भारतीय इतिहास त्याग और पराक्रम की अनगिनत कहानियों से समृद्ध है, जहां जीवन और शीश की तुलना में समर्पण को अधिक महत्व दिया गया। लेकिन अंग्रेजों और कुछ मुस्लिम इतिहासकारों ने इस गौरवशाली इतिहास को बदनाम करने के लिए कई झूठी कहानियां गढ़ीं, खासकर मेवाड़ के इतिहास को विकृत किया।

अधीक्षक, प्रताप गौरव शोध केंद्र, उदयपुर
चाहे महाराणा सांगा द्वारा बाबर को आमंत्रण भेजने की बात हो, रानी कर्मावती द्वारा हुमायूं को राखी भेजने की कपोल कथा हो, हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप की पराजय या मेवाड़ के युवराज के हाथ से बिल्ली द्वारा रोटी छीनने की झूठी कहानी। इन सब का उद्देश्य भारत के मान बिंदुओं को कमजोर कर भारतीयों को ‘स्व’ पर गर्व करने से रोकना था, ताकि वे हमेशा स्वयं के दूसरों से शासित होने या पराजित होने के भाव से ग्रसित रहें।
इतिहासकारों का गल्प
किस्सागो साहित्यकारों ने कहानी कुछ यूं गढ़ी। बाबर का सबसे बड़ा बेटा और हुमायूं अपना राज्य बचाने की कोशिश कर रहा था। उस समय मेवाड़ का राजपाट महाराणा विक्रमादित्य के हाथ में था, जो अपेक्षाकृत कमजोर था। उसकी मां कर्मावती उसकी संरक्षक थी। फिर भी मेवाड़ के सभी सामंत और सहयोगी उसके साथ थे।
महाराणा सांगा की मृत्यु के बाद कर्मावती के भाई और बूंदी के राव सूरजमल ने उनके पुत्र और महाराणा रतन सिंह की हत्या कर दी थी। लेकिन मरने से पहले महाराणा रतन सिंह ने सूरजमल को मार दिया। मेवाड़ के दो सक्षम सेनापतियों की मौत के बाद किशोर व अल्प बुद्धि महाराणा विक्रमादित्य को राजपाट मिला। मेवाड़ को कमजोर मान कर 1533 ई. में गुजरात के मुस्लिम शासक बहादुरशाह ने आक्रमण कर दिया। दिलचस्प बात यह कि इसमें अंग्रेजों ने एक और कहानी जोड़ी कि कर्मावती ने बहादुरशाह से रक्षा के लिए एक अनुरोध पत्र के साथ राखी भी भेजी। यह भी कहा कि ‘हम आपस में संधि कर लें और मिलकर बहादुरशाह का सामना करें।’
बात यहीं खत्म नहीं होती है। कहानी में यह जोड़ा गया कि कर्मावती का पत्र और राखी देखकर हुमायूं के मन में करुणा जाग गई। वह सेना लेकर मेवाड़ की रक्षा के लिए चल पड़ा। दूसरी ओर, रानी कर्मावती राज्य की रक्षा के लिए अपने सामंतों को भी मना रही थीं। चूंकि सामंत रानी के बेटे विक्रमादित्य को पसंद नहीं करते थे, इसलिए युद्ध करने से कतरा रहे थे। लेकिन जब रानी ने कहा कि वे विक्रमादित्य नहीं, सिसोदिया वंश के सम्मान के लिए राज्य की रक्षा करें तो एक शर्त पर वे तैयार हो गए। शर्त थी कि रानी के दोनों बेटे विक्रमादित्य और उदय सिंह युद्ध में भाग नहीं लेंगे। रानी उन्हें बूंदी भेज देंगी। रानी मान गईं और सरदारों के साथ बहादुरशाह का मुकाबला करने लगीं, लेकिन हुमायूं मेवाड़ नहीं आया। वह न तो किसी काफिर की रक्षा करना चाहता था और न ही राजनीतिक तौर पर अपने राज्य के निकट मेवाड़ जैसे सक्षम राज्य को देख सकता था।
इतिहास में प्रमाण नहीं
