प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि केवल “कर्म” नहीं, बल्कि धर्मयुक्त कर्म ही सबसे बड़ा धर्म है। अगर कर्म के साथ धर्म नहीं जुड़ा है, तो वह कर्म अधर्म की ओर ले जा सकता है। शास्त्रों में भी यही कहा गया है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, यही धर्म है। धर्म से रहित कर्म चाहे जितना भी बड़ा क्यों न हो, वह अंततः विनाश का कारण बनता है।
कर्म तो सभी कर रहे हैं – पशु, पक्षी, मनुष्य लेकिन सभी कर्ममय जीवन से उन्नति नहीं पाते। जो व्यक्ति धर्म के मार्ग पर चलकर कर्म करता है, वही जीवन में सच्ची सफलता, शांति और मुक्ति की ओर बढ़ता है। कई बार ऐसा होता है कि एक व्यक्ति पूरी निष्ठा और सच्चाई से धर्मयुक्त कर्म कर रहा होता है, फिर भी उसे बार-बार बाधाओं, असफलताओं और कष्टों का सामना करना पड़ता है। ऐसा क्यों? आज जो तुम खा रहे हो, वह उस फसल का फल है जो तुमने पहले बोई थी। और जो तुम आज बो रहे हो, वह भविष्य में फल देगा। यदि पूर्व में पापकर्म किए हैं, तो उसके फलस्वरूप वर्तमान में धर्म के मार्ग पर चलने के बावजूद कठिनाइयाँ आती हैं। लेकिन इन कठिनाइयों को सहन करते हुए यदि कोई धर्मयुक्त आचरण करता रहे, तो भविष्य में उसका जीवन अवश्य सुधरता है। क्योंकि हमारे परमात्मा के न्याय में कोई पक्षपात नहीं होता। वहाँ कोई निर्णय गलत नहीं होता। जो कर्म किए हैं, उनका फल भोगना ही पड़ेगा।” हम कई बार भगवान को दोष देते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि यदि हम ईमानदारी से अपने ही कर्मों का लेखा-जोखा देखें, तो समझ आएगा कि आज जो दुख भोग रहे हैं, वह हमारे ही कर्मों का परिणाम है। आज आप सुखी हैं, शांति से भोजन कर पा रहे हैं, पानी पी पा रहे हैं, सो पा रहे हैं- यह भी आपके ही पूर्व अच्छे कर्मों का फल है। लेकिन यदि पापकर्म अधिक हैं, तो ईश्वर ऐसा विधान भी कर सकता है कि पानी पीना भी कठिन हो जाए। इसलिए भगवान को दोष देने से पहले हमें अपने कर्मों की गहराई से जांच करनी चाहिए।ध्यान रखें- केवल कर्म नहीं, धर्मयुक्त कर्म ही कल्याणकारी है।

















