम्बर को चीन अपने यहां शंघाई सहयोग संगठन के शीर्ष सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। इसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी भाग लेने वाले हैं और वहां राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन से अलग से चर्चा करने वाले हैं। इससे ठीक पहले चीन के विदेश मंत्री वांग यी कल भारत के दौरे पर आए हैं। कल ही उनके और भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की बातचीत हुई। इस वार्ता में विदेश मंत्री जयशंकर और उनके चीनी समकक्ष वांग यी ने द्विपक्षीय संबंधों पर अपने अपने देशों का दृष्टिकोण सामने रखा। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल है जो दोनों देशों के बीच जटिल संबंधों को सुधारने की दिशा में काफी कुछ संकेत करती है। यह वार्ता न केवल द्विपक्षीय मुद्दों पर केंद्रित थी, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी इसका महत्व है।
सब जानते हैं कि भारत और चीन के संबंध पिछले कुछ वर्षों से तनावपूर्ण रहे हैं, विशेषकर 2020 की गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद। सीमा पर सैन्य गतिरोध, विश्वास की कमी और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने दोनों देशों के बीच संवाद को जटिल बनाया हुआ था। ऐसे में वांग यी की भारत यात्रा और जयशंकर से मुलाकात एक संकेत है कि दोनों पक्ष अब संबंधों को पुनर्स्थापित करने की दिशा में गंभीर हैं।

वार्ता की शुरुआत करते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत-चीन संबंधों में किसी भी सकारात्मक प्रगति की नींव सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मतभेदों को विवाद या संघर्ष में नहीं बदलना चाहिए। बेशक, भारतीय विदेश मंत्री का यह संदेश चीन को यह बताने का प्रयास है कि भारत अब अस्पष्टता नहीं, बल्कि स्पष्ट और रचनात्मक दृष्टिकोण चाहता है।
इसके साथ ही जयशंकर ने द्विपक्षीय व्यापार और आर्थिक सहयोग की ओर भी संकेत किया। इसके जवाब में चीन की ओर से वांग यी ने भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने की इच्छा जताई। उन्होंने तीर्थयात्राओं की बहाली, सीमा व्यापार और कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों पर सहयोग की बात की। वांग ने यह संकेत देन की कोशिश की कि चीन आर्थिक मोर्चे पर भारत के साथ संबंधों को मजबूत करना चाहता है।
अपने वक्तव्य में जयशंकर ने कहा कि जब दुनिया के दो सबसे बड़े देश मिलते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर भी चर्चा होती है। भारत और चीन दोनों बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की बात कर रहे हैं, जिसमें एशिया की भूमिका को केंद्र में रखा गया है। यह दिखाता है कि दोनों देश वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को लेकर संवाद करना चाहते हैं।
वांग यी की इस यात्रा का एक उद्देश्य सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ता को आगे बढ़ाना है। आज यानी 19 अगस्त को होने जा रही इस वार्ता में वांग भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल से चर्चा करेंगे। यह वार्ता 24वें दौर की होगी। डोवल से चर्चा के बाद वांग यी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भेंट करेंगे।

वांग ने अपने वक्तव्य में आपसी विश्वास को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि संबंधों में बाहरी हस्तक्षेप को रोकना जरूरी है। यह बयान अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की भूमिका को लेकर चीन की चिंता को दर्शाता है। भारत के लिए यह एक संतुलन साधने की चुनौती है, जहां उसे चीन के साथ संबंध सुधारने हैं, लेकिन अपनी स्वतंत्र विदेश नीति भी बनाए रखनी है।
दोनों विदेश मंत्रियों की चर्चा में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग की बात भी हुई। भारत ने SCO की अध्यक्षता के दौरान चीन के साथ करीबी सहयोग किया था और अब दोनों देश इन मंचों का उपयोग आपसी समझ बढ़ाने के लिए करना चाहते हैं।
यह वार्ता एक सकारात्मक संकेत है। इसे केवल प्रतीकात्मक नहीं माना जा सकता। विशेषज्ञों के अुनसार, भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि सीमा पर शांति के बिना संबंधों में सुधार संभव नहीं है। वहीं चीन आर्थिक और रणनीतिक कारणों से भारत के साथ संबंधों को पटरी पर लौटाना चाहता है। दोनों देशों ने विभिन्न मुद्दों पर आगे बढ़ने की इच्छा जताई है और आज के भूराजनीतिक वातावरण को देखते हुए यह आवश्यक भी प्रतीत होता है।
हालांकि, यह भी सच है कि संबंधों में वास्तविक प्रगति तभी होगी जब सीमा विवाद का कोई ठोस समाधान निकलेगा, विश्वास बहाली के उपाय लागू होंगे और दोनों देश पारस्परिक सम्मान के सिद्धांतों पर टिके रहेंगे। भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए चीन के साथ संवाद में बहुत सावधानी के साथ आगे बढ़ना होगा, जबकि चीन को भारत को चुभने वाले बिन्दुओं पर गौर करना होगा।

















