भारत के सुशासन मॉडल में तेजी से उभरते ओडिशा की नई भूमिका पर केंद्रित ‘पाञ्चजन्य’ द्वारा भुवनेश्वर में आयोजित सुशासन संवाद : ‘ओडिशा की उड़ान’ कार्यक्रम के तृतीय सत्र “नई दिशाएं” में बांस के नवाचार एवं विज्ञान के जादू ‘Lab in a Box’ अविष्कारक, उद्योगपति और सामाजिक नवप्रवर्तक अंबर अग्रवाल से सलाहकार संपादक तृप्ति श्रीवास्तव से हुई वार्ता के अंश
अंबर अग्रवाल ने शिक्षा के क्षेत्र में अपने उल्लेखनीय कार्यों और बांस (बेंबू) के माध्यम से पर्यावरण-अनुकूल विकास की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को विस्तार से साझा किया। MSME सेक्टर में एक सक्रिय उद्यमी होने के साथ-साथ उन्हाेंने हाल ही में ‘Lab in a Box’ नामक अभिनव प्रोजेक्ट लॉन्च किया है, जिसमें 70 से अधिक प्रयोग शामिल हैं। इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के विद्यार्थियों को सरल व व्यवहारिक ढंग से विज्ञान की शिक्षा उपलब्ध कराना है। “जो प्रयोगशालाएं लाखों रुपए में बनती हैं, वही अनुभव इस ‘बॉक्स’ के माध्यम से गांव-गांव, स्कूल-स्कूल तक बहुत कम लागत पर पहुंचाया जा सकता है।
पर्यावर्णीय विकल्प : बांस
पर्यावरण-अनुकूल विकास का आधार पर्यावरण और स्थानीय संसाधनों पर आधारित उद्योगों की चर्चा के दौरान अंबर अग्रवाल ने बांस के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह मात्र एक पौधा नहीं, बल्कि बहुपयोगी संसाधन है। उन्होंने बताया- “बांस का पेड़ तीन वर्ष में परिपक्व हो जाता है और 70 वर्षों तक उत्पादक रह सकता है। मोदी सरकार ने 2016 में इसे वन की परिभाषा से हटाकर घास के वर्ग में रखा, जिससे इसके व्यापारिक उपयोग का मार्ग प्रशस्त हुआ”। अंबर अग्रवाल ने बताया कि उनकी असम स्थित फैक्ट्री में बांस से अगरबत्ती, फाइबर बोर्ड, दरवाजों की चौखट, फर्नीचर, कपड़े, ताैलिए, चप्पल, टाइलें और अन्य टिकाऊ उत्पाद बनाए जा रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने उल्लेख किया कि नवनिर्मित संसद भवन में भी बांस आधारित फर्श और पैनलिंग का उपयोग हुआ है।
भारत में अब तक इस संसाधन का समुचित उपयोग न होने के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि तकनीकी ज्ञान के अभाव और पुरानी नीतियों के कारण बांस की वास्तविक क्षमता का दोहन नहीं हो पाया। लेकिन अब आधुनिक तकनीक ने सिद्ध कर दिया है कि बांस 50 वर्ष से अधिक टिकाऊ होता है और इसका कोई भी हिस्सा बेकार नहीं जाता।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़
ओडिशा में बांस आधारित उद्योगों की संभावनाओं पर विश्वास व्यक्त करते हुए अंबर अग्रवाल ने कहा- “बांस की खेती किसानों के लिए बड़े फायदे का सौदा है, क्योंकि यह बेहद कम लागत में तैयार होता है, इसे बार-बार बोने की आवश्यकता नहीं होती और इसे स्थानीय स्तर पर ही प्रोसेस किया जा सकता है”। उन्होंने यह भी कहा कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में छोटी-छोटी इकाइयां स्थापित कर किसानों को प्रशिक्षित किया जाए तो बांस भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकता है। इस दिशा में उन्होंने सरकार से नीति स्तर पर सहयोग, ट्रेनिंग, मशीनरी और मार्केटिंग में सहायता के लिए युवाओं और किसानों का आह्वान किया। अंत में अंबर अग्रवाल ने कहा- “अगर कोई युवा या किसान इस क्षेत्र में काम करना चाहता है, तो मैं अपनी ओर से हर संभव मदद करूंगा। मेरा उद्देश्य यही है कि कम लागत में अधिकतम लाभ मिले और बांस आधारित उद्योग आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करे।

















