प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में हाल ही में मतदाता सूची को लेकर एक विवाद सामने आया। उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने आरोप लगाया कि वर्ष 2023 के नगर निगम चुनाव की मतदाता सूची में भारी गड़बड़ी हुई है। कांग्रेस ने एक दस्तावेज सोशल मीडिया पर साझा किया, जिसमें वार्ड-51 कश्मीरिगंज में रहने वाले एक व्यक्ति ‘रामकमल दास’ के 50 से अधिक पुत्र दिखाए गए थे। पार्टी ने इस पर वोटर फ्रॉड का आरोप लगाया और चुनाव आयोग से इसकी जांच की मांग की।
मामला क्या था- जिस पते (B 24/19) की बात हो रही है, वह कोई आम मकान नहीं, बल्कि एक धार्मिक स्थल है- राम जानकी मठ मंदिर। यह मठ एक आश्रम है, जिसकी स्थापना आचार्य रामकमल दास ने की थी। इस मठ में कई संत, साधु और शिष्य रहते हैं जो अपना सांसारिक जीवन छोड़कर सन्यास ले चुके हैं। मठ के वर्तमान प्रबंधक रामभरत शास्त्री ने बताया कि मतदाता सूची में जो नाम दर्ज हैं, वे गलत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि यह मठ एक आध्यात्मिक केंद्र है, जहां रहने वाले सभी लोग गुरु-शिष्य परंपरा का पालन करते हैं। इस परंपरा के अनुसार जब कोई व्यक्ति सन्यास लेता है, तो वह अपने गुरु को ही आध्यात्मिक पिता मानता है।
जब ऐसे साधु अपने दस्तावेज (जैसे आधार कार्ड, वोटर आईडी आदि) बनवाते हैं, तो उसमें अपने जन्म देने वाले पिता का नाम नहीं, बल्कि गुरु का नाम लिखवाते हैं। यही कारण है कि मतदाता सूची में कई लोगों के पिता के नाम में ‘रामकमल दास’ लिखा हुआ है। यह कोई धोखाधड़ी नहीं, बल्कि धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। मठ के वरिष्ठ शिष्य अभिराम दास ने जानकारी दी कि यह परंपरा न केवल धार्मिक रूप से मान्य है, बल्कि इसे कानूनी मान्यता भी प्राप्त है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2016 में भारत सरकार ने एक आदेश जारी किया था जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि साधु-संन्यासी अपने दस्तावेजों में गुरु का नाम पिता के रूप में दर्ज कर सकते हैं। यह पूरी प्रक्रिया वैध और संवैधानिक है।
संत समाज की प्रतिक्रिया- इस पूरे विवाद पर संत समाज ने गहरी नाराजगी जताई। अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कांग्रेस के आरोपों को नकारते हुए कहा कि यह एक प्राचीन सनातन परंपरा है, जिसे बिना सही जानकारी के राजनीतिक रूप से बदनाम किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि गुरुकुलों और मठों में रहने वाले ब्रह्मचारी और साधु अपने गुरु का नाम ही अपने पिता के स्थान पर लिखते हैं। यह परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है और इसे समझे बिना आरोप लगाना गलत है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस तरह की गलत सूचनाएं फैलाई गईं, तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
‘बुद्धि शुद्धि पूजन’ और अपील- संतों ने इस गलतफहमी को दूर करने के लिए एक ‘बुद्धि शुद्धि पूजन’ भी किया और सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि धार्मिक परंपराओं को राजनीतिक मुद्दा न बनाएं।

















