N. Korea का तानाशाह न परमाणु हथियार बनाना बंद करेगा, न कोई संधि मानेगा; Kim की रूस के साथ बढ़ती निकटता के मायने क्या?
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N. Korea का तानाशाह न परमाणु हथियार बनाना बंद करेगा, न कोई संधि मानेगा; Kim की रूस के साथ बढ़ती निकटता के मायने क्या?

अमेरिका और उसके सहयोगियों को अब 'जोखिम कम करने' और 'संघर्ष को टालने' की रणनीति अपनानी होगी, बजाय किम से पूरी तरह निरस्त्रीकरण पर राजी होने के

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Jul 29, 2025, 02:55 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
उ. कोरिया का तानाशाह किम

उ. कोरिया का तानाशाह किम

उत्तर कोरिया ने हाल ही में अमेरिका की परमाणु निरस्त्रीकरण वार्ता की पेशकश को ठुकरा दिया है और साफ कर दिया है कि वह अपने परमाणु अस्त्रों को किसी कीमत पर छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। उत्तर कोरिया के बेलगाम तानाशाह किम का यह रुख न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौती है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करने वाला है। इधर रूस के साथ उसकी बढ़ती रणनीतिक निकटता भी भू राजनीति में एक अलग ही आयाम जोड़ रही है, विशेषरूप से तब जब यूक्रेन के साथ उसका युद्ध परमाणु हमले के खतरे को रोज बढ़ा रहा है।

उत्तर कोरिया ने 2006 से अब तक कई परमाणु परीक्षण किए हैं और अनुमान है कि उसके पास 50 से अधिक परमाणु हथियार हैं। तानाशाह किम जोंग-उन की सरकार इसे “राष्ट्रीय सुरक्षा की गारंटी” मानती है और इसे छोड़ना “राजनीतिक आत्महत्या” करने जैसा बताती है। हाल ही में किम की बहन किम यो-जोंग ने कहा कि अमेरिका को ‘बदली हुई हकीकत को स्वीकार करना चाहिए’ और उत्तर कोरिया को एक परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता देनी चाहिए।

रूस और उत्तर कोरिया ने 2024 में एक सामरिक रक्षा संधि पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें एक-दूसरे को युद्ध की स्थिति में सैन्य सहायता देने का वादा किया गया है। सब जानते हैं, उत्तर कोरिया ने रूस को यूक्रेन युद्ध में समर्थन देने के लिए सैनिक और हथियार भेजे हैं। मोटे तौर पर अनुमान है कि 13,000 से अधिक उत्तर कोरियाई सैनिक रूस के कुरस्क क्षेत्र में अब भी तैनात हैं। इसके बदले में, रूस उत्तर कोरिया को तकनीकी सहायता, ऊर्जा संसाधन और आर्थिक सहयोग प्रदान कर रहा है।

13,000 से अधिक उत्तर कोरियाई सैनिक रूस के कुरस्क क्षेत्र में अब भी तैनात हैं (File Photo)

उधर अमेरिका और उसके सहयोगी उत्तर कोरिया की परमाणु क्षमता को एक गंभीर खतरा मानते आ रहे हैं और इस स्थिति का कोई उचित प्रबंध किए जाने की आवश्यकता पर जोर देते आ रहे हैं। इधर इस खतरे को देखते हुए दक्षिण कोरिया और जापान ने अपनी रक्षा रणनीतियों को मजबूत किया है और अमेरिका के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास बढ़ाए हैं।

हालांकि उत्तर कोरिया की रूस से निकटता ने इस संदर्भ में चीन की भूमिका को भी कमजोर किया है, जिससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव आ रहा है। किम को 2019 के हनोई शिखर सम्मेलन में अमेरिका से अपेक्षित प्रतिबंधों में राहत नहीं मिली थी, जिससे वह तानाशाह वार्ता प्रक्रिया से निराश हुआ था और गुस्से से लाल पीला भी। अब वह केवल ‘आंशिक निरस्त्रीकरण’ के बदले में व्यापक रियायतें चाहता है, जैसे कि प्रतिबंधों में छूट, आर्थिक सहायता और सैन्य अभ्यासों का खत्म होना। रूस के साथ गठबंधन ने उसे एक वैकल्पिक उम्मीदें तो बंधाई ही हैं, जिससे उसकी अमेरिका पर निर्भरता कम हो गई है।

उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु अस्त्रों को ‘किसी भी बदलाव से परे’ घोषित कर दिया है और अब वह कर सकता है तो बस ‘हथियार नियंत्रण’ वार्ता। अमेरिका और उसके सहयोगियों को अब ‘जोखिम कम करने’ और ‘संघर्ष को टालने’ की रणनीति अपनानी होगी, बजाय किम से पूरी तरह निरस्त्रीकरण पर राजी होने के। कारण? रूस-उत्तर कोरिया गठबंधन एक नया ध्रुव बनाता दिख रहा है, जो आगे चलकर पश्चिमी देशों की रणनीतिक चुनौती दे सकता है।

कहना न होगा, उत्तर कोरिया का परमाणु निरस्त्रीकरण से इनकार और रूस से उसकी बढ़ती निकटता एक नई वैश्विक चुनौती है। किम जोंग-उन की रणनीति स्पष्ट है—परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता प्राप्त करो और पश्चिमी दबाव से मुक्त रहो। यह स्थिति न केवल कोरियाई प्रायद्वीप बल्कि पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एक संतुलित, व्यावहारिक और दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। लेकिन वह क्या होगी, उसका खुलासा तो वक्त के साथ ही होने की संभावना है।

Topics: Kim Jong unNuclear Weaponsउत्तर कोरियारूसअमेरिकाNorth Koreaपरमाणु हथियारAmericarussia
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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