स्वामी लक्ष्मणानंद: एक सन्यासी जिन्होंने हिमालय की साधना भूमि छोड़कर वंचितों की सेवा को बनाया जीवन का धर्म
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स्वामी लक्ष्मणानंद: एक सन्यासी जिन्होंने हिमालय की साधना भूमि छोड़कर वंचितों की सेवा को बनाया जीवन का धर्म

स्वामी लक्ष्मणानंद ने जीवन के अंतिम क्षण तक अधर्म के खिलाफ संघर्ष किया। कई बार उन पर हमले हुए, उन्हें धमकियाँ मिलीं। 2007 में उन्होंने मीडिया के सामने कहा था कि उनकी हत्या की साजिश रची जा रही है। एक साल बाद उनकी हत्या कर दी गई।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद
Aug 17, 2025, 10:18 am IST
inभारत, ओडिशा
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती

भारत की आध्यात्मिक परंपरा में सन्यासियों का प्रमुख स्थान रहा है। कोई हिमालय की गुफाओं में तप करता है तो कोई एकांत में समाधि लगाता है। किंतु कुछ विरले महापुरुष ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने व्यक्तिगत मोक्ष की साधना को छोड़कर समाज के उत्थान को ही अपना तप बनाया। स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ऐसे ही संन्यासी थे। वेदांत के प्रखर विद्वान और “वेदांत केसरी” कहे जाने वाले इस महात्मा ने हिमालय की साधना भूमि छोड़कर ओडिशा के पिछड़े वंचित-जनजातीय समाज को अपने जीवन का केंद्र बनाया।

2008 में जन्माष्टमी के दिन उनकी हत्या हुए 17 वर्ष बीत चुके हैं किंतु उनकी तपस्या, उनके प्रयास और जनजातीय समाज के लिए उनका संघर्ष आज भी जीवंत है।

हिमालय से कंधमाल तक : सेवा की राह

स्वामी लक्ष्मणानंद का जन्म 1924 में ओडिशा के अंगुल ज़िले में हुआ था। युवावस्था में वे हिमालय की ओर चले गए और वर्षों तक एकांत में तप किया। परंतु एक दिन उन्हें किसी संत ने मार्गदर्शन दिया कि एकांत साधना से अधिक बड़ा तप समाज के वंचित वर्गों के बीच काम करना है।

इस प्रेरणा से वे 1965 में ओडिशा लौटे और कंधमाल ज़िले के चकापाद पहुंचे। उस समय यह इलाका दुर्गम, पिछड़ा और शिक्षा से वंचित था। वहां पहुंचना आसान नहीं था । स्वामी जी पैदल ही पहाड़ियों और जंगलों को पार कर पहुंचे। 1969 में उन्होंने चकापाद में पहला संस्कृत विद्यालय शुरू किया।

शिक्षा : समाजिक जागरण का आधार

स्वामी जी का दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा ही सशक्तिकरण की कुंजी है। उन्होंने संस्कृत विद्यालय और बाद में संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना की। आज इन संस्थानों में सैकड़ों छात्र-छात्राएं पढ़ाई कर रहे हैं, जिनमें अधिकांश वनवासी समाज से आते हैं।

स्वामी जी ने वनवासी बच्चों को वेद, सूत्र और शास्त्र पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे शास्त्री और उपशास्त्री तक की कक्षाएं यहां शुरू हुईं। आज इन संस्थानों से निकले अनेक छात्र-छात्राएं अध्यापक, प्रशासनिक अधिकारी और संस्कृत शिक्षक बनकर समाज की सेवा कर रहे हैं।

स्त्री-शिक्षा और समानता के पक्षधर

स्वामी लक्ष्मणानंद का मानना था कि समाज तभी प्रगति कर सकता है जब महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार और अवसर मिले। इसी विचार से उन्होंने 1988 में जलेशपेटा में “शंकराचार्य कन्याश्रम” की स्थापना की। यहाँ सैकड़ों जनजातीय बच्चियाँ आवासीय व्यवस्था में शिक्षा प्राप्त करती हैं।यही वह स्थान था जहाँ अगस्त 2008 में जन्माष्टमी की रात स्वामी जी की हत्या हुई। किंतु यह कन्याश्रम आज भी उनके मिशन को आगे बढ़ा रहा है।

व्यावहारिक शिक्षा

स्वामी जी केवल किताबों की शिक्षा तक सीमित नहीं रहे। उनका मानना था कि बच्चों को जीवनोपयोगी कौशल भी आने चाहिए। इसलिए उन्होंने खेती, पशुपालन और फलोत्पादन की शिक्षा भी दी। छात्र पढ़ाई के साथ-साथ खेतों में काम करना सीखते थे।आज भी उनके संस्थानों में छात्राएँ गीता पाठ, वेद मंत्रों का उच्चारण और शिव महिम्न स्तोत्र का जाप करती हैं। साथ ही आधुनिक शिक्षा—कंप्यूटर प्रशिक्षण तक उपलब्ध है।

