भारत का पराक्रम किसी तुर्क, मुगल, अंग्रेज अथवा वामपंथियों के लेखन का मोहताज नहीं है। भारत के वीरों ने इस धरती को अपने रक्त से सींचा है और उसकी रक्षा के लिए जीवन को एक खेल समझ कर मृत्यु का वरण किया है। राजस्थान का नाम भारत के इतिहास में इस मामले में सबसे उपर है। चुरु के बोबासर गांव में जन्मे क्रांतिकारी कवि शंकरदान सामाैर ने लिखा है-
पाणी रो कांई पिवणो, आ रगत पिवणी रज। शंके मन में शर्म हा, इण नहीं बरसे गज।।
अर्थात् राजपूताने की धरती पर, बादल पानी इसीलिए नहीं बरसाते, क्योंकि उन्हें शर्म आती है कि इस रक्त पीने वाली धरती की पानी से क्या प्यास बुझेगी। राजपूताने की धरती ऐसी है कि राष्ट्र रक्षण के लिए शूरवीरों ने रक्त को पानी की तरह बहाया। न तो जीवन का मोल रखा और न ही रक्त का।
हर बार हारा दुश्मन
पराक्रम ऐसा कि तलवारों से उधड़ते बख्तरों से चकमा के हजारों सूर्य की चमक भी फीकी पड़ गई। मानों आत्मोत्सर्ग का उत्सव चल रहा था और हर कोई मातृभूमि के लिए अपना शीश उतार कर रुण्ड बनने को तैयार था। 738 ई. में बप्पा रावल ने अरबों को भारत से बाहर खदेड़ा। उनके चौथे उत्तराधिकारी खुमाण द्वितीय के कार्यकाल 813 ई. में बगदाद के खलीफा अलमामूं (813-33 ई.) ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की। उनकी सहायता के लिए बहुत से राजा आए और चित्तौड़ सुरक्षित रहा। उन्होंने 24 युद्ध किए और 813 ई. से 843 ई. तक राज्य किया। यह समस्त वर्णन ‘दलपत विजय’ रचित खुमाण रासो के आधार पर लिखा गया है।

अधीक्षक, प्रताप गौरव शोध केन्द्र, उदयपुर
इसके बाद रावल जैत्र सिंह के काल में अल्तमश को 1228 में भूताला में पराजित कर दिल्ली भगा दिया गया। आर.सी. मजूमदार की पुस्तक ‘द हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ इण्डियन पीपल्सः द दिल्ली सल्तनत’ (द्वितीय संस्करण) के पृष्ठ संख्या 70 पर लिखा है, ‘‘महाराणा हम्मीर सिंह ने 1336 ई. में सिंगोली की लड़ाई में मोहम्मद-बिन-तुगलक को गिरफ्तार किया और उसे चित्तौड़ ले आए जहां उसे 6 माह तक कैद रखा।
ऐसी कई कहानियां हैं, जो दिल्ली सल्लनत और मुगल साम्राज्य की विजय के सत्य और भारत पर अधिकार को चुनौती देती हैं। दिल्ली सल्तनत के घटने और बढ़ने के दौरान एक उक्ति बड़ी प्रचलित हुई, ‘सल्तनत-ए-शाह आलम, अज दिल्ली ता पालम।’ इससे स्पष्ट होता है कि दिल्ली सल्तनत की सत्ता दिल्ली से पालम तक ही दिखाई देती है। इसके आगे वह लाचार नजर आती है। उदाहरण के तौर पर राजस्थान के भरतपुर के जाट राजा गोकला ने 1669 ई. में औरंगजेब के काल में सात दिन तक दिल्ली को कब्जे में रखा और लाल किले से कोई बाहर नहीं निकल सका।
बाबर को लेकर झूठा बखान
बाबर के बारे में अक्सर कहा जाता है कि उसने भारत पर शासन किया, लेकिन वह स्वयं अपनी किताब ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में लिखता है कि वह आगरा से आगे जा नहीं पाया और पूरब में भी अयोध्या तक ही रहा, तो फिर उसे पूरे भारत का बादशाह कैसे कहा जा सकता है? उसके काल में मेवाड़ के महाराणा सांगा ने सिन्धु की सीमा से लेकर बेतवा के तट से आगे गंगा घाटी के दक्षिणी किनारे तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। वहीं, दक्षिण में विजयनगर साम्राज्य अपने चरम पर था और राजा कृष्णदेव राय ने दक्षिण के इस्लामी राज्यों अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा, बीदर और बरार को पराजित कर अपने राज्य का विस्तार पूरे दक्षिण भारत में कर लिया था। ऐसे में यह कहना कि तुर्कों और मुगलों ने पूरे भारत पर राज किया, गलत है।

