विभाजन-विभीषिका: क्या 15 अगस्त 1947 की रात भारत की स्वतंत्रता, ब्रिटिश रणनीति का हिस्सा थी? इतिहास के दस्तावेज़ बताते हैं कि यह विभाजन केवल हिंदू-मुस्लिम संघर्ष का नतीजा नहीं था। बल्कि एक सोची-समझी औपनिवेशिक रणनीति थी, जिसका उद्देश्य उपमहाद्वीप को दीर्घकालिक रूप से कमजोर करना था। ब्रिटेन ने शीत युद्ध के शुरुआती दौर में अपनी सामरिक स्थिति को सुरक्षित रखने के लिए उपमहाद्वीप की संरचना को ही बदल डाला। ब्रिटिश साम्राज्य ने धार्मिक मतभेदों का उपयोग एक ऐसे भूभाग की रचना के लिए किया, जो भविष्य में सोवियत संघ के खिलाफ “बफर ज़ोन” और पश्चिमी हितों के लिए सैन्य आधार बन सके — और यही पाकिस्तान था। लंदन की असली मंशा भारत को स्वतंत्र छोड़ने की नहीं, बल्कि उसे विभाजित कर देने की थी, ताकि उसका सामर्थ्य कभी भी साम्राज्यवादी ताकतों के लिए खतरा न बने—न उसकी सैन्य शक्ति, न उसकी अर्थव्यवस्था, और न ही उसकी कूटनीतिक स्वतंत्रता। यह ब्रिटिश साम्राज्य की कुटिल योजना का साफ़ प्रतिबिंब था।
1857 के संघर्ष से अंग्रेजों ने ली सीख
1857 के स्वतंत्रता आंदोलन के बाद ब्रिटिश शासन ने अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को संस्थागत रूप दिया। लॉर्ड एल्फिंस्टन ने स्पष्ट रूप से कहा था, “यही हमारी रणनीति होगी।” इस नीति के तहत, हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच की एकता को तोड़ने के लिए सुनियोजित प्रयास किए गए, ताकि भविष्य में कोई संयुक्त संघर्ष न हो सके।
1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों के माध्यम से मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल (separate electorates) की शुरुआत की गई, जिसे मॉर्ले ने एक दूरगामी कदम बताया। उन्होंने कहा था कि इससे वे (मुस्लिम) हमेशा ब्रिटिश समर्थक रहेंगे। 1940 के दशक में वायसराय कार्यालय ने मुस्लिम लीग और मुहम्मद अली जिन्ना को राजनीतिक और आर्थिक रूप से संरक्षण दिया। सचिव ले.एस. अमेरी ने इस संदर्भ में लिखा था, “जिन्ना की ज़िद हमारा सबसे बड़ा हथियार है।”
इसे भी पढ़ें: विभाजन-विभीषिका : रास्ते में कई बार मुसलमानों ने गाड़ी को रोका…गोरखा सैनिकों ने बचाई जान
जनगणना का उपयोग विभाजन की रेखाएं खींचने के लिए हुआ
1871 से शुरू हुई जनगणना में धर्म को कठोर श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया, जिसने सामुदायिक पहचान को और भी गहरा किया। 1931 की जनगणना के नक्शों का उपयोग 1946 के कैबिनेट मिशन ने विभाजन की रेखाएं खींचने के लिए किया। ब्रिटिश दस्तावेजों से यह स्पष्ट होता है कि भारत की सामरिक एकता को ब्रिटिश प्रभाव में बनाए रखना आवश्यक था।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, ब्रिटेन आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका था। ट्रेजरी की गणना के अनुसार, “भारत में संघर्ष रोकना महंगा पड़ेगा,” इसलिए “सुव्यवस्थित वापसी (systematic withdrawal)” को प्राथमिकता दी गई। विभाजन के पीछे एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक रणनीति भी काम कर रही थी। 19 मई 1945 की गुप्त युद्ध कैबिनेट रिपोर्ट में ब्रिटिश जनरलों ने यह स्पष्ट किया था कि “उत्तर-पश्चिम भारत पर कब्जा बनाए रखना होगा ताकि सोवियत संघ को रोका जाए और मध्य-पूर्व का तेल सुरक्षित रहे।” कराची और उत्तर-पश्चिम के हवाई अड्डों को “मध्य-पूर्व तक एयर-ब्रिज” के रूप में देखा गया, और मुस्लिम-बहुल पाकिस्तान को ईरान-अफगानिस्तान सीमा पर एक विश्वसनीय पहरेदार माना गया।