कर्मावती (कर्मेती) मेवाड़ की महारानी और महाराणा संग्राम सिंह प्रथम अर्थात् महाराणा सांगा की पत्नी थीं, जिनका 1509 से 1528 ई. के बीच पूरे उत्तर भारत पर अधिकार था। तब भारत की सत्ता का केंद्र दिल्ली नहीं, चित्तौड़ था। सांगा ने विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध भारत का परचम बुलंद किया और अपने जीते जी उन्हें भारतीय सीमा में टिकने नहीं दिया। अपने समय में वे उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली राजा थे। उन्होंने दिल्ली, गुजरात और मालवा के साथ मुगल आक्रांताओं को परास्त कर ‘हिंदू सुरत्राण’ की उपाधि धारण की। कुछ दस्तावेजों के अनुसार, सांगा ने 100 से अधिक युद्ध किए। उनके शरीर पर 80 से अधिक युद्ध घाव थे। उनका हाथ कट गया, आंख चली गई, फिर भी प्रत्येक युद्ध में सेना का नेतृत्व कर उदाहरण प्रस्तुत किया।
ऐसे प्रतापी सांगा की रानी और मेवाड़ जैसे विशाल सम्राज्य की राजमाता, जो हजारों राजपूत सामंतों का नेतृत्व कर रही हो, हुमायूं को पत्र क्यों लिखतीं? उस समय बूंदी का रक्षक राव सुरतान और उसका भतीजा था, ऐसे में कर्मावती को हुमायूं को राखी भेजने की आवश्यकता ही क्या थी? वह भी ऐसे शासक को जो खुद लाचार था और अपना राज्य बचाने के लिए दर-दर भटक रहा था। कर्मावती अगर हुमायूं को राखी भेजती भी तो कहां? हुमायूं का तो कोई ठिकाना ही नहीं था। एक ओर वह अपने भाइयों हिन्दाल और अस्करी से अपने राज्य को बचाने में लगा हुआ था, तो दूसरी ओर बिहार का शेर खां उसके लिए मुसीबत बना हुआ था।
सच यह है कि कर्मावती द्वारा मदद के लिए हुमायूं को पत्र लिखने और राखी भेजने का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
हुमायूं के न पहुंचने का तर्क
फिर भी किस्सगो लिखते हैं कि हुमायूं पत्र मिलने के बाद मेवाड़ की रक्षा के लिए चला तो, पर समय पर नहीं पहुंच सका। इसलिए बहादुरशाह की सेना मेवाड़ के काफी करीब पहुंच गई। हार नजदीक देखकर रानी ने हजारों राजपूत महिलाओं के साथ 8 मार्च, 1534 ई. को जौहर किया। यह मेवाड़ का दूसरा साका था। मेवाड़ के वीरों ने केसरिया पहना और मृत्यु का वरण किया।
मेवाड़ के महाराणा की मदद उनके मामा के बेटे राव सुरतान ने की और चित्तौड़गढ़ पर अधिकार करने में मदद की। वहीं, बहादुरशाह और हुमायूं के बीच मालवा को लेकर विवाद शुरू हुआ और बहादुशाह का ध्यान मेवाड़ से हट गया।
किसी भी समकालीन लेखक ने इस घटना के बारे में नहीं लिखा है। सतीश चंद्र जैसे आधुनिक इतिहासकार इसे ऐतिहासिक तथ्य के स्थान पर एक कहानी से अधिक कुछ भी नहीं मानते। ‘हिस्ट्री ऑफ मेडिवल इंडिया’ (पृष्ठ 213) में सतीश चंद्र लिखते हैं, “कुछ ऐतिहासिक किवदंतियों के अनुसार राणा सांगा की विधवा रानी कर्णावती ने हुमायूं की मदद की चाह में हुमायूं को राखी भेजी थी और हुमायूं ने उसका उत्तर भी दिया था। परंतु किसी भी समकालीन इतिहासकार ने इस कहानी का उल्लेख नहीं किया है और यह सच भी नहीं हो सकता है।’’
कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा
