खेती-किसानी-1 : समर्थ किसान सशक्त देश
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समर्थ किसान, सशक्त देश

स्वतंत्रता के बाद कृषि क्षेत्र में आशातीत प्रगति हुई। आज हम खाद्यान्न आयातक से निर्यातक देश बन गए हैं, पर कुछ ऐसी कमियां रह गई हैं, जिसके कारण कृषि व किसान पर कई संकट भी हैं। इनमें सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे

Written byनरेश सिरोहीनरेश सिरोही
Jul 8, 2025, 03:09 pm IST
inभारत, विश्लेषण
कृषि कार्य में ड्रोन का इस्तेमाल करता एक किसान

कृषि कार्य में ड्रोन का इस्तेमाल करता एक किसान

भारत की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है। कृषि के सर्वाधिक रोजगार देने वाला क्षेत्र होने के साथ-साथ सकल घरेलू उत्पाद में भी इसका योगदान लगभग 16 प्रतिशत है। इसके अलावा, उद्योग एवं सेवाओं के लिए तीन चौथाई श्रमिक आज भी गांवों से आते हैं।

नरेश सिरोही
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भाजपा किसान मोर्चा

स्वतंत्रता के बाद कृषि क्षेत्र में आशातीत प्रगति हुई। इसके कई कारक हैं, जिसमें बुआई व सिंचाई क्षेत्र का विस्तार, चकबंदी सहित भूमि सुधार कानून, उन्नत बीजों, कृषि अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी का विकास, उर्वरकों, कीटनाशकों का उपयोग, न्यूनतम समर्थन मूल्य एवं खरीद आधारित कृषि मूल्य नीति, भंडारण व्यवस्था, विपणन पद्धति में सुधार, पूंजी निवेश एवं ऋ ण व्यवस्था में वृद्धि व सुधार, प्रचार-प्रसार सेवाओं द्वारा किसानों को जानकारी देना, ग्रामीण आधारभूत ढांचा सड़क, बिजली आदि शामिल हैं।

कम नहीं हो रही मुश्किलें

छठे दशक तक हम खाद्यान्न आयातक देश थे पर आज खाद्यान्न निर्यातक बन चुके हैं। हालांकि, इस भारी सफलता के बीच कुछ कमियां रह गई हैं, जिसके कारण कृषि व किसान कई संकटों से गुजर रहा है। राष्ट्रीय आपदा रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, 1995 से 2014 के बीच 2,96,438 किसानों ने खुदकुशी की। हालांकि 2014 के बाद किसानों की आत्महत्या में कमी आई है। नेशनल बैंक ऑफ रूरल एंड एग्रीकल्चर डेवलपमेंट (नाबार्ड) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में किसानों पर बैंकों का 21 लाख करोड़ रुपए कर्ज है। सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद खेती से प्रति किसान परिवार की रोजाना आय 150 रुपए से भी कम है।

नाबार्ड की रिपोर्ट के अनुसार, किसान परिवारों की खेती से औसत कमाई 4,476 रुपए है। 2021-22 में सभी स्रोतों को मिलाकर प्रति किसान परिवार की मासिक आय 13,661 रुपए थी। इसमें से वह 11,710 रुपए खर्च कर देता है। यानी परिवार प्रतिमाह 1,951 रुपए ही बचा पाता है। साथ ही, हरित क्रांति में अपनाई गई कृषि प्रणाली के दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट भाषण की शुरुआत चार ‘शक्तिशाली’ विकास इंजनों से की थी, जिनमें पहला कृषि है। इसलिए कृषि क्षेत्र की विसंगतियों को चिह्नित कर उसे दूर करने के उपाय खोजने की आवश्यकता है।

कृषि क्षेत्र द्वारा उत्पादित वस्तुओं की मूल्य दरें अन्य क्षेत्रों, विशेषकर उद्योग एवं व्यापार क्षेत्र के मुकाबले लगातार पिछड़ रही हैं। कृषि उत्पाद मूल्य आजादी के पहले भी कम थे, आजादी के बाद भी इसमें खास सुधार नहीं हुआ। हर साल कृषि उत्पादों के मूल्य अन्य उत्पादों की तुलना में 82 प्रतिशत से 94 प्रतिशत के बीच रहे हैं। यानी किसान द्वारा बेचे जाने वाले उत्पादों से होने वाली कमाई उसके द्वारा खरीदे जाने वाले उत्पादों से लगातार कम होती चली गई। इसके कारण अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा कृषकों को सालाना औसतन 12 प्रतिशत का घाटा उठाना पड़ा है। इसके कई दुष्परिणाम सामने आए।

