कांग्रेस ने केन्द्र में अपने लंबे शासनकाल में सनातन समाज में जातीय विभाजन की रेखा को गहरा करने और मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए अनेक कानून बनाए थे। अब कांग्रेस-शासित राज्य कर्नाटक ऐसा कानून ला रहा है, जिसमें सनातन समाज में जातीय वैमनस्य बढ़ाने और मुस्लिम तुष्टीकरण, दोनों कार्य एक साथ होंगे। इस कानून का नाम ‘रोहित वेमूला एक्ट’ रखा गया है।

वरिष्ठ पत्रकार
इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और ‘अल्पसंख्यक वर्ग’ को शामिल किया गया है। यह कानून शिक्षण संस्थानों में लागू होगा। प्रस्तावित कानून के अनुसार, यदि इन वर्गों का कोई विद्यार्थी किसी सामान्य वर्ग के विद्यार्थी, शिक्षक या संस्थान से जुड़े किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध शिकायत करता है, तो उसे संज्ञेय और गैर-जमानती माना जाएगा। इसमें अधिकतम तीन वर्ष की सजा का प्रावधान है।
यदि कोई शिक्षण संस्थान ऐसी शिकायतों पर उचित कार्रवाई नहीं करता, तो उस पर भी सख्त कार्रवाई की जाएगी और उसे राज्य सरकार की ओर से कोई आर्थिक सहायता नहीं दी जाएगी। किसी संस्थान के विरुद्ध बार-बार उल्लंघन की शिकायतें मिलती हैं, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है। साथ ही, संबंधित संस्थान प्रमुख को एक वर्ष का कारावास और 10,000 रुपये जुर्माना देने का भी प्रावधान है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यदि न्यायालय आरोपी को दोषी ठहराता है, तो राज्य सरकार शिकायतकर्ता को 1 लाख रु. तक की आर्थिक सहायता भी देगी।
न्याय की आड़ में पक्षपात
भारत में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के संरक्षण के लिए पहले से ही विशेष कानून मौजूद हैं, जैसे एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम। हालांकि, ये कानून तभी प्रभावी होते हैं, जब किसी मामले में स्पष्ट रूप से जातीय अपमान, अपशब्द या भेदभाव का तत्व शामिल हो। यदि एससी-एसटी वर्ग का कोई व्यक्ति केवल सामान्य विवाद की शिकायत करता है और उसमें जाति आधारित अपमान का उल्लेख नहीं होता, तो उस पर विशेष कानून स्वतः लागू नहीं होता।
ऐसे कई उदाहरण देखे गए हैं जहां किसी एससी-एसटी वर्ग के शिकायतकर्ता ने आवेश या भावनात्मक प्रतिक्रिया में शिकायत को बढ़ा-चढ़ाकर दर्ज कराया, लेकिन बाद में अदालत में बयान बदल देने के कारण आरोपी को कानूनी लाभ मिल गया। लेकिन अब कांग्रेस-शासित राज्यों में जिस ‘रोहित वेमूला एक्ट’ का प्रारूप तैयार किया जा रहा है, उसमें दो बातें विशेष रूप से उल्लेखनीय और चिंताजनक हैं। पहला, इसमें एससी-एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ मुस्लिम समुदाय को भी शामिल किया गया है।
इसका मतलब यह है कि यदि कोई मुस्लिम छात्र सामान्य वर्ग (सनातन समाज) के किसी छात्र, शिक्षक या संस्थान से जुड़े व्यक्ति के विरुद्ध कोई शिकायत करता है, चाहे वह जाति से जुड़ी न भी हो, तब भी उस शिकायत पर संज्ञेय और गैर-जमानती धाराएं लगाई जाएंगी। दूसरा है आर्थिक सहायता का प्रावधान। यदि न्यायालय आरोपी को दोषी ठहराता है, तो शिकायतकर्ता को शासन की ओर से आर्थिक सहायता दी जाएगी, जो 1 लाख तक हो सकती है। इस व्यवस्था के चलते यह आशंका बनी रहेगी कि शिकायतकर्ता आर्थिक लाभ की अपेक्षा में अंत तक शिकायत पर अड़ा रह सकता है, जिससे निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
इन प्रावधानों के चलते यह आशंका जताई जा रही है कि यह कानून वास्तविक भेदभाव या उत्पीड़न से अधिक राजनीतिक लाभ और तुष्टीकरण का माध्यम बन सकता है और इसका दुरुपयोग करने की संभावनाएं भी बढ़ जाएंगी। तुष्टीकरण नीति के तहत कांग्रेस मुसलमानों को ओबीसी में शामिल करने का अभियान लंबे समय से चला रही है, ताकि उन्हें आरक्षण का लाभ मिल सके।
इससे भले ही ओबीसी का कोटा कम हो जाए, पर कांग्रेस मुस्लिम वर्ग को आरक्षण का लाभ देने के लिए पूरा जोर लगा रही है। ‘रोहित वेमुला एक्ट’ के पीछे मंशा यही है।
झूठ बोलकर छात्रवृत्ति ली थी वेमूला ने
