मेधा पाटकर पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, न्याय की तुला या वैचारिक झुकाव?
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मेधा पाटकर पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, न्याय की तुला या वैचारिक झुकाव?

24 साल पुराने विवाद पर नए फैसले ने मेधा पाटकर मामले में सुप्रीम कोर्ट की नरमी और वामपंथी तंत्र की प्रभावशाली भूमिका को फिर उजागर किया है।

Written byडॉ विश्वास चौहानडॉ विश्वास चौहान
Aug 13, 2025, 09:45 am IST
inभारत

24 साल पुराने विवाद में आए नए फैसले ने मेधा पाटकर मामले में सुप्रीम कोर्ट की नरमी पर सवाल खड़े कर दिए हैं और एक बार फिर वामपंथी पारिस्थितिकी तंत्र की ताकत को उजागर कर दिया है।

विदित हो कि 11 अगस्त 2025 को देश की सर्वोच्च अदालत ने सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर की आपराधिक मानहानि (धारा 500, भारतीय दंड संहिता) में दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा, परंतु सजा और जुर्माने में भारी राहत दी। यह मामला वर्ष 2000 का है, जब पाटकर ने एक पत्रकार दिलीप गोहिल को ईमेल द्वारा एक प्रेस नोट भेजा था। इसमें उन्होंने उस समय गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार की सरदार सरोवर बांध योजना के समर्थक तथा अहमदाबाद स्थित नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के प्रमुख वी.के. सक्सेना पर हवाला कारोबार में लिप्त होने और उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे।

गुजरात के पत्रकार गोहिल ने मेधा पाटकर के पत्र को गुजराती में प्रकाशित किया और सक्सेना ने इसे प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाला बताते हुए आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर किया। निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक इस मामले की 24 वर्ष की यात्रा किस प्रकार हुई तो पता चलता है कि मामले के दर्ज होने के बाद साकेत कोर्ट, दिल्ली (1 जुलाई 2024) ने मेधा पाटकर को दोषी ठहराते हुए 5 महीने की साधारण कैद और ₹10 लाख का जुर्माना लगाया गया। कोर्ट ने माना कि आरोप बेबुनियाद थे और उद्देश्य सक्सेना की छवि धूमिल करना था।

मेधा पाटकर ने मजिस्ट्रेट के निर्णय के विरुद्ध सत्र न्यायालय में पुनरीक्षण आवेदन दिया, तब सत्र न्यायालय (2 अप्रैल 2024) में दोषसिद्धि तो बरकरार रही, पर सजा में राहत मिली साथ ही ₹10 लाख जुर्माना भी घटाकर ₹1 लाख किया गया और पाटकर को ₹25,000 के प्रोबेशन बॉन्ड पर रिहा किया गया। पीड़ित पक्ष सक्सेना ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की दिल्ली हाइकोर्ट ने (29 जुलाई 2024) निचली अदालत का निर्णय सही ठहराया, केवल पेशी की शर्त को ऑनलाइन पेशी में बदला। अब सक्सेना ने हाइकोर्ट के निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील की सुप्रीम कोर्ट (11 अगस्त 2025) – जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए ₹1 लाख का जुर्माना और प्रोबेशन की शर्तें हटा दीं। पाटकर को केवल मुचलका भरने की औपचारिक छूट दी गई।

अब प्रश्न यह खड़ा होता है कि जब दंड संहिता के प्रावधान अनुसार अपराध साबित हो गया है तो दण्ड भी विधि सम्मत देने में कोर्ट ने ढिलाई,नरमाई या मक्कारी क्यो की ? क्या यह भारतीय संविधान के समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नही है ?

इसी तारतम्य में एक केस सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ (2016) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रतिष्ठा, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का हिस्सा है, और आपराधिक मानहानि कानून को उचित ठहराया। लेकिन पाटकर मामले में, जब अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि आरोप झूठे और दुर्भावनापूर्ण थे, तब सजा और जुर्माना लगभग समाप्त कर देना क्या न्याय का संतुलन बिगाड़ना नहीं है? अगर यही अपराध किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा किया गया होता, तो क्या उसे भी “70 वर्ष की आयु” और “सामाजिक कार्य” के आधार पर यह राहत मिलती?

मानहानि से आगे: आर्थिक अनियमितताओं के आरोप

मेधा पाटकर एक वामपंथिनी अपराधी और भ्रष्ट प्रवृत्ति की महिला प्रतीत है क्योंकि पाटकर के खिलाफ केवल यह मानहानि मामला ही नहीं, बल्कि वित्तीय गड़बड़ियों के गंभीर आरोप भी हैं।

मेधा पाटकर के विरुद्ध एनजीओ फंड गबन (बरवानी, मप्र-जुलाई 2022) का आपराधिक केस दर्ज है,  जिसमे ₹13–14 करोड़ की राशि, जो “नर्मदा नव निर्माण अभियान” को आदिवासी (जनजाति) शिक्षा और पुनर्वास हेतु मिली थी, उसके दुरुपयोग का आरोप इन पर है । यह केस धारा 420 (धोखाधड़ी) और 406 (आपराधिक न्यासभंग) के तहत दर्ज है ,जिसमे आरोप है कि यह राशि आंदोलनों और राजनीतिक अभियानों में खर्च हुई।