इतिहासकार एसके बनर्जी अपनी पुस्तक ‘हुमायूं बादशाह’ में इसे और विस्तार से लिखते हैं। पृष्ठ 87 उन्होंने लिखा है कि रानी कर्मावती ने सहायता के लिए हुमायूं को पत्र भेजा था, मगर इसके अलावा कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आई कि हुमायूं ग्वालियर तक आ गया था। वह दो महीने तक वहीं रहा। यह चित्तौड़ की पहली घेराबंदी की बात थी। इसमें रानी को बहादुरशाह के साथ एक अपमानजनक संधि करनी पड़ी थी। यह संधि 24 मार्च, 1533 को हुई थी। उसके बाद 1535 में बहादुरशाह ने फिर चित्तौड़ पर हमला किया। कर्मावती ने राजपूत राजाओं से सहायता मांगी और सभी एक साथ आए।
मगर इस बार जब रानी ने देखा कि विजय की आशा नहीं है तो राजपूत पुरुषों ने साका और रानियों ने जौहर कर लिया। यह जौहर 8 मार्च, 1535 को हुआ था। इसी पुस्तक में हुमायूं और बहादुरशाह के बीच लंबे पत्राचार का भी उल्लेख है। इसमें चित्तौड़ की भी चर्चा है। पृष्ठ 108 पर बहादुरशाह के चौथे पत्र के हवाले से लिखा गया है, ‘‘चूंकि हम ईमान और इंसाफ लाने वाले हैं, तो पैगंबर के अल्फाजों में अपने भाई की मदद करो, फिर चाहे वह जुल्मी हो या जुल्म सहने वाला।’’ हालांकि, यह किसी और संदर्भ में लिखा गया है, लेकिन यह सब उसी दौरान हो रहा था।
1534 में हुमायूं जब कालपी पहुंचा, तो वहां का शासक आलम खान मुगलों के समक्ष आत्मसमर्पण करने के बजाय बहादुरशाह के पास चला गया। बहादुरशाह और हुमायूं, दोनों को एक-दूसरे से खतरा था। ये सारे पत्राचार चित्तौड़ के युद्ध से पहले के हैं, जिनमें चित्तौड़ का भी उल्लेख है। एक पत्र में बहादुरशाह ने हुमायूं से कहा था कि वह चित्तौड़ शहर का दुश्मन है। वह काफिरों को अपनी ताकत से नष्ट करने जा रहा है, जो भी रास्ते में आएगा, तुम देखना मैं कैसे उसे मिटाता हूं।
एसके बनर्जी आगे लिखते हैं कि मुस्लिम शासकों की नीति हिंदू राजाओं और मुस्लिम शासकों के प्रति भिन्न थी। मुस्लिम शासक को किसी ‘काफिर’ राज्य के साथ स्थायी संधि बनाए रखने की अनुमति नहीं थी। 1533 में राणा के साथ संधि के बाद भी बहादुरशाह के पास एक काफिर राज्य को अपने नियंत्रण में लेने के अतिरिक्त चित्तौड़ को नष्ट करने का कोई और कारण था ही नहीं।
अगले अध्याय (पृष्ठ 118) में लिखा है कि हुमायूं और बहादुरशाह के बीच जब पत्राचार समाप्त हुआ, तब तक हुमायूं सारंगपुर पहुंच गया था। वह एक महीने से अधिक समय तक वहां रहा। जब हुमायूं पूर्वी मालवा की ओर बढ़ रहा था तो बहादुरशाह को चिंता हुई कि कहीं वह उस पर हमला न कर दे। मगर उसके वजीर सदर खान को उस मुस्लिम रिवाज पर यकीन था कि ‘काफिर’ की मदद के लिए एक मुस्लिम शासक दूसरे मुस्लिम शासक पर हमला नहीं करेगा। उसने बहादुरशाह को यकीन दिलाया कि हुमायूं उस पर तब हमला नहीं करेगा, जब वह गैर-मुस्लिम के साथ युद्ध कर रहा है और वही हुआ।
चित्तौड़ में रानी कर्मावती ने हजारों रानियों के साथ जौहर कर लिया था। जौहर पूरी तरह से सच है, हुमायूं का न आना सच है। मगर वह कहानी सच नहीं है कि हुमायूं जब आया तब रानी ने जौहर कर लिया था और राखी का मान रखते हुए हुमायूं ने बहादुरशाह पर हमला किया।
















