देहरादून: देवभूमि में राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण की वजह से बाहरी लोग यहां आ कर सरकारी भूमि पर अतिक्रमण कर रहे है। जिन्हें मुक्त कराने के अभियान में उत्तराखंड सरकार के करोड़ों रु और समय नष्ट हो रहे हैं। इस समस्या के स्थाई समाधान के लिए धामी सरकार अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ कानूनों को और सख़्त करते हुए जुर्माने और सजा का प्रावधान कर सकती है।
उल्लेखनीय है उत्तराखंड में 70 फीसदी जंगल है और 30 प्रतिशत भूभाग में शहर, गांव,सड़के,नहरें आदि है, जहां करीब 1 करोड़ 30 लाख आबादी निवास कर रही है। यानि पहली नजर में राज्य के पास आबादी भूभाग की कमी है। जहां बड़ी संख्या में अतिक्रमण हो चुका है।
अतिक्रमणकारियों ने नदी-नालों, नहरों तक को नहीं छोड़ा
सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों ने नदी नाले नहर गूलों को नहीं छोड़ा, रेलवे, वन, लोक निर्माण, नगर विकास, ऊर्जा ,ग्राम सभा आदि सेक्टर की सरकारी भूमि को अपना लक्ष्य बनाया हुआ है। धामी सरकार ने पिछले दो सालों में करीब 7 हजार एकड़ सरकारी भूमि को अवैध कब्जों से मुक्त करवाया है। लेकिन अब भी हजारों एकड़ भूमि पर अवैध कब्जे हैं। खास बात ये कि ज्यादातर कब्जे उत्तराखंड से बाहर से आए हुए लोगों ने किए हैं जो कि अब डेमोग्राफी चेंज की समस्या भी बनते जा रहे हैं।सरकारी जमीन पर अवैध रूप से धार्मिक संरचनाएं खड़ी करके कब्जे करने की तरफ धामी सरकार का ही सबसे पहले ध्यान गया है अब तक करीब 6 सौ धार्मिक संरचनाओं को ध्वस्त करके, सरकार ने अपनी भूमि कब्जा मुक्त करवाई है।
अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ कानून की जरूरत
जानकारी के अनुसार धामी सरकार अब अवैध कब्जा करने वाले तत्वों से सख्ती से निपटना चाहती है। जिसके लिए सख्त कानून की जरूरत है। सरकार ने राज्य में भूमि की खरीद फरोख्त करने वाले बाहरी लोगों के लिए सख्त भूमि कानून तो बना दिया लेकिन असल में सख्त भू कानून अवैध कब्जे करने वालों के खिलाफ भी बनाए जाने की जरूरत समझी जा रही है।
ऐसी भी जानकारी मिली है कि कुछ माह पहले ऐसे कानून की रूप रेखा बनाई जा रही थी जिसमें सरकारी भूमि पर कब्जे करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनों के एक्ट के प्रावधानों में भारी जुर्माने के साथ साथ कड़ी सजा का भी प्रावधान किए जाने की बात कही गई थी। लेकिन किन्हीं कारणों से उक्त विषय पर ज्यादा चर्चा नहीं हो सकी।
भ्रष्ट अफसरशाही बनी बड़ी समस्या
धामी सरकार चाहती है कि सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा करने वालों से सख्ती से निपटा जाए। लेकिन सरकार की राह में रोड़ा भू माफिया और भ्रष्ट अफसरशाही का गठजोड़ बन जाती है। ये ऐसा गठजोड़ है जो कि पिछले बीस सालों के उत्तराखंड के इतिहास में हर दल की सरकार में अपनी घुसपैठ करता रहा है। देहरादून हरिद्वार नैनीताल उधम सिंह नगर और पौड़ी जिले में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण की समस्या से शासन प्रशासन जूझ रहा है। इन सभी जिलों के नदी नाले जलाशय आदि सरकारी भूमि पर भी कब्जे करके या तो बाहरी राज्यों से आए लोग स्वयं बैठ गए हैं या राजनीतिज्ञों द्वारा वोट बैंक बनाने के लिए बिठा दिए गए है।
नारायणदत्त तिवारी के शासनकाल से शुरू हुआ अतिक्रमण का सिलसिला
ये सिलसिला आज से नहीं बल्कि नारायण दत्त तिवारी के शासन काल से शुरू हुआ था। नतीजा आज ये है कि मैदानी जिलों में यूपी बिहार असम झारखंड छत्तीसगढ़ के अलावा पड़ोसी देशों से आए लोगों ने जनसांख्यिकी बदलाव की समस्या पैदा कर रहे है। उल्लेखनीय है कि इसी समस्या से असम भी जूझ रहा है जहां बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाओ अभियान की जरूरत पड़ी है, यूपी बिहार के नेपाल बॉर्डर पर भी ऐसी ही समस्या गहराई हुई है।
अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं : धामी
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपने बयानों में स्पष्ट तौर पर कहते रहे है कि देव भूमि में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण सहन नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जब तक सरकारी भूमि को अवैध कब्जों से मुक्त नहीं करा लिया जाता तब तक ये अभियान जारी रहेगा। हम उत्तराखंड की डेमोग्राफी को बदलने नहीं देंगे।

