इसे भी पढ़ें: सोनिया गांधी पर अमित मालवीय का गंभीर आरोप: 1980 में गैर-नागरिक होते हुए भी वोटर लिस्ट में नाम
15 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण थी साजिश
माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की तारीख जून 1948 से घटाकर 15 अगस्त 1947 कर दी, ताकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और इंडियन नेशनल आर्मी (INA) जैसी शक्तियां एकजुट होकर विभाजन को रोक न सकें। साइरिल रेडक्लिफ, जिन्हें भारत के बारे में कोई पूर्व अनुभव नहीं था, को मात्र 5 सप्ताह में 1,75,000 वर्ग मील की सीमा रेखा खींचने का असंभव कार्य सौंपा गया। उनके नक्शों और संबंधित दस्तावेजों को 30 वर्षों तक गोपनीय रखा गया, जिन्हें 1977 में ब्रिटिश लाइब्रेरी (Mss Eur F200) में सार्वजनिक किया गया।
3 जून की योजना में 133 “स्थिर स्थिति” समझौते शामिल थे, जिसके तहत ब्रिटिश अधिकारी अगले तीन साल तक दोनों देशों की सेनाओं में अपनी सेवाएं देते रहे ताकि समुद्री व्यापार मार्गों पर ब्रिटिश नियंत्रण बना रहे। 1946 की जॉइंट इंटेलिजेंस कमेटी की एक रिपोर्ट में यह लिखा गया था कि एकीकृत भारत में सोवियत-झुकाव वाली सरकार न आ जाए, इसलिए विभाजन सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर था।
आयरलैंड-फिलिस्तीन के मॉडल को भारत पर लागू किया
यह विभाजन कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि यह ब्रिटिश शासन के पिछले अनुभवों पर आधारित था। आयरलैंड (1921) और फ़िलिस्तीन (1937 पील रिपोर्ट) में अपनाए गए “साम्प्रदायिक संघ (communal federalism)” के मॉडल को भारत पर लागू किया गया। लॉर्ड इस्मे और टेरेंस शोन, जिन्होंने फ़िलिस्तीन के विभाजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, वे माउंटबेटन के स्टाफ में दिल्ली में मौजूद थे। इस प्रकार, भारत का विभाजन एक ” पुनरावृत्त औपनिवेशिक विभाजन मॉडल ” था, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश हितों को दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित रखना था।
1945 में ब्रिटिश युद्ध मंत्रिमंडल की एक गोपनीय रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि भारत का भौगोलिक स्थान और उसके संसाधन ब्रिटेन के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण थे। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत से होकर मध्य-पूर्व और पूर्वी एशिया तक के महत्वपूर्ण मार्ग गुजरते थे, और भारतीय उपमहाद्वीप में सैन्य तैनाती ब्रिटिश हितों के लिए आवश्यक थी। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया था, “उत्तर-पश्चिमी सीमा और हिंद महासागर क्षेत्र पर नियंत्रण ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा के लिए अपरिहार्य है, विशेषकर सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए।”
यह दस्तावेज़ इस तथ्य को उजागर करता है कि भारत का विभाजन केवल आंतरिक राजनीतिक मतभेदों का परिणाम नहीं था, बल्कि यह ब्रिटिशों की व्यापक वैश्विक सुरक्षा रणनीति का एक हिस्सा था, जिसका मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ की बढ़ती शक्ति का मुकाबला करना था।
