जापान की राजधानी तोक्यो में 7वीं अंतरराष्ट्रीय कॉयर प्रतियोगिता चल रही है। इसमें चीन भी भाग ले रहा है तो ताइवान भी। पिछले छह साल से आयोजित हो रही इस प्रतियोगिता का आयोजन करने वालों को इस सातवीं बार चीन ने अपनी थानेदारी के प्रभाव में ले लिया और प्रतियोगिता में एक स्वतंत्र देश के नाते शामिल ताइवान का झंडा ही नहीं बदलने को मजबूर किया बल्कि उस देश का नाम भी बदलवा दिया। यानी कम्युनिस्ट विस्तारवादी चीन ने उस मंच को ताइवान से अपने विवाद का अखाड़ा बना दिया। इसने चीन की ताइवान को लेकर दिखाई जा रही मंशाओं और दादागिरी को एक बार फिर से उजागर कर दिया है। इस विवाद ने एक सांस्कृतिक आयोजन से आगे जाते हुए अंतरराष्ट्रीय मंच पर ताइवान की पहचान और चीन के दबाव की राजनीति को सामने रखा है।
दरअसल, इस प्रतियोगिता में ताइवान की छह टीमों ने भाग लिया था, जिनमें स्कूली बच्चों से लेकर वयस्क कलाकार तक शामिल थे। आयोजकों ने पहले ताइवान के असल नाम और झंडे को ही मान्यता दी थीं पिछले छह वर्ष से ऐसा ही होता आया है। लेकिन इस बार जाने क्यों, चीन ने इस मुद्दे पर उन्हें घेर लिया और उन पर ऐसा दबाव बनया कि प्रतियोगिता में फिर ताइवान का नाम ही बदल दिया गया, झंडा भी कुछ और दिखाया जाने लगा। ताइवान को वहां नाम दिया गया “चाइनीज ताइपे” और ताइवान के राष्ट्रीय झंडे को भी हटा दिया।
ताइवान गुस्से से भरना ही था। उसकी ओर से फौरन बयान आ गया कि उसे इस प्रकार का “राजनीतिक हस्तक्षेप” स्वीकार नहीं है। ताइवान ने चीन की धमक में आयोजकों के इस कदम की कड़ी निंदा की। इस पर जापान के सांसद के.जी. फुरुया ने ताइवान का समर्थन किया। इसके बाद प्रतियोगिता के आयोजकों की ओर से अंततः सभी देशों के झंडे हटा दिए गए लेकिन ताइवान का नाम “चाइनीज ताइपे” ही रहने दिया। ताइवान से प्रतियोगिता में आए प्रतिनिधि ली यी यांग ने इस कदम पर पूरी स्पष्टता के साथ कहा, “ताइवान, ताइवान है, चीन नहीं है।” उन्होंने कहा कि यह चीन का “कलात्मक स्वतंत्रता पर हमला” है।

स्वाभाविक रूप से कॉयर प्रतियोगिता एक कला-आधारित आयोजन होती है। इसमें आमतौर पर राजनीतिक दखल नहीं ही रहती। लेकिन तोक्यो में चीन की थानेदारी में जो किया गया उसे देखकर कला जगत भी हतप्रभ और आहत है। जबकि आयोजकों ने मंच से यह स्पष्ट किया था कि यह प्रतियोगिता “राजनीतिक नहीं है”। लेकिन वहां दबी जबान में लोगों ने सवाल उठाया तो फिर देश कर नाम बदल देना और झंडा हटा देना एक राजनीतिक कदम नहीं था, तो फिर क्या था! ताइवान की टीमों ने अपने प्रदर्शन के दौरान जोर जोर से “ताइवान, ताइवान” के नारे लगाकर जता दिया कि वे चीनी दादागिरी के आगे झुकने वाले नहीं हैं। वे अपनी सांस्कृतिक पहचान और आत्मसम्मान की भावना स्पष्ट रूप से व्यक्त कर रहे थे।
जापान और ताइवान के बीच मजबूत जन समर्थन है। 88 प्रतिशत ताइवानी जापान पर भरोसा करते हैं, जबकि 90 प्रतिशत जापानी ताइवान के संदर्भ में चीन के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। तोक्यो की यह घटना चीन की “सॉफ्ट पावर रणनीति” का हिस्सा मानी जा सकती है, जिसमें वह अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में ताइवान की पहचान को सीमित करने का प्रयास करता है। लेकिन इस बार, यह रणनीति उलटी पड़ती दिख रही है। ताइवान को अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति और समर्थन मिल रहा है।
यह विवाद केवल ‘नाम’ और ‘झंडे’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ताइवान की राजनीतिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक पहचान और अंतरराष्ट्रीय स्थिति से जुड़ा है। चीन की रणनीति ताइवान को अलग-थलग करके फर्जी दावे के आधार पर अपने देश में मिला लेने की है। लेकिन वह यह नहीं समझ पा रहा है कि उसके ऐसे कदमों से ताइवान की पहचान और लोकतांत्रिक मूल्यों को और बल मिल रहा है। बेशक, कॉयर प्रतियोगिता के आयोजकों की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या कला को राजनीति से बचाया जा सकता था या क्या वे खुद ही ही इस राजनीति के दबाव में आ गए हैं?
बेशक, इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि ताइवान केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक पहचान है। “ताइवान, ताइवान है” केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक वैश्विक संदेश है, स्वतंत्रता, सम्मान और पहचान का।

















