इसमें संदेह नहीं है कि अमेरिका द्वारा बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को ‘विशेष रूप से चिन्हित वैश्विक आतंकवादी’ का दर्जा दिया है। लेकिन जानकारों का मानना है कि अमेरिका में मौजूद जिन्ना के देश के सेना प्रमुख असीम मुनीर ने ऐसा करवाने के लिए बेशक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पैरों पर गिरकर मिन्नतें की होंगी, मुनीर अमेरिका के आगे गिड़गिड़ाए होंगे कि ‘इस संगठन ने जिन्ना के देश को बेहाल किया हुआ है इसलिए इस पर पाबंदी लगा दें।’ कहना न होगा कि पाकिस्तान और बलूचिस्तान के बीच दशकों से चले आ रहे संघर्ष ने इस घटना के बाद एक नया मोड़ लिया है। अमेरिका ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी के साथ ही उसकी फिदायीन इकाई मजीद ब्रिगेड को भी आतंकी संगठन घोषित कर दिया। यह कदम हर हाल में पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर की अमेरिका यात्रा से जोड़कर देखा जाना चाहिए। बलूच कार्यकर्ताओं ने तो खुलेआम कहा है कि ऐसा “अमेरिका के पैर पकड़कर” हासिल किया गया है।
अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को “स्पेशली डेजिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट” घोषित किया है। बताया गया है कि यह निर्णय 2019 में शुरू हुए एक के बाद एक आतंकी हमलों और हाल में कराची व ग्वादर में आत्मघाती हमलों के आधार पर लिया गया है। जैसा पहले बताया, पाकिस्तानी फौज इस गुट से भयंकर रूप से त्रस्त थी। इसलिए वह देश लंबे समय से बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को आतंकी संगठन घोषित करने की मांग करता आ रहा था। असीम मुनीर की अमेरिका यात्रा के दौरान यह मांग पूरी हुई, जिसे पाकिस्तान की ‘कूटनीतिक जीत’ बताया जा रहा है।

बलूच मानवाधिकार कार्यकर्ता मीर यार बलूच ने इस निर्णय की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा है कि बलूच आतंकी नहीं, बल्कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के शिकार हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, बलूच नेताओं को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में लिया गया है। महरंग बलूच, बेबर्ग जेहरी जैसे कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया गया है। इधर पाकिस्तान सरकार ने बलूचिस्तान में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं और सार्वजनिक रूप से लोगों के एक जगह इकट्ठे होने पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह कदम बलूचों की आवाज दबाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। ऐसी अनेक रिपोर्ट हैं कि बलूच नेताओं को जेलों में बिना आरोप के रखा गया है, जहां से उन्हें जमानत तक नहीं लेने दी जा रही है, उन्हें उनके परिवारों से मिलने नहीं दिया गया है।
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी साल 2000 के दशक में अस्तित्व में आई थी। यह संगठन पाकिस्तान से बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की मांग करता है। इस संगठन की फिदायीन इकाई, मजीद ब्रिगेड नौजवान बलूचों को कड़ा प्रशिक्षण देकर फिदायीन हमलों के लिए तैयार करती है। इसका नाम बलूच स्वतंत्रता सेनानियों ‘लांगो’ और ‘मजीद’ के नाम पर रखा गया है। बलूच समुदाय से शरी बलूच, सुमैया कलंदरानी जैसी महिलाएं भी मजीद ब्रिगेड में शामिल हैं, जो बलूच आंदोलन में एक नया मोड़ आने का संकेत देता है।
बलूच नेता मीर यार बलूच ने कहा है कि बलूच लोगों ने कभी अमेरिकी हितों पर हमला नहीं किया। इसके उलट, पाकिस्तान ने आतंकवादियों को पनाह दी और अमेरिका विरोधी रैलियां आयोजित कीं। इस ओर पाकिस्तान का दोहरा रवैया रहा है। बलूच कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पाकिस्तान खुद आतंकवाद को बढ़ावा देता है, लेकिन बलूचों को आतंकी घोषित कर लोकतांत्रिक आवाज को दबाना चाहता है।

उधर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी के हमलों ने चीन को भी चिंतित किया हुआ है। पिछले दिनों जाफर एक्सप्रेस के अपहरण ने चीन को आतंकवाद विरोधी सहयोग की पेशकश करने पर मजबूर किया था। बलूचिस्तान में पाकिस्तान का दमन और अमेरिका द्वारा बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को आतंकी संगठन घोषित करना एक जटिल अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य बन गया है। जहां पाकिस्तान इसे अपनी ‘कूटनीतिक जीत’ मानता है, वहीं बलूच कार्यकर्ता इसे अन्यायपूर्ण और दोहरे मानदंडों का उदाहरण बताते हैं। बलूच आंदोलन अब सिर्फ एक इलाकाई विद्रोह नहीं, बल्कि मानवाधिकार, लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय न्याय मांगता आंदोलन बन चुका है।

