बाबर ने जब दिल्ली को जीता, उस समय उत्तर में महाराणा सांगा, दक्षिण में बहमनी, विजयनगर और अन्य शक्तियां काफी मजबूत थीं, जो उसे चुनौती देने में सक्षम थीं। इसके अलावा, बाबर पूरब तक कभी पहुंचा ही नहीं। इतिहास बताता है कि खानवा के धावे के बाद बाबर ने आगे कोई क्षेत्र नहीं हथियाया, लेकिन राणा सांगा ने शक्ति संचय कर पुनः अपने क्षेत्रों को अधिकार में ले लिया।
अफगानी इतिहासकार अहमद यादगार अपनी पुस्तक तारीख-ए-सल्तनत-ए-अफगान में लिखता है, ‘उस समय दिल्ली में सत्तासीन सुल्तान इब्राहिम लोदी का चाचा दौलत खां लोदी पंजाब का सूबेदार था। सुल्तान ने अपने चाचा को दिल्ली बुलाया। दौलत खां खुद नहीं गया और अपने बेटे दिलावर खां को भेजा। इससे इब्राहिम लोदी चिढ़ गया। उसने दिलावर खां की गिरफ्तारी का आदेश दे दिया। वहां से भागकर वह दौलत खां के पास पहुंचा, दौलत खां ने ने उसे काबुल भेजा और बाबर को भारत आने का न्यौता दिया। बाबर ने लोदी पर हमला किया और दिल्ली और आगरा को अपने कब्जे में ले लिया।’
1527 की शुरुआत में बाबर ने सांगा के खिलाफ बयाना पर हमला किया तो सांगा ने मुगल सेना को तितर-बितर कर दिया। इसके बाद बाबर ने अपनी शक्ति को जुटाया और दोनों सेनाओं के मध्य 16 मार्च, 1527 ई. को खानवा में युद्ध आरम्भ हुआ। इस युद्ध में महमूद लोदी राणा सांगा का साथ दे रहा था। युद्ध के दौरान महाराणा सांगा की आंख में तीर लगने से परिस्थितियां बदलीं और मेवाड़ की सेना कमजोर पड़ गई, लेकिन मुगल सेना बयाना की और आने का साहस नहीं कर सकी और सीकरी की ओर लौट गई।
बाबर अपनी आत्मकथा में लिखता है, वह युद्ध के दूसरे दिन सीकरी से निकल कर दो कोस आगे उटांगन नदी के किनारे एक पहाड़ी ‘कोह बच्चा’ पर गया, जहां से युद्ध में हुआ नुकसान साफ दिखाई दे रहा था और उसे घबराहट हुई। इसके बाद उसने स्वयं मेवाड़ पर आक्रमण करने का विचार छोड़ दिया था।
आक्रांताओं की क्रूरता
मुसलमानों ने दक्षिण भारत में विजयनगर के सम्राट कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद दक्कन के बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुंडा, बरार और बीदर के साथ मिलकर विजयनगर पर हमला कर दिया। यह युद्ध 23 जनवरी, 1565 को तालीकोटा के निकट राक्षसी और तंगड़ी गांव के मध्य लड़ा गया। इस युद्ध में विजयनगर का नेतृत्व राम राय ने किया। वे पराजित हुए। विजित मुस्लिम गठबंधन ने विजयनगर पर अधिकार कर लिया और उसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया।
ऐसा ही सांस्कृतिक विनाश उत्तर में अल्तमश ने किया जब उसने मेवाड़ की राजधानी नागदा को जीता तो नागदा के मंदिरों और स्थापत्य को तोड़ा और शहर में आग लगा दी। इससे पूरा शहर नष्ट हो गया और उसके शानदार स्थापत्य के प्रमाण आज भी नागदा में दृष्टिगोचर होते हैं। यही कार्य बाबर ने अयोध्या में किया। जब उसके सेनापति मीर बाकी ने आगे से आगे बढ़ कर अयोध्या पर हमला किया तो वहां पर राम जन्मभूमि के मंदिर को तोड़ा और वहां पर बाबर के गुलाम बाबरी के नाम से बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया।
हमेशा अडिग रहा चित्तौड़
अकबर के छल व कुटिलता के समक्ष राजपूताने के बहुत से राजा झुक गए थे, लेकिन चित्तौड़ हमेशा अडिग रहा, तब उससे चिढ़कर उसने 1567 ई. में चित्तौड़ पर भीषण आक्रमण किया। युद्ध परिषद् में सभी सामंतों के निर्णयानुसार महाराणा उदयसिंह को परिवार सहित कुंवर प्रताप की इच्छा के विरुद्ध गिरवाकर पहाड़ी क्षेत्र में भेजने का निर्णय किया गया। सभी सामंतों के निर्णय को मानते हुए कुंअर प्रताप भी सपरिवार गोगुंदा चले गए। चित्तौड़ दुर्ग जयमल राठौड़ तथा पत्ता (फतहसिंह) चूड़ावत के नेतृत्व में युद्ध की तैयारी करने लगा।
