उत्तरकाशी के धराली कस्बे में बादल फटने से प्रलय का प्रचंड प्रकोप
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होम विश्लेषण

उत्तराखंड : उत्तरकाशी के धराली कस्बे में बादल फटने से प्रलय का प्रचंड प्रकोप

उत्तरकाशी के धराली कस्बे में बादल फटने से आए भीषण जल प्रलय ने तबाही मचाई। यह आपदा हिमालय क्षेत्र में मानव द्वारा प्रकृति से छेड़छाड़ करने के दुष्परिणाम की बानगी

Written byदिनेश मानसेरादिनेश मानसेरा
Aug 12, 2025, 07:05 pm IST
in विश्लेषण, उत्तराखंड
उत्तरकाशी जिले के धराली में आई आपदा का दृश्य

उत्तरकाशी जिले के धराली में आई आपदा का दृश्य

उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिले के धराली कस्बे में 5 अगस्त, 2025 को दोपहर 1:50 बजे भागीरथी गंगा की सहायक जलधारा खीर गंगा ने जल प्रलय का रूप धारण कर भारी तबाही मचाई। लगभग 12,600 फीट की ऊंचाई से 43 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पानी और मलबा नीचे आया जो महज आधे मिनट में तबाही मचाते हुए भागीरथी में समा गया। जल प्रलय इतना तीव्र और भीषण था कि यह धराली कस्बे के दर्जनों भवन, वाहन, सड़कें और इनसानों को बहा ले गया।

यह आपदा बादल फटने के कारण आई। भारी बारिश के कारण ग्लेशियर की झीलों का पानी किनारों से बाहर बहते हुए तीव्र प्रवाह में बदला और पुरानी नदी के मार्ग पर बाढ़ के हालात पैदा कर दिए। इसमें 6 लोगों की मौत हो गई, जबकि सेना के 10 जवान सहित 30 से अधिक लोग लापता हैं। कई घर पूरी तरह मलबे में दब गए हैं। दर्जनों दुकानें, होटल, घर, मोबाइल टावर और सड़कें मलबे में समा गईं। भटवाड़ी से धराली और धराली से गंगोत्री तक राष्ट्रीय राजमार्ग कई जगहों पर क्षतिग्रस्त हो गया है। बचाव एवं राहत कार्य जारी हैं। अब तक 11 जवानों सहित 13 लोगों को बचाया गया है।

विशेषज्ञों ने उत्तराखंड के नियोजित विकास में विशेषज्ञ राय और जलाशयों के लिए दिशानिर्देशों को अनदेखा करने को लेकर कड़ी आलोचना की है। धराली कस्बे में जहां तबाही हुई, कहा जाता है कि वह नदी का ‘फ्लड जोन’ था, जहां हाल के वर्षों में शहर का एक हिस्सा बसा दिया गया।

भू-गर्भ विशेषज्ञ डॉ. एके बियानी कहते हैं कि धराली का जल ग्रहण क्षेत्र कटा-फटा और तीव्र ढलान वाला है, जो बादल फटने के हालात के अनुकूल है। नदी के तेज बहाव के कारण मलबा, कंकड़-पत्थर भी बहकर जल प्रवाह की मारक क्षमता बढ़ाते हैं। धराली की भार वहन क्षमता इतनी नहीं थी, जितनी वहां आबादी बसा दी गई। कस्बे के निचले हिस्से, जो प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र (फ्लड जोन) था, वहां पिछले 20-30 वर्षों में जो होटल, मकान और सड़कें बनीं, वही आपदा के शिकार बने। ऊंचाई वाले स्थान पर बसी पुरानी आबादी को कोई नुकसान नहीं हुआ।

गढ़वाल विश्वविद्यालय के भू-वैज्ञानिक प्रो. एसटी बिष्ट ने कहा कि उत्तराखंड के नियोजित विकास के लिए विशेषज्ञों की राय को अनदेखा किया जाता रहा है। नदियों के फ्लड जोन में कोई निर्माण नहीं होना चाहिए। ऐसे जल प्रलय हिमालय की नदियों का स्वभाव हैं, लेकिन हम इसकी अनदेखी करते रहे हैं। इस इलाके को भूकंप और प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है। पहले भी धराली के निकट कनोडिया घाटी में 1978 और पिछले दशकों में कई आपदाएं आई हैं।

