India Pakistan Partition : साल 1947। ऐसा साल जिसने न सिर्फ देश का नक्शा बदला, बल्कि करोड़ों दिलों में ऐसा जख्म छोड़ गया जो आज भी रिसता है। उस समय मेरी उम्र सिर्फ आठ साल की थी। पढ़ाई-लिखाई का ज्यादा शौक नहीं था, लेकिन आंखों में बचपन की मासूम तस्वीरें आज भी वैसी ही हैं। मेरा गांव था दरबारकोट, जो श्री ननकाना साहिब से केवल 3–4 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ था।
बिल्कुल शांत गांव। मगर जैसे-जैसे विभाजन का ऐलान हुआ, पूरा माहौल बदल गया। गांव के हिंदू परिवारों को अपना सब कुछ छोड़कर भारत के लिए निकलना पड़ा। गांव में हमारी एक किराने की दुकान थी। दुकान अच्छी चलती थी और उस छोटे से कस्बे में हमारा नाम भी था।
हमें कभी ऐसा नहीं लगा कि जिंदगी में कोई कमी है। रोटी, कपड़ा, इज्जत— सब कुछ था। लेकिन जैसे ही बंटवारे की आग भड़की, वह सब एक लम्हे में राख हो गया। न वह दुकान बची, न वे ग्राहक, न वह पहचान। हम जैसे लाखों परिवारों ने अपनी जड़ें खो दी थीं और शायद यही सबसे बड़ा नुकसान था।
हम पाकिस्तान से अमृतसर पहुंचे। वहां के शरणार्थी शिविर में कई दिन बिताए। भूख, प्यास, बीमारी और अनिश्चितता ने हम सबको तोड़ दिया था। हमारे परिवार में माता-पिता, दादी और हम 11 भाई-बहन कुल 14 सदस्य थे। जैसे-तैसे जालंधर जिले के गांव फरवाला में हमें घर आवंटित हुआ। यह गांव था लाल किताब वाले पंडित रूपचंद जोशी का।
हमारे लिए यह जगह बिल्कुल अजनबी थी, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, लोगों का अपनापन और साथ मिला। और यहीं, हमारी जिंदगी में एक नया अध्याय शुरू हुआ। जब हम फरवाला पहुंचे, वहां सबसे पहले जिस शख्स ने हमें अपनाया वह थे पंडित रूपचंद जोशी। उन्होंने हमें न केवल आसरा दिया, बल्कि हर तरह से मदद की- मानसिक, भावनात्मक और सांस्कृतिक।
मन में एक कसक आज भी बाकी है—अपने गांव दरबारकोट और बाबा नानक की धरती को एक बार फिर देखने की। जहां बचपन बीता, जहां पहली बार धरती पर नंगे पांव दौड़ा, जहां मां की गोद में सिर रखकर सोया- उन गलियों की यादें आज भी दिल में ताजा हैं।
लेकिन अब वहां कोई नहीं है, न वह घर, न वह दुकान, न वह मोहल्ला। कभी-कभी सोचता हूं कि अगर वहीं रहते, तो शायद हर दिन बाबा नानक के चरणों में बिताते, लेकिन अब तो वीजा भी मुश्किल से मिलता है, और अगर मिल भी जाए, तो किसके पास जाएं?
— कश्मीर चंद गुलाटी, मूल स्थान — दरबारकोट, श्री ननकाना साहिब


