आर्थिक स्वावलंबन और पर्यावरण संरक्षण

स्वामी लक्ष्मणानंद को “आर्थिक योद्धा” और “हरित क्रांतिकारी” भी कहा जा सकता है। उन्होंने जनजातीय समाज को केवल जंगलों पर निर्भर रहने के बजाय कृषि अपनाने के लिए प्रेरित किया।स्थानीय परंपरागत ज्ञान का उपयोग करते हुए उन्होंने पहाड़ियों से बहने वाले झरनों का पानी संग्रहित करने के लिए तालाब और जलाशय बनवाए। इससे कंधमाल में कृषि उत्पादन बढ़ा।आज कंधमाल जैविक हल्दी और अन्य कृषि उत्पादों के लिए विश्वप्रसिद्ध है। यह वही क्रांति थी जिसकी नींव स्वामी जी ने रखी।

वनवासी संस्कृति का संरक्षण

स्वामी जी का मानना था कि जनजातीय समाज भारत की संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्हें “पिछड़ा” मानना गलत है। उन्होंने जनजातीय परंपराओं को भारतीय मूल से जोड़ने का प्रयास किया।

उन्होंने कंधमाल में जगन्नाथ रथयात्रा शुरू की। जनजातीय देवी “धरनी पेनु” (माता पृथ्वी) की पूजा को पुनर्स्थापित किया। उनका उद्देश्य था कि जनजातीय लोग अपनी जड़ों और भारतीय संस्कृति से जुड़े रहें।

कन्वर्ज़न और अधर्म के खिलाफ संघर्ष

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती किसी पंथ या मजहब के खिलाफ नहीं थे। वह अधर्म के खिलाफ थे । वे जानते थे कि किसी भूखे को भोजन देकर उसके पूर्वजों से काट कर उसके गले में सलीव डाल देना धर्म नहीं बल्कि अधर्म है। वे जीवन के अंतिम सांस तक इस अधर्म के खिलाफ लड़ते रहे ।

उन्होंने जीवन के अंतिम क्षण तक इस अधर्म के खिलाफ संघर्ष किया। कई बार उन पर हमले हुए, उन्हें धमकियाँ मिलीं। 2007 में उन्होंने मीडिया के सामने कहा था कि उनकी हत्या की साजिश रची जा रही है। एक साल बाद उनकी हत्या कर दी गई।

हत्या और अनुत्तरित प्रश्न

23 अगस्त 2008, जन्माष्टमी की रात जलेशपेटा कन्याश्रम में स्वामी जी और उनके चार सहयोगियों की हत्या कर दी गई। माओवादियों ने इसकी जिम्मेदारी ली। किंतु परिस्थितिजन्य साक्ष्य बताते हैं कि माओवादी केवल “कॉन्ट्रैक्ट किलर” थे, असली साजिशकर्ता अब भी अज्ञात हैं। दो न्यायिक आयोगों ने जाँच रिपोर्ट सौंपी, परंतु वे अब तक सार्वजनिक नहीं हुईं। स्वामी जी की हत्या आज भी अनेक सवाल छोड़ती है।

उनका अधूरा मिशन आज भी जीवंत

हत्या के बाद भी उनका मिशन रुका नहीं। आज जलेशपेटा कन्याश्रम में शिक्षण, संस्कृत विद्यालय, यज्ञमंडप, गौशाला और आधुनिक शिक्षा केंद्र सक्रिय हैं। स्थानीय जनजातीय समाज उन्हें एक संत के रूप में पूजता है जिसने उनके लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया।

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती का जीवन एक साधारण सन्यासी की साधना नहीं था। यह एक विराट तपस्या थी वंचितों के लिए, जनजातीय समाज के लिए, भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए।

उन्होंने व्यक्तिगत मोक्ष नहीं, बल्कि सामूहिक उत्थान को अपनी साधना बनाया। अधर्म के खिलाफ लड़ते हुए उन्होंने बलिदान दिया। आज उनकी याद केवल एक संत के रूप में नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक, शिक्षाविद, पर्यावरण योद्धा और संस्कृति रक्षक के रूप में की जाती है।

 

 

Topics: ओडिशास्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्याकंधमालबलिदान दिवसजलेशपेटाकन्वर्जनवेदांत केसरीधर्मांतरणवनवासी समाजहिन्दू संतजन्माष्टमी
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