रोहित वेमूला ने झूठे प्रमाणपत्र के आधार पर एससी की छात्रवृत्ति ली थी। क्या ऐसे व्यक्ति के नाम पर कानून बनाना उचित है? किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके नागरिकों की समरसता, एकजुटता और पारस्परिक सम्मान पर आधारित होती है। सामान्यतः सरकारें अपने नियमों, योजनाओं या अधिनियमों का नाम उन महान व्यक्तित्वों पर रखती हैं, जिनका जीवन और कृतित्व समाज के लिए प्रेरणास्रोत हो। किंतु कांग्रेस नेता राहुल गांधी के सुझाव पर तैयार किया जा रहा ‘रोहित वेमूला एक्ट’ इस परंपरा से हटकर एक राजनीतिक और वैचारिक विभाजन का प्रतीक बनता दिख रहा है।
इस प्रस्तावित कानून का नाम एक ऐसे युवक के नाम पर रखा जा रहा है, जो ओबीसी से संबंध रखता था, लेकिन खुद को अनुसूचित जाति का बताकर फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर छात्रवृत्ति प्राप्त की और फिर विश्वविद्यालय परिसर में जातीय वैमनस्य फैलाने की गतिविधियों में शामिल हुआ। जब उसकी वास्तविक जातीय पहचान उजागर होने लगी, तब उसने आत्महत्या कर ली। प्रश्न है कि क्या यह कानून देश में समानता और समरसता को बढ़ावा देगा या विभाजन और वैमनस्य को?
मूलतः आंध्रप्रदेश के गुंटूर जिले का निवासी रोहित वेमूला वड्डेरा समुदाय से था, जो अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल है। उसने फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर न केवल हैदराबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, बल्कि 25,000 प्रति माह छात्रवृत्ति भी लेता रहा। दाखिले के बाद वह विश्वविद्यालय में ‘आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ से जुड़ा। यद्यपि यह संस्था बाबासाहब भीमराव आंबेडकर को अपना आदर्श मानने का दावा करती है, लेकिन उसकी गतिविधियां प्रायः वामपंथी और मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित होती हैं।
डॉ. आंबेडकर इस्लाम और मुस्लिम राजनीति को लेकर स्पष्ट और आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखते थे। इसी कारण उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया। किंतु आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन की नीतियां मुस्लिम समुदाय की राजनीति के पक्ष में अधिक झुकी दिखाई देती हैं। इस संगठन की प्राथमिकता में सनातन समाज के सामान्य वर्ग के छात्रों की अपेक्षा मुस्लिम छात्रों को अधिक समर्थन मिलता रहा।
रोहित वेमूला के भाषणों और वक्तव्यों में भी अक्सर सामान्य वर्ग निशाने पर होता था। यही कारण था कि उसकी छवि एक ‘आक्रामक दलित छात्र नेता’ की बनने लगी। हालांकि उसकी वास्तविक जाति पहचान इस छवि से मेल नहीं खाती थी।
आतंकियों के हमदर्द
आंबेडकर स्टूडेंट्स यूनियन और रोहित वेमूला उस समय चर्चा में आए, जब अगस्त 2015 में याकूब मेनन को फांसी दिए जाने के विरोध में हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर में एक सेमिनार आयोजित किया गया और उसके समर्थन में जुलूस निकाला गया। याकूब मेनन 1993 में मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट का एक प्रमुख षड्यंत्रकारी था। इसमें 257 निर्दोष लोग मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए थे। उसे 30 जुलाई, 2015 को फांसी दी गई थी।
भारत में एक वर्ग ऐसा है, जो आतंकी गतिविधियों में लिप्त लोगों के प्रति ‘हमदर्दी’ जताने में सदैव तत्पर रहता है। इन्हें कुछ राजनीतिक दलों का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन भी मिल जाता है। याकूब मेनन की फांसी रोकने के लिए कई तथाकथित मानवाधिकार संगठन सामने आए। ऐसा प्रतीत हुआ मानो इन संगठनों के लिए विस्फोट में मारे गए लोगों और उनके परिवारों के अधिकार गौण थे। याकूब मेनन के ‘मानवाधिकार’ की रक्षा उनके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई थी।
