“स्वतंत्रता में स्व और तंत्र है। स्व के आधार पर तंत्र चलता है तब स्वतंत्रता आती है। भारत एक वैशिष्ट्यपूर्ण देश है। वह दुनिया में सुख शांति लाने के लिए जीता है। दुनिया को धर्म देने के लिए जीता है। इसलिए हमारे राष्ट्रध्वज के केंद्र में धर्मचक्र है। ये धर्म सबको साथ लेकर, सबको जोड़कर, सबको उन्नत करता है। इसलिए लोक में और परलोक में सबको सुख देने वाला है। ये धर्म दुनिया को देने के लिए भारत है, ये हमारी विशेषता है। ये देने के लिए भी तंत्र हमारा होना पड़ेगा। स्व के आधार पर चलना पड़ेगा।”आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘उत्कल विपन्न सहायता समिति, ओडिशा ’ द्वारा भुवनेश्वर में आयोजित कार्यक्रम में पू. सरसंघचालक डा. मोहन भागवत जी ने राष्ट्रध्वज फहराया और उपस्थित लोगों को सम्बोधित किया।

पूर्वजों के संघर्ष को न भूलें, नई चुनौती के लिए तैयार
उन्होंने कहा कि देश में सबको सुख, शांति, प्रतिष्ठा दिलाने के साथ साथ लडखडाता हुआ विश्व के समक्ष जो समस्याएं है उसे अपनी दृष्टि के आधार पर धर्म दृष्टि के आधार पर नई सुख शांति युक्त दुनिया बनाने वाला उपाय देना हमारा कर्तव्य है। इस प्रकार का एक टास्क हमारे स्वतंत्र देश के सामने है उसके लिए हम सबको वैसा ही परिश्रम, वैसा ही त्याग और वैसा ही बलिदान करना पड़ेगा जैसा इस स्वतंत्रता को हमको प्राप्त कराने के लिए हमारे पूर्वजों ने किया था।
उन्होंने अपने उदवोधन में कहा कि स्वाधीनता प्राप्त होकर अठहत्तर साल हो गए। प्राप्त करने के लिए कितने साल प्रयास हुए ऐसा सोचते तो ध्यान में आता है, ब्रिटिश के गुलामी से आजाद होने का पहला प्रयास 1857 में हुआ और तब से लगातार यह प्रयास चलते रहे, अनेक मार्गों से चलते रहे। सशस्त्र अथवा निशस्त्र और सतत तीन पीढ़ी तक लोग अपना प्राण अर्पण करते रहे, जेल में जाते रहे। परिस्थितियों बदलते रही लेकिन उस समय के समाज और नेताओं ने ये सारे प्रयास तब तक जारी रखे जब तक कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए परिस्थितियां अनुकूल नहीं हो गईं। उन्होंने कहा कि मेरा स्वयं जन्म स्वाधनता के बाद का है। अठहत्तर साल बाद हम लोगों देश की स्वतंत्रता के लिए किये गये प्रयासों का प्रयत्नपूर्वक स्मरण करना पड़ता है क्योंकि हमारे पूर्वजों ने कमाया । हमको तो अनायास मिल गया लेकिन इसको कमाने में भी बड़ा परिश्रम लगा है और इसको रखने और बढ़ाने में भी परिश्रम लगेगा।
स्वतंत्रता का मूल उद्देश्य और विश्व में भारत की भूमिका
उन्होंने कहा कि देश पंद्रह अगस्त 1947 स्वतंत्र हो गया। अंग्रेज चले गए हमारे अपने लोगों के अधीन ये देश हो गया। उन्होंने कहा कि हर पाँच साल के बाद निर्वाचित करते है, वो हमारे अपने लोग होते । हम अपना राज्य चला रहे हैं हम अपना कारोबार चला रहे। हम स्वाधीन हो गए है लेकिन जिस कारण से स्वाधीन हुए. अपने देश में सबको सुख, सुरक्षा शांति प्रतिष्ठा मिले और विश्व जो आज लड़खड़ा रहा है आज की को दुनिया की समस्याओं को देख कर देख दौ हज़ार वर्षों तक अनेक प्रयोग करके भी उसको समस्याओं के निदान मिले नहीं है उसे विश्व को अपनी दृष्टि के आधार पर धर्म दृष्टि के आधार पर नई सुख शांति युक्त दुनिया बनाने वाला उपाय देना यह कर्तव्य कि हम स्वयं बने और विश्व को बनाएं। इस प्रकार का एक टास्क हमारे स्वतंत्र देश के सामने है उसके लिए हम सबको वैसा ही परिश्रम, वैसा ही त्याग और वैसा ही बलिदान करना पड़ेगा जैसा इस स्वतंत्रता को हमको प्राप्त कराने के लिए हमारे पूर्वजों ने किया था।
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उन्हंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते समय यह नहीं सोचा कि अनुकूलता जब आएगी तब काम होगा। अनुकूलता अभी नहीं है, यह जानकर भी सतत प्रयास के द्वारा उन्होंने यह भावना जनमानस में जागृत रखी। वैसा ही हमको परिस्थिति का विचार किए बिना हमारे देश का सुख शांति एकता सबको सम्मान सबको प्रतिष्ठा करनी होगी। इसके साथ साथ विश्व में कलह मुक्ति, विश्व में पर्यावरण समस्या आदि बातों का निदान करके नहीं सुखी सुंदर दुनिया बनाने वाला विश्व गुरु भारत खड़ा करना है। इस अपने कर्तव्य का स्मरण आज हम सब लोग करें।
उन्होंने कहा कि हमारे राष्ट्रध्वज में केसरिया रंग ऊपर है। यह त्याग का कर्मशीलता का ज्ञान का रंग। इसी तरह शुद्ध चरित्र निर्मलता का प्रतीक सफेद रंग बीच में है और यह दोनों जब एक साथ आते हैं शुद्ध चरित्र लोग निस्वार्थ वुद्धि से त्यागपूर्वक जब कर्म करते हैं, परिश्रम करते, ज्ञान की आराधना करते हैं तो फिर जो समृद्धि आती है। वह समृद्धि का, लक्ष्मी, जी का रंग है य़ यह रंग हरा है। यह सब हमको धर्म के आधार पर करना है। इसलिए हमारे राष्ट्रीय ध्वज में जो धर्म चक्र है वह हमें क्या करना हो और किस प्रकार करना है दोनों बात का बोध कराता है । इसी तरह हम सब लोग अपने कर्तव्य का स्मरण करें और उस कर्तव्य की दिशा में छोटे छोटे संकल्प लेकर अपने जीवन में आगे बढ़े । जैसे आज कल संघ के स्वयंसेवक पंच परिवर्तन की बात करते हैं। ऐसे ही छोटे छोटे संकल्पों से इस प्रकार का परिवर्तन समाज में, देश में, उसके कारण दुनिया में लाएंगे। उन्होने कहा कि ऐसे छोटेछोटे परिवर्तनों से प्रारंभ करके अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ाने का कम शुरू करना चाहिए। इस अवसर पर ओडिशा पूर्व प्रांत के प्रांत संघचालक समीर महांति व उत्कल विपन्न सहायता समिति के अध्यक्ष अक्षय कुमार बिट उपस्थित थे।

