पहला, लगभग हर 7 वर्ष में कृषि से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की औसत आय अन्य व्यवसायों की तुलना में आधी होती चली गई। दूसरा, ग्रामीण क्षेत्रों के सभी समुदायों की क्रय-शक्ति में भारी ह्रास हुआ। तीसरा, कृषि आर्थिक रूप से अलाभकारी व्यवसाय होती चली गई, जिससे कृषि क्षेत्र में पूंजी निर्माण की गति घटती गई। इसके विपरीत, उद्योगों और उनके उत्पादों को नाना प्रकार के संरक्षण, प्रोत्साहन एवं सुविधाएं मिलती रहीं।

इसे एक उदाहरण से समझें। 1970 में सोना प्रति तोला(12 ग्राम) 225 रुपए और गेहूं 76 रुपए कुंतल था। यानी किसान 3 कुंतल गेहूं बेच कर 12 ग्राम सोना खरीद सकता था। जबकि आज गेहूं का भाव 2,275 रुपए प्रति कुंतल और 12 ग्राम सोने का भाव लगभग 1.15 लाख रुपए है।

चुनौतियां और भी हैं

एक ओर किसान सरकारों की उदासीनता व नीतियों से तो दूसरी ओर परिस्थितिजन्य समस्याओं, जैसे घटती जोत का आकार, कृषि पर आश्रित आबादी का बढ़ता बोझ, जलवायु परिवर्तन के कारण खेती में बढ़ता जोखिम और प्राकृतिक संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। ऊपर से कृषि भूमि का वितरण भी असमान है। वर्तमान सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में किसान जोतों की संख्या 14.6 करोड़ से अधिक है और 88 प्रतिशत किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है। देश में जोत का औसत आकार 1970-71 में 2.5 हेक्टेयर था, जो 1990-91 में घटकर 1.55 हेक्टेयर, 2016-17 में 1.08 हेक्टेयर और 2021-22 में मात्र 0.74 हेक्टेयर रह गया।

यहां यह बताना ज़रूरी है कि इन आंकड़ों में (एन.एस.एस.ओ.-2011 के अनुसार) एक बड़ा झोल है। वह यह कि 83 प्रतिशत किसान देश की कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 30 प्रतिशत भूमि पर निर्भर हैं, जबकि 23.5 प्रतिशत भूमि 10 प्रतिशत किसानों के पास, 15.5 प्रतिशत भूमि 4 प्रतिशत किसानों और 31 प्रतिशत कृषि भूमि मात्र 3 प्रतिशत किसानों के पास है। इसका मतलब यह हुआ कि आम किसानों की औसत जोत का आकार और भी कम है। वहीं, उत्पादन की दृष्टि से एक किसान परिवार के पास अधिकतम 25 एकड़ और गुजर-बसर की दृष्टि से कम से कम पांच एकड़ जमीन होनी चाहिए। इससे कम जोत अलाभकारी होती है।

1947 में देश की आबादी 36.10 करोड़ थी, जिसमें 77 प्रतिशत यानी 27.80 करोड़ आबादी कृषि पर निर्भर थी। आज देश की आबादी 140 करोड़ से अधिक है, जिसमें लगभग 60 प्रतिशत से अधिक (84 करोड़) लोग खेती पर निर्भर हैं। यानी खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से चार गुना और कृषि पर निर्भरता की दृष्टि से कृषि भूमि पर तीन गुना से अधिक आबादी का भार बढ़ा है।

इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के चलते अतिवृष्टि, अल्पवृष्टि, ओलावृष्टि, बाढ़, आग, तूफान, सूखा, फसल महामारी आदि के कारण जोखिम और नुकसान बढ़ गए हैं। लेकिन किसानों को इससे बचाने या नुकसान की भरपाई के लिए फसल बीमा योजना आज भी ठीक ढंग से लागू नहीं हो सकी है।

Topics: कृषिकृषि पर निर्भरपाञ्चजन्य विशेषकृषि कार्यसमर्थ किसानसशक्त देशषि मूल्य नीतिभंडारण व्यवस्थाविपणन पद्धतिजलवायु परिवर्तन
नरेश सिरोही
नरेश सिरोही
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भाजपा किसान मोर्चा [Read more]
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