इस आतंकी हमले में मारे गए लोगों में अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों के लोग भी शामिल थे। इसके बावजूद, आंबेडकर स्टूडेंट्स यूनियन और रोहित वेमूला ने पीड़ितों के पक्ष में खड़े होने के बजाय आतंकवादी याकूब मेमन के समर्थन में हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर में सेमिनार और जुलूस आयोजित किया। यह आयोजन राष्ट्रीय स्तर पर सड़क से संसद तक चर्चा का विषय बना।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, जो विश्वविद्यालय में सक्रिय थी, ने याकूब मेमन के समर्थन में हुए कार्यक्रम का प्रखर विरोध किया और केंद्र व राज्य सरकार को ज्ञापन भेज कर आयोजकों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की। इसके जवाब में रोहित वेमूला और उसकी टीम ने इस विरोध को ‘जातिवादी और मनुवादी मानसिकता’ का नाम देकर असल मुद्दे से ध्यान भटकाने का प्रयास किया। उसी दौरान यह तथ्य भी उजागर हुआ कि रोहित वेमूला वास्तव में अनुसूचित जाति का नहीं है। उसके परिवार के सदस्यों ने पूर्व में सरकारी दस्तावेजों में स्वयं को ओबीसी (वड्डेरा समुदाय) लिखा था। प्रारंभिक जांच में यह शिकायत सही पाई गई कि रोहित वेमूला ने फर्जी अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र के आधार पर न केवल विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, बल्कि 25,000 रुपये मासिक तक छात्रवृत्ति भी प्राप्त की।
आतंकियों के समर्थन और फर्जी जाति प्रमाणपत्र मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन ने रोहित वेमूला सहित चार लोगों को निलंबित कर दिया। वेमूला की छात्रवृत्ति बंद करने के साथ दोनों प्रकरणों की विस्तृत जांच के आदेश भी दिए गए। इसके बाद 17 जनवरी, 2016 को वेमूला ने आत्महत्या कर ली। हालांकि, उसने एक सुसाइड नोट भी लिखा था, जिसमें आत्महत्या को अपना निर्णय बताया था, किसी को जिम्मेदार नहीं बताया था। फिर भी, तथाकथित दलित हितैषियों और मानवतावादियों इसे दलित उत्पीड़न बताकर राष्ट्रव्यापी मुद्दा बनाया, जबकि रोहित वेमूला ने संभावित कानूनी कार्रवाई से डर कर आत्महत्या की थी। आगे की जांच में तेलंगाना पुलिस का निष्कर्ष भी यही था। इसका उल्लेख पुलिस ने न्यायालय में पेश ‘क्लोजर रिपोर्ट’ में किया था। उस समय तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार थी।
रोहित वेमूला के विचारों और उसकी मनोदशा को उसके अनुयायियों के दृष्टिकोण से भी समझा जा सकता है। हाल ही में जेएनयू के पूर्व छात्र नेता कन्हैया कुमार ने रोहित वेमूला को अपना प्रेरणास्रोत बताया।
उल्लेखनीय है कि रोहित वेमूला ने 2015 में आतंकी याकूब मेनन पर आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया था, जबकि कन्हैया पर संसद पर आतंकी हमले के दोषी अफजल की फांसी की बरसी पर जेएनयू में श्रद्धांजलि सभा आयोजित करने, उसमें शामिल होने और देशविरोधी नारे लगाने के आरोप लगे थे। दोनों घटनाएं अलग-अलग विश्वविद्यालयों में हुईं, लेकिन इन आयोजनों में आतंकियों का महिमामंडन और उनके प्रति सहानुभूति जताने वालों के प्रति कांग्रेस का ‘प्रेम’ समझ से परे है। प्रारंभ में भाकपा से जुड़ाव रखने वाला कन्हैया 2019 और 2024 में क्रमश: पूर्वी दिल्ली और बेगूसराय से चुनाव लड़ चुका है। अब वह कांग्रेस में है और दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी भाग्य आजमा चुका है।
न्याय या तुष्टीकरण?
कांग्रेस का तर्क है कि यह विधेयक वह उच्च शिक्षण संस्थानों में एससी-एसटी छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए लाया जा रहा है। परंतु विपक्षी दलों का आरोप है कि ऐसा कानून लाकर कांग्रेस रोहित वेमूला जैसे लोगों को ‘नायक’ के रूप में स्थापित करना चाहती है। इस पूरे घटनाक्रम में एक और पहलू विचारणीय है– क्या विभिन्न विश्वविद्यालयों में समान समय पर हो रहे इन कार्यक्रमों के पीछे कोई संगठित वैचारिक ढांचा या नेटवर्क काम कर रहा है, जिसे कुछ लोग ‘स्लीपर सेल’ की संज्ञा देते हैं? यह प्रश्न सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता की दृष्टि से गंभीर है और इस पर निष्पक्ष जांच और विमर्श की आवश्यकता है। दरअसल, कांग्रेस अपने खिसकते जनाधार को फिर से पाने के लिए नए-नए फार्मूले खोज रही है। इसीलिए वह कभी जाति आधारित जनगणना, कभी ओबीसी आरक्षण और कभी मुस्लिम समाज को ओबीसी में शामिल करने जैसे मुद्दे उठा रही है।

