अंग्रेजों को अपनी पकड़ खोने का था डर
अंग्रेज अफसर जानते थे कि अगर भारत एक होकर कांग्रेस के नेतृत्व में आजाद हुआ, तो वे अपनी रणनीतिक पकड़ खो देंगे। जबकि मुस्लिम लीग ने अंग्रेजों के साथ बेहतर तालमेल दिखाया था। विंस्टन चर्चिल ने भी अपने पत्रों में लिखा था: “अगर भारत से उत्तर-पश्चिमी हिस्सा अलग हो गया, तो भारत, भारत नहीं रहेगा। पाकिस्तान को एक रक्षा किले के रूप में बनाया जाना चाहिए।” अंग्रेजों ने पाकिस्तान को अपनी सुरक्षा के लिए एक मजबूत गढ़ के रूप में तैयार किया था, ताकि वे सोवियत संघ को रोक सकें और मध्य एशिया में अपने फायदे बनाए रख सकें।
भारत को स्वतंत्रता नहीं डोमिनियन स्टेटस देना था मकसद
ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने 1942 के बाद कई बार यह बात दोहराई कि भारत को डोमिनियन स्टेटस दिया जा सकता है, किंतु उसे पूर्ण स्वतंत्रता नहीं मिलेगी। उन्होंने अपने एक पत्र में लिखा था कि “डोमिनियन स्टेटस और स्वतंत्रता एक जैसी नहीं होती।” यह दृष्टिकोण 1942 के क्रिप्स मिशन में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जहाँ यह प्रस्ताव रखा गया था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारत को स्वशासन का वादा मिलेगा, परंतु उसकी रक्षा और विदेश नीति का नियंत्रण ब्रिटेन के पास ही रहेगा।
ब्रिटिश कैबिनेट की कार्यवाही, जो अब सार्वजनिक अभिलेखागार में उपलब्ध है, यह दर्शाती है कि उनका उद्देश्य भारत को एक ‘सुरक्षित बफर क्षेत्र’ बनाना था। इसका रणनीतिक महत्व यह था कि यह क्षेत्र एशिया में सोवियत प्रभाव के विस्तार और भविष्य में चीन के संभावित उदय को रोकने में सहायक होता।
माउंटबेटेन का भारत आगमन थी साजिश
माउंटबेटन का भारत आगमन और विभाजन की तेज प्रक्रिया एक सोची-समझी ब्रिटिश योजना का हिस्सा थी। मूल रूप से विभाजन के लिए जून 1948 तक का समय निर्धारित था, लेकिन लॉर्ड माउंटबेटन ने अचानक इस समय-सीमा को अगस्त 1947 तक कर दिया। इस जल्दबाज़ी का परिणाम यह हुआ कि लाखों लोगों का विस्थापन हुआ और भारी सांप्रदायिक हिंसा भड़की, जिसे रोकने के लिए पर्याप्त समय और व्यवस्था नहीं हो पाई।
माउंटबेटन ने अपने पत्रों में इस जल्दबाज़ी का कारण स्पष्ट करते हुए लिखा था: “सांप्रदायिक समस्या का कोई समाधान नहीं है। या तो भारत को बांटना होगा या गृहयुद्ध होगा। हमारी रणनीतिक जरूरतें तेज फैसला लेने को मजबूर करती हैं।” इस जल्दबाजी के कारण सीमा रेखा का निर्धारण करते समय सामाजिक और आर्थिक स्थितियों को नज़रअंदाज़ किया गया, जिसने आगे चलकर दंगे और बड़े पैमाने पर लोगों के पलायन जैसे गंभीर संकट पैदा किए। यह सब ब्रिटिशों की अपनी रणनीतिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए किया गया था।
विभाजन के कारण 1.5 करोड़ लोग हुए थे विस्थापित
आंकड़ों के अनुसार, 1947 के विभाजन के समय करीब 1.4 से 1.5 करोड़ लोगों को विस्थापित होना पड़ा। इसमें लगभग 72.5 लाख हिंदू और सिख भारत आए, जबकि लगभग इतने ही मुसलमान पाकिस्तान गए। यह इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे हिंसक पलायन था, जिसमें एक अनुमान के मुताबिक 10 से 20 लाख लोगों की जान गई। यह सिर्फ़ संख्याओं का खेल नहीं था, बल्कि इसके पीछे अनगिनत दर्द भरी कहानियाँ छिपी हैं। अमृतसर की बनी कौर उस भयानक मंजर को याद करते हुए बताती हैं, “ट्रेन में बस खून और चीखें थीं… हमने उसी सफ़र में अपने पिता को खो दिया।” इसी तरह, लाहौर के अली हसन कहते हैं, “कल तक जो पड़ोसी थे, वे आज दुश्मन बन गए… यह सब हमने अपनी आँखों से देखा।” दरअसल, विभाजन सिर्फ़ ज़मीन का बँटवारा नहीं था, बल्कि यह लोगों के बीच का भरोसा, सदियों पुराने रिश्ते और रोज़मर्रा की सामान्य ज़िंदगी के धागों का भी टूटना था।
