गाजा पर आवाज उठाने वाले बांग्लादेश के हिंदुओं पर मौन क्यों? तस्लीमा नसरीन ने पूछे तीखे सवाल
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गाजा पर आवाज उठाने वाले बांग्लादेश के हिंदुओं पर मौन क्यों? तस्लीमा नसरीन ने पूछे तीखे सवाल

तस्लीमा नसरीन ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार के खिलाफ प्रगतिशीलों की चुप्पी पर सवाल उठाए। जानें क्यों गाजा पर बोलने वाले बांग्लादेश के हिंदुओं की पीड़ा पर मौन हैं।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jul 29, 2025, 02:40 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
तस्लीमा नसरीन (फोटो साभार: द हिन्दू)

तस्लीमा नसरीन (फोटो साभार: द हिन्दू)

बांग्लादेश में वर्तमान में जो कुछ भी चल रहा है या फिर कहें सीरिया या अन्य कट्टर मुस्लिम देशों में अल्पसंख्यकों के साथ जो भी हो रहा है, उससे यह अनुमान लगाने में कोई भी समस्या नहीं होनी चाहिए कि अतीत में इस्लाम में मतांतरण कैसे हुआ होगा? जिस प्रकार से सुनियोजित हिंसा अल्पसंख्यकों के खिलाफ की जा रही है, वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि कैसे पूर्व में कट्टरपंथियों ने इस्लाम में मतांतरण करवाया होगा। बांग्लादेशी हिन्दुओं पर कैसा अत्याचार हो रहा है।

बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने बांग्लादेश में हिंदुओं की दुर्दशा पर एक पोस्ट लिखा है। एक्स पर उन्होंने लिखा कि जिस भूमि को हम आज बांग्लादेश कहते हैं, वह एक समय में हिंदुओं का निवास हुआ करता था। मगर मुस्लिमों के आगमन के बाद इतिहास बदल गया। वे लिखती हैं कि “समय के साथ, कई निचली जातियों के हिंदू, जो अक्सर हाशिए पर और उत्पीड़ित थे, इस्लाम मजहब अपना चुके थे। आज, उन मतांतरित लोगों के वंशज आबादी का विशाल बहुमत हैं। और मूल निवासी—हिंदू—अपनी ही धरती पर उत्पीड़ित अल्पसंख्यक बन गए हैं।“

अपने घरों को छोड़कर भाग रहे हिन्दू

उसके बाद उन्होंने लिखा कि विभाजन के बाद से ही बांग्लादेश में हिन्दू अपने पुश्तैनी मकानों को छोड़कर भाग रहे हैं, अपनी जड़ों को छोड़कर भाग रहे हैं और वे अपने लगभग कंगाल होकर ही यहाँ से भारत या उन देशों मे जा रहा है, जहां पर उन्हें सुरक्षा मिल सके। केवल हिन्दू होने से ही उनके साथ जो अत्याचार होता है, उसकी कोई तुलना नहीं है। वे लिखती हैं कि मतांतरण से पहले उनके पूर्वज भी सरकार अर्थात कायस्थ हुआ करते थे। फिर वे लिखती हैं कि “मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि उन्होंने कन्वर्जन क्यों किया। कुछ लोग कहते हैं कि यह सूफ़ियों की करुणा थी। कुछ लोग ब्राह्मणों की क्रूरता का ज़िक्र करते हैं, या उन मुसलमानों की प्रशंसा का जिन्होंने जंगल काटकर घर बनाए। इतिहास जटिल है। कन्वर्जन कई कारणों से हुए।“

तलवारों के दम पर हिन्दुओं का कन्वर्जन

इसके बाद उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ हो रहे उत्पीड़न और अत्याचारों के विषय में लिखा है। इतिहास में यह स्पष्ट दर्ज है कि कैसे तलवारों के दम पर हिंदुओं को मुसलमान बनाया गया, कुतुबउद्दीन एबक से लेकर औरंगजेब तक और उसके बाद भी पाकिस्तान और कालांतर में बांग्लादेश निर्माण के बाद भी हिंदुओं को सुनियोजित रूप से शिकार बनाया गया, यह सब दस्तावेज़ों में दर्ज है, और आज बांग्लादेश सहित कई कट्टरपंथी मुल्कों में हम इसे होते देख रहे हैं।

