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त्रिपुण्ड: शिवभक्ति की अमिट पहचान

त्रिपुंड (त्रिपुण्ड्र) में हैं समाहित प्रणव, त्रिगुण और त्रिदेव। त्रिपुण्ड धारण का शास्त्रीय विधान और आध्यात्मिक रहस्य का वर्णन करता है शिवपुराण (विद्येश्वर संहिता, अध्याय 23-24, गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित)

Written byJyotsnaa G BansalJyotsnaa G Bansal
Aug 19, 2025, 08:39 pm IST
in धर्म-संस्कृति
भगवान शिव

भगवान शिव

आज के युग में जहां लम्बी साधनाएं कठिन प्रतीत होती हैं, वहां त्रिपुण्ड एक प्रतीकात्मक परंतु शक्तिशाली साधन है, जो हमें हर पल स्मरण कराता है कि हम शिव के अंश हैं। यह धर्म, विवेक और शुद्धि का संकेत है। जिसे कोई भी भक्त अपनाकर शिव से जुड़ सकता है। यही कारण है कि त्रिपुण्ड धारण को शिवभक्ति का सबसे सरल, सुलभ लेकिन प्रभावशाली रूप कहा गया है। इसे सिर्फ संत-महात्मा ही नहीं, बल्कि आम श्रद्धालु भी आसानी से अपने दैनिक जीवन में शामिल कर सकते हैं। शिवपुराण में इसे भोग और मोक्ष दोनों देने वाला बताया गया है-यह सांसारिक सुख के साथ-साथ आध्यात्मिक उत्कर्ष का भी मार्ग है।

शिवपुराण के विद्येश्वर संहिता (अध्याय 23–24) में त्रिपुण्ड धारण की विधि, महत्ता और दिव्यता का गूढ़ वर्णन मिलता है।

शिवपुराण के अनुसार, ललाट अर्थात माथे आदि सभी निर्दिष्ट स्थानों में जो भस्म से तीन रेखाएँ बनायी जाती हैं, उन्‍हीं को विद्वानो ने त्रिपुण्ड कहा है। इन तीन रेखाओं में ‘ॐ’ के तीन अक्षर – अ, उ, म, अलग-अलग देवता, शक्तियाँ, वेद, अग्नियाँ और गुण समाए हुए हैं।
ललाट पर भौंहों के मध्य भाग से भौंहों के अंत भाग जितना बड़ा त्रिपुण्ड ललाट में धारण करने का उल्लेख है। मध्यमा और अनामिका अंगुली से दो रेखाएं करके अंगूठे द्वारा बीच में सीधी रेखा त्रिपुण्ड कहलाती है। अथवा बीच की तीन अंगुलियों से भस्म लेकर यत्नपूर्वक भक्तिभाव से ललाट में त्रिपुण्ड धारण किया जा सकता है।

  • त्रिपुण्ड की तीनों रेखाओं में से प्रत्येक रेखा में नौ-नौ देवता हैं, जो विभिन्न अंगों में स्थित हैं।
  • त्रिपुण्ड की प्रथम रेखा के नौ देवता हैं – प्रणव का प्रथम अक्षर अकार, गार्हपत्य अग्नि, पृथ्वी, धर्म, रजोगुण, ऋग्वेद,
  • क्रियाशक्ति, प्रातः सवन तथा महादेव 
  • दूसरी रेखा के नौ देवता हैं- प्रणव का दूसरा अक्षर उकार, दक्षिणाग्नि, आकाश, सत्वगुण, यजुर्वेद, मध्यदिन सवन, इच्छाशक्ति, अंतरात्मा तथा महेश्वर
  • तीसरी रेखा के नौ देवता हैं- प्रणव का तीसरा अक्षर मकार, आहवनीय अग्नि, परमात्मा, तमोगुण, द्युलोक, ज्ञानशक्ति, सामवेद, तृतीय सवन तथा शिव।