विभाजन से सबसे अधिक नुकसान भारत को हुआ
आर्थिक रूप से भारत को विभाजन से बहुत नुकसान हुआ। पंजाब की नहरें, जो खेती का अहम हिस्सा थीं, दो टुकड़ों में बंट गईं। सिंधु नदी की मुख्य धाराएं पाकिस्तान में चली गईं। बाद में, 1960 की सिंधु जल संधि के तहत भारत को तीन पूर्वी नदियों का पानी मिला, लेकिन पश्चिमी नदियों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गई। जूट उद्योग भी बुरी तरह प्रभावित हुआ, क्योंकि जूट की खेती वाला ज्यादातर इलाका (पूर्वी बंगाल) पाकिस्तान में चला गया, जबकि उसकी मिलें भारत में रह गईं। इससे उत्पादन में रुकावट आई और देश की कमाई घट गई। भारतीय रिजर्व बैंक को भी कुछ समय के लिए पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक का काम संभालना पड़ा, जिससे देश की आर्थिक स्थिरता पर असर पड़ा। 1947-48 के भारत के पहले बजट का 60% से ज्यादा हिस्सा शरणार्थियों को बसाने और सेना पर खर्च करना पड़ा। इस कारण देश के विकास और नई योजनाओं पर काम रुक गया।
आर्थिक दृष्टि से, विभाजन ने भारत को गंभीर हानि पहुँचाई। वर्ष 1947-48 के प्रथम बजट का 60 प्रतिशत से अधिक भाग शरणार्थियों के पुनर्वास तथा रक्षा व्यय में लग गया, जिसके कारण औद्योगिक और बुनियादी ढाँचे के विकास से संबंधित योजनाएँ प्रभावित हुईं। जूट उद्योग पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, क्योंकि जूट उत्पादन का मुख्य क्षेत्र पूर्वी बंगाल पाकिस्तान में चला गया, जबकि जूट मिलें भारत में रह गईं। इस स्थिति से उत्पादन की श्रृंखला टूट गई और जूट निर्यात से प्राप्त होने वाली आय में उल्लेखनीय कमी आई।
रणनीतिक रूप से भारत के विभाजन ने एक कमज़ोर सीमा-रेखा को जन्म दिया। पश्चिम में पाकिस्तान के साथ एक लंबी और संवेदनशील सीमा बनी। वहीं, पूर्व में पूर्वी पाकिस्तान (जो अब बांग्लादेश है) के साथ अस्थिर भूभाग ने भारत के लिए सैन्य और प्रशासनिक चुनौतियां खड़ी कर दीं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कश्मीर है, जहां विभाजन के ठीक बाद 1947-48 में युद्ध छिड़ गया। यह विवाद आज भी जारी है। सेना का विभाजन भी जल्दबाज़ी में किया गया। कई रेजिमेंटों को बिना पर्याप्त तैयारी के विभाजित कर दिया गया, जिससे शुरुआती वर्षों में भारत की रक्षा क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
विभाजन के बाद अमेरिका के पक्ष में चला गया पाकिस्तान
1947 के बाद पाकिस्तान ने रणनीतिक रूप से ब्रिटेन और अमेरिका के सुरक्षा ढाँचे में अपनी जगह बना ली। 1954 में वह SEATO (दक्षिण-पूर्व एशिया संधि संगठन) और 1955 में CENTO (केंद्रीय संधि संगठन) का सदस्य बना। ये दोनों संगठन शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के विस्तार को रोकने की पश्चिमी रणनीति का हिस्सा थे। पाकिस्तान ने अपने हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों को अमेरिका के उपयोग के लिए खोल दिया, जिससे मध्य एशिया और अफ़ग़ानिस्तान पर पश्चिमी देशों की निगरानी करना संभव हो पाया। इसके विपरीत, भारत ने इस दौरान अपनी गुटनिरपेक्ष नीति को अपनाया, जिससे वह इन पश्चिमी सैन्य गठबंधनों से दूर रहा।