बांग्लादेश में तेजी से घट रही हिन्दू आबादी

उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं की तेजी से घटती हुई आबादी के विषय में लिखा है। “बांग्लादेश में हिंदू आबादी तेज़ी से घट रही है। मौजूदा इस्लामवादी झुकाव वाली कार्यवाहक सरकार ने हिंदुओं पर अत्याचार रोकने के लिए कुछ नहीं किया है। इसके बजाय, उसने हिंदू नेता चिन्मय कृष्ण दास को अनुचित आरोपों में गिरफ़्तार कर लिया है, जबकि हिंदुओं के घरों, दुकानों और मंदिरों पर हमला करने वाली जिहादी भीड़ पर आँखें मूंद ली हैं।“

कथित प्रगतिशील आवाजें मौन क्यों? 

अब जब तस्लीमा यह सब लिख रही हैं तो इससे यह साफ समझ में आ जाना चाहिए कि जब जनसंख्या में परिवर्तन होता है या फिर जैसे ही हिंदुओं की जनसंख्या कम होने लगती है, तो हिंदुओं पर संस्थागत अत्याचार होते हैं। तस्लीमा ने यह प्रश्न उठाए हैं कि भारत में कथित प्रगतिशील आवाजें शांत क्यों हैं? वे इस्लामिक आतंकवाद, जिहादी हिंसा और उन भेदभाव वाले कानूनों का विरोध क्यों नहीं करती हैं, जो मुस्लिम महिलाओं का उत्पीड़न करते हैं।

उन्होंने लिखा कि वे समानता पर आधारित समान नागरिक संहिता लागू करने का भी विरोध करते हैं। इसलिए, जब बांग्लादेश में हिंदुओं की पीड़ा की बात आती है, तो वे कुछ नहीं कहते। इस चुप्पी को हिंदू राष्ट्रवादियों ने भर दिया है। यही धर्मनिरपेक्ष आवाज़ें दूर गाजा के लिए तो रोती हैं, लेकिन पड़ोस के हिंदुओं के लिए नहीं। इस पाखंड ने मुझे बहुत निराश किया है।

फिर भी, हम – बांग्लादेश के धर्मनिरपेक्ष स्वतंत्र विचारक – अपनी आवाज़ उठा सकते हैं। हम धर्म को राज्य से अलग करने की माँग कर सकते हैं। हम एक समान नागरिक संहिता की माँग कर सकते हैं जो सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करे, चाहे उनका धर्म या लिंग कुछ भी हो।“ इस्लाम में मतांतरण को लेकर मजहबी कट्टरता की कहानियाँ सामने लाई जानी चाहिए। जैसे कि राजतरंगिनी में पंडित जोनराज ने लिखा है-

मरुद्भिरिव वृक्षाणाम शालिनाम शलभैरिव।

कश्मीर देशाचाराणाम ध्वंसोऽथ यवनैः कृतः।

अर्थात जैसे तूफान पेड़ों को उखाड़ देता है और जैसे टिड्डियां चावल की फसल को नष्ट कर देती हैं, वैसे ही यवन मुसलमानों ने कश्मीर के जीवन को तबाह कर दिया।

हालांकि, उन्होनें कश्मीर में निरंतर हुए जीनोसाइड पर लिखा है। ऐसे तमाम साहित्य आज सामने लाए जाने की आवश्यकता है जिससे यह सामने आ सके कि आखिर मजहबी हिंसा का मूल क्या था और क्यों लगातार ही गैर मुस्लिम उस हिंसा का शिकार होते रहे हैं और अभी तक हो रहे हैं?

Topics: तस्लीमा नसरीनगांजाHindu Atrocitiesकट्टरपंथी हिंसाहिंदू अत्याचारप्रगतिशील चुप्पीprogressive silenceBangladeshradical violenceTaslima NasreenGazaबांग्लादेश
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