जब कनोडिया गाड़ ने विकराल रूप धरा

यह संयोग ही है कि 6 अगस्त, 1978 को धराली से कुछ किलोमीटर नीचे छोटी-सी कनोडिया गाड़ ने भी विकराल रूप दिखाया था। तब इसने डबराणी में गंगा का प्रवाह रोक दिया था। आज भी यदि खीर गंगा में पानी और कुछ देर तक बहता, तो वैसे ही हालात बन सकते थे। उस आपदा पर लोक कवि घनश्याम ‘सैलानी’ ने गढ़वाली में एक गीत में लिखा था –
छै अगस्त उन्नीस अट्ठोत्तर
गंगा जी मां कम थौ पाणी
पता चले कि पाड़ टूटे
हरसिल उदैं ज्योति घबराणी …
क्यों आया जल प्रलय ?
इस पर मौसम वैज्ञानिकों और भूवैज्ञानिकों के अपने-अपने तर्क हैं। मौसम वैज्ञानिकों ने यहां लगातार बारिश की चेतावनी जारी की थी। दूसरी ओर, भू-वैज्ञानिकों का मानना है कि भारी बारिश और ग्लेशियर के कारण बनी झीलों में पानी ओवरफ्लो हुआ और बाढ़ के रूप तेजी से नीचे आया। पुराने लोग बताते हैं कि नदी एक न एक दिन अपने पुराने मार्ग पर लौटती है। खीर गंगा ने अपने पुराने मार्ग पर ही जल प्रलय दिखाया। फ्लड जोन में पिछले कुछ सालों में जो नए होटल, मकान, सड़कें और पुल बने, वही आपदा का शिकार बने।
दरअसल, नीचे जिसे धराली गांव बताया जा रहा है, वह खीर गंगा का पुराना बगड़ और थाला है। गांव ऊपर की ओर है। खीर गंगा के दोनों ओर बीते कुछ वर्षों में जो बस्ती बस गई थी, उसकी जगह अब गाद मलबा भर गया है और इसके नीचे न जाने कितनी जिंदगियां दफन हो गई हैं। घनश्याम ‘सैलानी’ के उस गीत की आखिरी पंक्ति में आखिरी शब्द यही धराली गांव था-
अलग-थलग पड़ेगे सब जीवन
सालंग हुरी पुराली को
जिल्ला से संबंध कटीगे
हर्षिल, मुखवा धराली को
गंगा बेसिन में हर वक्त खतरा
ग्लेशियर के समीप उत्तरकाशी क्षेत्र को गंगा बेसिन भी कहा जाता है। भगीरथ गंगा को यहीं से लेकर गए थे। गोमुख, गंगोत्री से निकलने वाली धारा गंगा कहलाती है, जिसमें खीर गंगा जैसी न जाने कितनी धाराएं मिलती हैं। यह क्षेत्र भूकंप और प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है। उत्तरकाशी से गंगोत्री के बीच पूर्व में जल विद्युत परियोजनाओं की योजनाओं का खाका खींचा गया था, जिसे बाद में पद्म विभूषण भू-गर्भ वैज्ञानिक प्रोफेसर खड़क सिंह वाल्दिया की रिपोर्ट के आधार पर प्नधानमंत्री कार्यालय ने रोक दिया था।

राज्य सरकार ने आपदा के तुरंत बाद राहत और बचाव कार्य शुरू कर दिए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने घटनास्‍थल का दौरा कर राहत कार्यों के लिए 20 करोड़ रुपये जारी किए हैं। सेना, वायुसेना, आईटीबीपी, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस और स्वयंसेवी संगठन बचाव और राहत कार्यों में लगे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य केंद्रीय मंत्री गहन दुःख व्यक्त करते हुए तत्काल सहायता का आश्वासन दे चुके हैं। केंद्रीय और राज्य सरकार प्रभावितों को पूर्ण सहायता सुनिश्चित कर रही है।

यह आपदा केदारनाथ, डबराणी जैसी पिछली त्रासदियों की याद दिलाती है, जहां भारी बारिश, बादल फटने और नदी के तेज बहाव ने तबाही मचाई थी। साथ ही, यह आपदा हिमालय क्षेत्र में हो रही प्राकृतिक आपदाओं को मानव निर्मित आपदाओं से जोड़ने को मजबूर करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक जल प्रलय का खतरा हमेशा बना रहता है, खासकर जब मानव निर्मित विकास नदी के प्राकृतिक मार्गों और फ्लड जोन में किया जाता है। इसलिए नियोजित और सतत विकास के लिए विशेषज्ञों की सलाह लेना और नदी प्रणालियों का सम्मान करना अत्यंत आवश्यक है।

उत्तरकाशी ने जितनी आपदाएं देखी हैं, उतनी ही वीरता भी दिखाई है। 1978 की डबराणी बाढ़ से लेकर, 1991 का भूकंप, 2003 में वार्णावत पर्वत का भयावह भूस्खलन, 2012 में अस्सी गंगा पर बादल का कहर, 2013 की भयावह बाढ़ और अब 2025 में धराली गांव। स्थानीय निवासियों को विश्वास है कि इतनी आपदाएं झेलने वाली उत्तरकाशी घाटी एक बार फिर गुंजायमान होगी।

Topics: Kheer Gangaकनोडिया गाड़disaster Kedarnathप्रलय का प्रचंड प्रकोपDabraniDharali to GangotriKanodia Gadsevere outbreak of disasterधरालीआपदा केदारनाथChief Minister Pushkar Singh Dhamiडबराणीपाञ्चजन्य विशेषखीर गंगाDharaliधराली से गंगोत्री
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