अकबर चार मास तक चित्तौड़ दुर्ग के चारों ओर डेरा डाले बैठा रहा, किन्तु कोई सफलता नहीं मिली। इस बीच अकबर को जानकारी मिली कि चित्तौड़ से महाराणा उदयसिंह और कुंअर प्रताप सिंह निकल चुके हैं और किले का भार जयमल मेड़तिया को सौंप दिया गया है। इस पर अकबर ने जयमल को दो संधि प्रस्ताव भेजे। पहले में लिखा-‘महाराणा उदयसिंह यहां हैं नहीं, किला तेरा है नहीं, तो क्यों लड़ता है?’ जयमल का उत्तर था-
हे गढ़ म्हारो म्है धणी,
असुर आव किम आण।
कुंच्या ज्यूं चित्रकोट री,
दीधि मोही दीवाण।।
इसके बाद लालच देकर कहा कि वह जयमल को मेड़ता के साथ नागौर भी दे देगा। जवाब मिला-
भूख न मेटे मेड़तो,
न मेटे नागौर,
रजवट भूख अनोखड़ी,
मटे मर्या चित्तौड़।।
फिर अकबर ने पुनः प्रस्ताव भेजा-
जयमल लिखे जवाब यूं, सुनिए अकबर शाह।
आण फिर गढ़ ऊपरां, पड़ीयो धड़ बादशाह।।
चित्तौड़ की घेराबंदी, जौहर और साका
अकबर ने 23 अक्तूबर, 1567 को चित्तौड़ को घेर लिया और इसे काफिरों के खिलाफ जिहाद घोषित किया (अकबरनामा)। गढ़ की जिम्मेदारी जयमल को 8,000 घुड़सवारों और कुछ बंदूकधारियों के साथ दी गई थी। उनके साथ पत्ता चूड़ावत और दुर्गा सिसोदिया भी मोर्चे पर थे। चार महीने चले इस युद्ध में मेवाड़ ने साहसपूर्वक प्रतिरोध किया। जब लाखोटा बारी की प्राचीर को अकबर की बारूदी सुरंग से उड़ाया गया, तो रात भर में मेवाड़ी कारीगरों ने उसे पुनः खड़ा कर दिया। बाद में अकबर ने मोहरा मगरी बनवाई और वहां से गोली दाग कर जयमल को घायल किया।

22 फरवरी, 1568 को जयमल के घायल होते ही साके का निर्णय लिया गया। रानी फूलकुंवर के नेतृत्व में 7,000 स्त्रियों ने जौहर किया। 23 फरवरी को प्रथम प्रहर में द्वार खोले गए और राजपूतों ने आखिरी युद्ध लड़ा। जयमल कल्ला राठौड़ के कंधे पर बैठ कर लड़े-जिसे अबुल फजल ने ‘अकबरनामा’ में विष्णु का अवतार कहा है।
चित्तौड़ पर कब्जे के बाद अकबर ने 30,000 हिंदू नागरिकों का नरसंहार करवाया और स्त्रियों-बच्चों को गुलाम बना लिया। बाद में उसने जयमल-पत्ता की मूर्तियां आगरा के किले पर लगवाईं-अपमान या सम्मान, यह बहस का विषय है। अकबर कहता है, ‘हम अपनी शक्ति के अनुसार जिहाद में लगे रहते हैं… काफिरों के कई किलों और नगरों पर अधिकार कर लिया है, वहां इस्लाम की स्थापना की है, मंदिरों को नष्ट किया है।’ (आंद्रे विंक द्वारा उद्धृत)
अकबर ने फतहनामा-ए-चित्तौड़ में लिखा कि-‘जयमल, पत्ता, रावत सांईदास-ये काफिरों में प्रसिद्ध वीर हैं… अल्लाह इन्हें विनाश के घर ले जाए।’ चित्तौड़ की यह विजय मुस्लिम-राजपूत संबंधों में निर्णायक मोड़ बनी, लेकिन महाराणा प्रताप जैसे वीर ने इसे अंतिम नहीं बनने दिया।
अकबर न केवल हिंदू हंता था, बल्कि अय्याश भी था। उसने रानी रूपमती के लिए मालवा-निमाड़ को खून से सींच दिया। और इतिहासकारों ने उसे महान बनाने का पाप किया। वहीं दूसरी ओर सूर्यमल मिश्रा जैसे राजकवि महाराणा प्रताप के लिए लिखते हैं:
जरासंध बहलोल के,
वध में यह व्यतिरेक।
भीम कियौ द्वै भुजन तें,
पातल ने कर एक।।
अर्थात्, जरासंध को भीम ने दोनों हाथों से मारा, लेकिन प्रताप ने बहलोल को एक हाथ से।
उसी पराक्रमी भारत को सांस्कृतिक जबकि सैन्य रूप से नीचा दिखाने की जो प्रवृत्ति को अंग्रेज और मुस्लिम इतिहासकारों ने विगत 150 वर्ष में चलाई, उसी के कारण आज हमें अपने गौरव बिंदुओं पर गर्व करने के लिए ‘सत्य’ को उद्घाटित करना पड़ रहा है।
















