सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन विवाद पर सुनवाई की। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बागची की टीम ने मामले को सुना। याचिकाकर्ता ने उत्तर प्रदेश सरकार के नए कानून को चुनौती दी है, जो मंदिर का प्रबंधन एक ट्रस्ट को देने की बात करता है। वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने कहा कि बांके बिहारी मंदिर एक निजी धार्मिक संस्था है और सरकार बिना अनुमति इसके प्रबंधन में दखल दे रही है।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार मंदिर की आय से जमीन खरीदने और निर्माण जैसे काम करना चाहती है, जो कि अनुचित है। उन्होंने कहा, “यह हमारा निजी धन है, सरकार इसे जबरन ले रही है।” इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया, “कोई भी देवता पूरी तरह निजी नहीं हो सकते। जब लाखों लोग दर्शन करने आते हैं, तो मंदिर को केवल निजी संस्था कैसे कहा जा सकता है?”
कोर्ट ने यह भी कहा कि मंदिर की कमाई सिर्फ प्रबंधन के लिए नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं और मंदिर क्षेत्र के विकास के लिए भी होनी चाहिए। सरकार की ओर से वकील नवीन पाहवा ने बताया कि सरकार यमुना तट से मंदिर तक एक कॉरिडोर बनाना चाहती है ताकि दर्शन करने वालों को सुविधा मिले। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर का पैसा केवल मंदिर से जुड़ी गतिविधियों पर ही खर्च किया जाएगा। कोर्ट ने सुझाव दिया कि मंदिर फंड के उपयोग की निगरानी के लिए हाईकोर्ट के किसी रिटायर्ड जज को नियुक्त किया जा सकता है, जो एक न्यूट्रल समिति के अध्यक्ष होंगे।
कोर्ट ने गोस्वामी समाज से पूछा कि क्या वे मंदिर की आय का कुछ हिस्सा श्रद्धालुओं की सुविधा पर खर्च करने को तैयार हैं। वकील श्याम दीवान ने इस पर सहमति जताई। दीवान ने यह भी बताया कि मंदिर का प्रबंधन अभी 250 से अधिक गोस्वामी कर रहे हैं, और वे इसी व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि एक पुराने हाईकोर्ट के फैसले में बिना मंदिर पक्ष को सुने निर्णय दे दिया गया था। कोर्ट ने कहा मंदिर खाली जमीन नहीं है और पहले इसके लिए जिम्मेदार बनाए जा चुके हैं। अगली सुनवाई 5 अगस्त सुबह 10:30 बजे होगी।