अगर हम इसे वैश्विक संदर्भ में देखें तो यह रणनीति कोई नई नहीं थी। इसका एक प्रमुख उदाहरण 1884-85 का बर्लिन सम्मेलन है, जहाँ औपनिवेशिक शक्तियों ने अफ्रीका में बिना किसी जातीय या सांस्कृतिक एकता को समझे ही सीमाएँ खींच दी थीं। इसका परिणाम यह हुआ कि आज भी कई अफ्रीकी देशों में गृहयुद्ध और अस्थिरता की समस्याएँ बनी हुई हैं। भारत और पाकिस्तान का विभाजन भी उसी औपनिवेशिक सोच का एक हिस्सा था। यह ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का एक दीर्घकालिक रूप था, जिसने औपचारिक आज़ादी मिलने के बाद भी उपनिवेशवाद के प्रभाव को बनाए रखने में मदद की।
RSS ने कहा था-भारत की एकता पर प्रहार
उस समय के विचारकों में महात्मा गांधी ने इसे “मानवता की हार” कहा, जबकि डॉ. राम मनोहर लोहिया ने चेतावनी दी थी कि यह विभाजन आने वाली पीढ़ियों के लिए अंतहीन विवादों का कारण बनेगा। वहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने इसे भारत की एकता पर सबसे बड़ा प्रहार मानते हुए अखंड भारत की संकल्पना को और मज़बूत किया। आरएसएस के गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर का स्पष्ट मत था कि यह विभाजन न केवल भौगोलिक, बल्कि सांस्कृतिक और सभ्यतागत अखंडता पर भी हमला है, और इसका मूल कारण ब्रिटिशों की सोची-समझी भू-राजनीतिक योजना है। इन सभी दृष्टिकोणों में यह साझा समझ थी कि यह घटना किसी आंतरिक मजबूरी से नहीं, बल्कि बाहरी साम्राज्यवादी स्वार्थों से संचालित थी।
संघ के भी प्रमुख नेताओं ने पुरजोर तरीके से देश के विभाजन पर कड़ी आपत्ति जताई। एकात्म मानवतावाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय का दृष्टिकोण बेहद प्रासंगिक हो जाता है। उनका कहना था कि भारत विभाजन एक अपरिहार्य घटना थी, जिसे नेताओं ने अनिवार्यतः स्वीकार किया। विभाजन को अस्वीकार करने की स्थिति में भारत स्वतंत्रता से वंचित रहता और देशभर में भीषण रक्तपात होता, जिससे हिंदू-मुस्लिम समस्या और भी गंभीर हो जाती। उनका यह भी कहना था कि भारत को स्वतंत्रता 3 जून की योजना से नहीं, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों और ब्रिटिश साम्राज्य की गिरती स्थिति के कारण मिली। इस प्रक्रिया में मुस्लिम लीग की मांग का कोई प्रभाव नहीं था। उनका यह दृष्टिकोण था कि विभाजन न मानने के बावजूद अंग्रेज भारत छोड़ने के लिए मजबूर थे, क्योंकि भारतीय जनमानस में जागरूकता और संघर्ष की भावना इतनी मजबूत हो चुकी थी कि ब्रिटिश सत्ता के लिए यह स्थिति बनाए रखना असंभव हो गया था। यदि कांग्रेस के नेता डटे रहते, तो अंग्रेज अखंड भारत को छोड़कर जाते और सत्ता कांग्रेस को सौंप देते।
हाल के शोध, जैसे प्रो. इस्तियाक अहमद की पुस्तक Jinnah: His Success, Failure and Role in History, भी इसी निष्कर्ष की पुष्टि करते हैं कि विभाजन इसलिए हुआ क्योंकि ब्रिटिशों को सामरिक दृष्टि से मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाले पाकिस्तान पर भरोसा था। इस प्रकार, पंडित दीनदयाल उपाध्याय का यह आकलन मज़बूती से स्थापित होता है कि भारत का विभाजन, वास्तव में, ब्रिटिश सामरिक नीति का परिणाम था, न कि केवल आंतरिक राजनीतिक मतभेदों का।
















