नागपंचमी: द्वापरयुगीन सर्पयज्ञ स्थली देवकली, जहां की मिट्टी रखने से घर में नहीं आते सर्प
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नागपंचमी: द्वापरयुगीन सर्पयज्ञ स्थली देवकली, जहां की मिट्टी रखने से घर में नहीं आते सर्प

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर में स्थित देवकली तीर्थ, महाभारत कालीन राजा जनमेजय की सर्प यज्ञ स्थली के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ की मिट्टी सर्प भय से मुक्ति दिलाती है। सूर्य उपासना, देवेश्वर शिव मंदिर, और गुप्तकालीन पुरातात्विक महत्व के साथ यह तीर्थ नाग पंचमी पर विशेष अनुष्ठानों का केंद्र है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Jul 29, 2025, 01:37 pm IST
inविश्लेषण
Nag Panchmi

प्रतीकात्मक तस्वीर

उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े जिले लखीमपुर में एक जगह ऐसी भी है, जिसके बारे में मान्यता है कि यहां की मिट्टी घर में रखने से सर्पों का कोई भय नहीं रहता। जिला मुख्यालय लखीमपुर से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित यह स्थल  देवकली तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। इस पौराणिक तीर्थ को महाभारत कालीन राजा जनमेजय की नाग यज्ञ स्थली के रूप में जाना जाता है। किवदंती है कि इस पुरातन तीर्थ पर द्वापर युग में राजा परीक्षित के पुत्र राजा जनमेजय ने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए नाग यज्ञ का आयोजन किया था।

सर्प यज्ञ से जुड़ी पौराणिक घटना

शास्त्रीय कथानक के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद महराज युधिष्ठिर अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र परीक्षित ( जिन्हें योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में पुनर्जीवन दिया था) को राज सौंपकर हिमालय की ओर प्रस्थान कर गये थे। कथा कहती है कि एक दिन शिकार के दौरान भूखे-प्यासे महराज परीक्षित राह भटककर श्रंगी ऋषि के आश्रम में जा पहुंचे। प्यास से व्याकुल राजा ने ऋषि को पुकार कर जल माँगा; किन्तु समाधि में लीन ऋषि की ओर से कोई प्रतिक्रिया न मिली।

इस पर क्रोध से आग बबूला हुए राजा ने एक मृत सर्प श्रंगी ऋषि के गले में डाल दिया। उसी समय श्रंगी ऋषि के पुत्र ऋषि समीक वहां आ पहुंचे। महातपस्वी पिता के इतने घोर अपमान से उनका तन मन क्रोध से जल उठा और उन्होंने राजा परीक्षित को सात दिन बाद सर्पदंश से मृत्यु का शाप दे दिया। समीक ऋषि के श्राप से सातवें दिन तक्षक नाग के डसने से राजा परीक्षित की मृत्यु हो गयी। तब पिता की मौत का बदला लेने के लिए राजा जनमेजय ने यहाँ एक विशाल सर्प यज्ञ किया था। जिसे अंततः महादेव की कृपा से आस्तीक मुनि ने भारी प्रयास के बाद रुकवाया था।

 तीर्थ के ऊंचे टीलों में सांपों की सैकड़ों बांबियां

तीर्थ पुरोहित के अनुसार, इस तीर्थ में मौजूद सर्पकुंड और कुंड की गहराई में मिलने वाली हवन की भस्म और अवशेष इस पौराणिक घटनाक्रम की पुष्टि करते प्रतीत होते हैं। यहां ऊंचे टीलों में सांपों की सैकड़ों बांबियां हैं जिनमें विभिन्न प्रजातियों के सांप रहते हैं। यह तीर्थ नागपूजा और काल सर्प योग निवारण की तंत्र साधना का भी प्रमुख केंद्र है। नाग पंचमी के दिन लोग इस सर्पकुंड की मिट्टी अपने घरों में लेकर जाते हैं। मान्यता है कि इससे उन्हें नागों और सर्पों से अकाल मृत्यु का डर नहीं रहता है।

राजा देवक ने बनवाया था देवेश्वर शिव मंदिर

इस तीर्थ से जुड़ी एक अन्य किवदंती के अनुसार कलयुग के प्रारंभ में देवक नाम के एक राजा की पुत्री देवकली ने यहीं घोर तपस्या की थी। उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम देवकली पड़ा। राजा देवक ने ही यहां पर देवेश्वर शिव मंदिर की स्थापना की थी। मंदिर परिसर में स्थापित एक खंडित शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि मुगलों ने इसे नष्ट करने की पूरी कोशिश की थी लेकिन वह इसे सिर्फ खंडित ही कर पाये। ज्ञात हो कि इस तीर्थ के देवेश्वर नाथ महादेव मंदिर के प्रति शिवभक्तों की गहरी आस्था है। उत्तर प्रदेश की छोटी काशी के नाम से विख्यात गोला गोकर्णनाथ नाथ में जलाभिषेक को जाने वाले कांवड़िए पहले इस मंदिर में महादेव का जलाभिषेक करते हैं। इसीलिए पूरे सावन माह यहां हर-हर महादेव के जयघोष गूंजते रहते हैं।

सूर्य उपासना का भी प्रमुख केंद्र

यह पौराणिक देवकली तीर्थ सूर्य उपासना का भी प्रमुख केंद्र माना जाता है। देवेश्वरनाथ शिव मंदिर के ठीक सामने स्थित 70 मीटर लंबा और 60 मीटर चौड़ा सरोवर सूर्यकुंड के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें उत्तर की ओर पक्की सीढ़ियां बनी हुई हैं। महिलाओं के स्नान के लिए अलग स्नान घाट बना है। यह सूर्यकुंड यह प्रमाणित करता है कि यह स्थान किसी काल में सूर्य उपासना का प्रमुख केंद्र रहा होगा।

गुप्तकाल में समृद्ध और विकसित बस्ती थी यहाँ

क्षेत्र के प्रसिद्ध युवराज दत्त महाविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. माणिक लाल गुप्ता का कहना है कि मंदिर तीर्थ और आसपास क्षेत्र की खुदाई के दौरान पत्थर की दर्जनों प्राचीन मूर्तियां मिली थीं जिनकी निर्माण शैली गुप्तकालीन है। इससे यह साबित होता है कि यहां गुप्तकाल में समृद्ध और विकसित बस्ती थी। इस उत्खनन में अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल का एक सिक्का भी प्राप्त हुआ है। बताते चलें कि वर्तमान समय में इस पुरातन तीर्थ पर वेद, पुराण, रामायण, संस्कृत के लिए पठन-पाठन के लिए एक संस्कृत विद्यापीठ भी संचालित है।

नाग पंचमी पर लगता है बड़ा मेला, जुटते हैं सपेरे

नाग पंचमी के दिन देवकली में सपेरों का बड़ा मेला लगता है। जिनकी कुंडली में कालसर्प योग होता है वे यहां विशेष अनुष्ठान कराते हैं। नाग पंचमी के दिन यहां काल सर्प योग के निदान के लिए बड़ी संख्या में लोग आते हैं। इसके अलावा प्राचीन देवेश्वर नाथ शिवलिंग का जलाभिषेक करने और नाग पूजा के लिए भी दूर-दूर से श्रद्धालु यहां आते हैं।

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के अपने स्वयं के विचार हैं। आवश्यक नहीं कि पाञ्चजन्य उनसे सहमत हो)

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