ओडिशा/भुवनेश्वर । भारत के सुशासन मॉडल में तेजी से उभरते ओडिशा की नई भूमिका पर केंद्रित ‘पाञ्चजन्य’ द्वारा आयोजित सुशासन संवाद : ‘ओडिशा की उड़ान’ का भव्य आयोजन आज ताज विवांता, भुवनेश्वर में संपन्न हुआ। कार्यक्रम के तृतीय सत्र “नई दिशाएं” में पाञ्चजन्य की कंसल्टिंग एडिटर तृप्ति श्रीवास्तव ने असम मूल के उद्योगपति और सामाजिक नवप्रवर्तक अंबर अग्रवाल से विशेष संवाद किया।
शिक्षा में अभिनव पहल : Lab in a Box
अंबर अग्रवाल ने शिक्षा के क्षेत्र में अपने उल्लेखनीय कार्यों और बांस (बेंबू) के माध्यम से पर्यावरण-अनुकूल विकास की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को विस्तार से साझा किया।
उन्होंने बताया कि वह MSME सेक्टर में एक सक्रिय उद्यमी भी हैं और हाल ही में ‘Lab in a Box’ नामक अभिनव प्रोजेक्ट लॉन्च किया है, जिसमें 70 से अधिक प्रयोग शामिल हैं। इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के विद्यार्थियों को सरल व व्यवहारिक ढंग से विज्ञान की शिक्षा उपलब्ध कराना है।
उन्होंने कहा- “जो प्रयोगशालाएं लाखों रुपए में बनती हैं, वही अनुभव अब इस बॉक्स के माध्यम से गांव-गांव, स्कूल-स्कूल तक बहुत कम लागत पर पहुंचाया जा सकता है।”
उन्होंने यह भी बताया कि इस तकनीक को नॉर्थ-ईस्टर्न राज्यों में अपनाया जा चुका है और सरकार इसकी सराहना कर रही है।
बांस : पर्यावरण-अनुकूल विकास का आधार
पर्यावरण और स्थानीय संसाधनों पर आधारित उद्योगों की चर्चा के दौरान अंबर अग्रवाल ने बांस के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह मात्र एक पौधा नहीं, बल्कि बहुपयोगी संसाधन है।
उन्होंने बताया- “बांस तीन वर्षों में परिपक्व हो जाता है और 70 वर्षों तक उत्पादक रह सकता है। मोदी सरकार ने 2016 में इसे वन की परिभाषा से हटाकर ग्रास कैटेगरी में रखा, जिससे इसके व्यापारिक उपयोग का मार्ग प्रशस्त हुआ”
बांस से बने अभिनव उत्पाद
अंबर अग्रवाल ने बताया की उनकी असम स्थित फैक्ट्री में बांस से अगरबत्ती, फाइबर बोर्ड, दरवाजों की चौखट, फर्नीचर, कपड़े, टॉवेल, चप्पल, टाइलें और अन्य टिकाऊ उत्पाद बनाए जा रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने उल्लेख किया कि नवनिर्मित संसद भवन में भी बांस आधारित फर्श और पैनलिंग का उपयोग हुआ है।
तकनीकी बाधाएं और नई संभावनाएं
भारत में अब तक इस संसाधन का समुचित उपयोग न होने के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि तकनीकी ज्ञान के अभाव और पुरानी नीतियों के कारण बांस की वास्तविक क्षमता का दोहन नहीं हो पाया। लेकिन अब आधुनिक तकनीक ने सिद्ध कर दिया है कि बांस 50 वर्ष से अधिक टिकाऊ होता है और इसका कोई भी हिस्सा वेस्ट नहीं होता।
उड़ीसा में बांस उद्योग की संभावनाएं
उड़ीसा जैसे राज्यों में बांस आधारित उद्योगों की संभावनाओं पर विश्वास व्यक्त करते हुए अंबर अग्रवाल ने कहा- “बांस की खेती किसानों के लिए बड़े फायदे का सौदा है। क्योंकि यह बेहद कम लागत में तैयार होता है, इसे बार-बार बोने की आवश्यकता नहीं होती और इसे स्थानीय स्तर पर ही प्रोसेस किया जा सकता है”
उन्होंने यह भी कहा कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे-छोटे यूनिट्स स्थापित कर किसानों को प्रशिक्षित किया जाए तो बांस भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकता है। इस दिशा में उन्होंने सरकार से नीति स्तर पर सहयोग, ट्रेनिंग, मशीनरी और मार्केटिंग में सहायता प्रदान करने की अपेक्षा जताई।
युवाओं और किसानों के लिए आह्वान
अंत में अंबर अग्रवाल ने युवाओं और किसानों को इस क्षेत्र में आगे आने का आह्वान करते हुए कहा- “अगर कोई युवा या किसान इस क्षेत्र में काम करना चाहता है, तो मैं अपनी ओर से हर संभव मदद करूंगा। मेरा उद्देश्य यही है कि कम लागत में अधिकतम लाभ मिले और बांस आधारित उद्योग आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करें”
