शिवपुराण में बताया गया है कि त्रिपुण्ड (भस्म से बनाई गई तीन रेखाएँ) को केवल माथे पर ही नहीं, बल्कि शरीर के विभिन्न अंगों जैसे कि माथा, दोनों कान, दोनों नेत्र, दोनों नासिका, मुंह, कंठ, दोनों हाथ, दोनों कोहनी, दोनों कलाई, हृदय आदि में भी धारण ।
एकाग्रचित्त हो इन सोलह स्थान में त्रिपुण्ड्र धारण करें- सिर, माथा, कण्ठ, दोनों कंधों, दोनों भुजाओं, दोनों कोहनियों, दोनों कलाइयों में, हदय में, नाभि में, दोनों पसलियों में तथा पृष्ठभाग में। तब दोनों अश्चिनीकुमारों का, शिव, शक्ति, रुद्र, ईश, नारद का और वामा आदि नौ शक्तियों का पूजन करके उन्हें त्रिपुण्ड में धारण करें। अश्विनीकुमार दो हैं-नासत्य और दस्र। ये सब मिलकर सोलह देवता हैं।

व्यस्त जीवन या सीमित समय में पांच स्थानों पर भी त्रिपुण्ड धारण किया जा सकता है: मस्तक, दोनों भुजाएं, हृदय और नाभि। इन पांच स्थानों को भस्म त्रिपुण्ड धारण करने के योग्य बताया गया है। यथासम्मव देश तथा काल को ध्यान में रखकर भस्म को अभिमंत्रित करना चाहिए तथा भस्म को जल में मिला कर त्रिपुण्ड आदि लगायें।

त्रिनेत्रधारी, तीनों गुणों के आधार तथा तीनों देवताओं के जनक, परब्रह्म परमात्मा भगवान्‌ शिव का स्मरण करते हुए “नमः शिवाय” कहकर ललाट में, “ईशाभ्यां नमः” ऐसा कहकर दोनों पार्श्व भागों में, “बीजाभ्यां नमः” यह बोलकर दोनों कलाइयों में, “पितृभ्यां नमः” कहकर नीचे के अङ्गमें, “उमेशाभ्यां नमः” कहकर ऊपर के अङ्ग में तथा “भीमाय नमः” कहकर पीठ में और सिर के पिछले भाग में त्रिपुण्ड लगाना चाहिये ।

त्रिपुण्ड धारण केवल भस्म लगाना नहीं

त्रिपुण्ड धारण करना केवल माथे पर भस्म लगाना नहीं है। जब कोई भक्त “नमः शिवाय” कहकर त्रिपुण्ड लगाता है, तो वह अपने शरीर में देवताओं और शक्तियों का स्वागत करता है। यह एक आंतरिक साधना है, जो शिव के गुणों—शुद्धता, संयम, श्रद्धा और ज्ञान-को हमारे भीतर जाग्रत करती है।

शिवपुराण के अनुसार, त्रिपुण्ड से भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति संभव है। यह एक सरल पर गहराई से जुड़ी हुई शिवभक्ति की क्रिया है, जो तन, मन और आत्मा तीनों को पवित्र कर देती है।

 

Topics: त्रिपुण्य क्या हैत्रिपुण्ड कैसे लगाएंत्रिपुंड तिलकत्रिपुंड का अर्थसावन माहत्रिपुंड श्लोकशिवभक्तित्रिपुण्डभोग और मोक्षबीजाभ्यां नमःशिवपुराण के विद्येश्वर संहिताशक्तिशाली साधन
Jyotsnaa G Bansal
Jyotsnaa G Bansal
Jyotsnaa G Bansal Reiki Grandmaster | Numerologist | IKS & Vedic Learner & Seeker | Author | Researcher | Columnist
  • Presented research papers from IKS (Purans, Ayurveda, Numerology, Chakra System etc.)at prestigious forums such as St. Stephen’s College (DU), Central Sanskrit University, Shri LalBahadur Shastri National Sanskrit University & many more.
  • Her paper features in First-10 out of the top 66 papers (from 300+ submissions) at DU Conference, unveiled by Hon’ble Education Minister Sh. Dharmendra Pradhan.
  • First female numerologist to publish Numerology research papers in International Journal of Applied Research (RJIF 8.4)
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  • Articles published in Newspapers, Magazines, Astrological Journals and Magazines.
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