मेधा पाटकर पर एक अन्य केस मनी लॉन्ड्रिंग (ईडी केस -अप्रैल 2022) का है , प्रवर्तन निदेशालय ने PMLA के तहत विदेशी व घरेलू दान में अनियमितताओं का केस दर्ज किया। इस केस के आरोपों में एक ही दिन में भारी मात्रा में कई दान, सरकारी कंपनी से संदिग्ध हस्तांतरण, और उद्देश्य से भिन्न उपयोग शामिल आरोप शामिल हैं । हालांकि पाटकर इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बताती हैं, पर यह तथ्य नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उनकी कानूनी पृष्ठभूमि पहले से विवादित है।यह एक शातिर अपराधी के जैसे हैं ।

राजनीतिक पृष्ठभूमि: नर्मदा बांध और वैचारिक टकराव

मेधा पाटकर और सक्सेना के बीच विवाद की जड़ गुजरात का सरदार सरोवर बांध है , सक्सेना और नरेंद्र मोदी (तब गुजरात के मुख्यमंत्री) इस परियोजना के समर्थक थे, इसे ऊर्जा और सिंचाई का महत्त्वपूर्ण साधन मानते थे। मेधा पाटकर की नर्मदा बचाओ आंदोलन टीम ( शायद विदेशी डीप स्टेट के इशारे पर ) इसका कड़ा विरोध करती रही, इसे विस्थापन और पर्यावरण विनाश का प्रतीक बताती रही। इसी सिलसिले में मेधा 2000 का प्रेस नोट, जिसने इस मानहानि केस को जन्म दिया, इस टकराव की पृष्ठभूमि में जारी हुआ था। ऐसे में, यह केवल कानूनी मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक वैचारिक संघर्ष का विस्तार भी था।

विरोधाभासी न्यायिक दृष्टांत

सुप्रीम कोर्ट ने मेधा पाटकर जैसे मामलों में आयु और सामाजिक राजनीतिक पृष्ठभूमि होने पर बाल ठाकरे बनाम हरीश पिम्पलखुटे (2005) के केस में राजनीतिक व्यक्तित्व होने के बावजूद मानहानि केस खारिज नहीं किया , और ट्रायल का सामना करना पड़ा। इसी प्रकार से एम.एस. जयराज बनाम कमिश्नर ऑफ एक्साइज (2000) – चरित्र पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी भी गंभीर मानी गई और कार्रवाई आवश्यक बताई गई। उक्त मामलों में अदालत ने कठोर दृष्टिकोण अपनाया, जबकि पाटकर मामले में राहत का स्तर डिटरेंस (निवारक प्रभाव) को कमजोर करता है।

न्याय के तराजू में झुकाव का खतरा

एक लॉ प्रोफेसर होने से मैं पूरी जिम्मेदारी से कहता हूं कि अनुच्छेद 14 के तहत “कानून के समक्ष समानता” केवल किताबों का वाक्य नहीं है। यह विश्वास है कि अदालतें सभी के साथ समान व्यवहार करेंगी। जब अदालत “सामाजिक कार्य” और “आयु” को राहत के कारण मानती है, तो निम्नलिखित सवाल उठते हैं ,

क्या लंबी राजनीतिक सक्रियता सजा कम करने का पासपोर्ट है? क्या आर्थिक अपराधों के आरोपों के बीच किसी को अतिरिक्त नरमी मिलनी चाहिए? क्या यह न्यायिक मिसाल भविष्य में वैचारिक निकटता के आधार पर सजा कम करने का रास्ता खोलेगी?

निष्कर्षतः हम कह सकते है कि कोर्ट ने न्याय के बजाय विचारधारात्मक सहानुभूति प्रदर्शित की है। सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि को तो बरकरार रखकर सिद्धांत की रक्षा की, लेकिन सजा घटाकर निष्पक्ष न्याय के संदेश को कमजोर कर दिया। यह “स्प्लिट वर्डिक्ट” न्यायिक प्रक्रिया के प्रति जनता के विश्वास को डगमगा सकता है। न्याय केवल निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखना भी चाहिए। जब राहत का स्वरूप किसी व्यक्ति के राजनीतिक या वैचारिक प्रोफ़ाइल से मेल खाता दिखे, तो जनता न्याय नहीं, पक्षपात देखती है,और लोकतंत्र के लिए यही सबसे बड़ा खतरा है।

Topics: वामपंथी पारिस्थितिकी तंत्रMagistrate CourtIPC Section 500ConvictionSupreme CourtFine removedसुप्रीम कोर्टProbation cancelleddefamation caseमेधा पाटकरMedha Patkarपाञ्चजन्य विशेषVK Saxena
डॉ विश्वास चौहान
डॉ विश्वास चौहान
संयोजक जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र , मध्यप्रदेश ( प्राध्यापक विधि , शासकीय स्टेट लॉ कॉलेज भोपाल, मध्य प्रदेश ) [Read more]
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