केरल में ‘भारत माता’ की तस्वीर और ‘भारत माता की जय’ के उद्घोष को लेकर विवाद बढ़ गया है। इस तस्वीर में ‘भारत माता’ को भगवा झंडा लिए हुए दिखाया गया, जिसे कुछ संगठनों और सत्तारूढ़ वामपंथी दलों (माकपा और भाकपा) ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़कर आपत्ति जताई और इसे संवैधानिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन बताया। वामपंथी दलों का मानना है कि भारत माता की तस्वीर एक विशेष सांस्कृतिक विचारधारा को बढ़ावा देती है, जो केरल की पंथनिरपेक्ष और समावेशी परंपरा के खिलाफ है। दूसरी ओर, भाजपा और राज्यपाल इसे राष्ट्रवाद और देशभक्ति का प्रतीक मानते हैं।
विरोधियों का बौद्धिक दिवालियापन
राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा जारी अधिसूचना में राजभवन में सिर्फ ‘आधिकारिक राष्ट्रीय प्रतीकों’ के प्रदर्शन को उचित माना गया है। इसलिए राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर द्वारा भारत माता की तस्वीर पर पुष्पांजलि को ‘असंवैधानिक’ ठहरा दिया गया। हालांकि, यह दलील न सिर्फ कानून के नजरिए से अनुचित है, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से भी विडंबनापूर्ण है। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि पी.डी.टी. आचार्य जैसे कुछ अनुभवी अधिकारी भी अब उसी पाले में जा बैठे हैं। जब कानून के ज्ञाता किसी राजनीतिक पटकथा को न्यायसंगत ठहराने के लिए न्यायशास्त्र को तोड़-मरोड़ कर पेश करने लगें तो न केवल नागरिक समाज भ्रमित होने लगता है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता की बुनियाद भी चरमराने लगती है।
अफसोस की बात है कि पूरा विवाद ऐसे राज्य में उभरा जो गर्व से अपना परिचय ‘ईश्वर के अपने घर’ के रूप में देता है। आज उसी राज्य की सरकार ‘भारत माता’ के आह्वान पर तूफान मचा रही है, जो देश की सभ्यता और इतिहास में पिरोई मातृ शक्ति की वह भावना है जिसकी जड़ें भारत के स्वतंत्रता संग्राम और आध्यात्मिक चेतना में गहरे पैठी हैं।
भारत माता कोई नया गढ़ा शब्द नहीं है, न ही किसी पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रतीक है। यह आधुनिक राजनीतिक दलों से दशकों पहले रचा गया राष्ट्र प्रतीक है, जो बंकिम चंद्र चटर्जी के ‘वंदे मातरम्’ और अबनींद्रनाथ टैगोर के 1905 में बनाए चित्र में समाहित है। यह मातृभूमि के काव्यात्मक और आध्यात्मिक बिंब के रूप में साकार हुआ। इस शाश्वत छवि को सांप्रदायिक या राजनीतिक विवाद का केंद्र बनाना इतिहास की सबसे प्रेरणामयी आभा को धूमिल करने के समान है, जो कृतघ्नता और बौद्धिक दिवालियेपन को दर्शाता है।
सांस्कृतिक प्रतीकों पर रोक नहीं
ऐसे गौरवशाली सांस्कृतिक प्रतीकों के प्रदर्शन पर कोई संवैधानिक या वैधानिक रोक नहीं है। भारत का राज्य संप्रतीक (अनुचित प्रयोग का निषेध) अधिनियम, 2005 भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों के अनुचित प्रयोग को रोकता है। लेकिन इसमें राष्ट्र की ‘भारत माता’ जैसी काव्यात्मक या प्रतीकात्मक प्रस्तुति पर कोई रोक नहीं है। यह तर्क कि उनकी छवि संवैधानिक नियमों का उल्लंघन कर रही है, कानूनी तौर पर पूरी तरह से आधारहीन है। भारतीय संविधान में निहित पंथनिरपेक्षता का सिद्धांत राज्य को पंथ संबंधी विषय पर तटस्थ रहने और यह सुनिश्चित करने का आदेश देता है कि किसी भी नागरिक के प्रति पांथिक आधार पर भेदभाव न किया जाए। राज्य या राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदाधिकारी पंथनिरपेक्षता के नाम पर राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक सामंजस्य को बढ़ावा देने वाले प्रतीकों के प्रयोग पर विरोध या आपत्ति नहीं जता सकते।
एस.आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार (1994) 3 एससीसी 1 मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि पंथनिरपेक्षता एक सकारात्मक सिद्धांत है, जिसका अर्थ पंथ के प्रति निरपेक्ष या उदासीन रहना नहीं, बल्कि सभी मत-पंथों के प्रति समान भावना रखना है। न्यायालय ने आगे कहा कि ‘भारतीय संदर्भ में पंथ और संस्कृति परस्पर अलग नहीं’ और राज्य को राष्ट्रीय अखंडता की स्थापना करने वाली सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को मान्यता और समर्थन देना चाहिए। इसी तरह, एम. इस्माइल फारुकी बनाम भारत सरकार (1994) 6 एससीसी 360 में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारत में पंथनिरपेक्षता के लिए राज्य को पंथ का विरोध करने या राष्ट्र की प्राचीन पहचान को मिटाने का अधिकार नहीं है।
वास्तव में न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि सांस्कृतिक विरासत पंथनिरपेक्षता का अभिन्न है और राज्य को भारतीय परंपरा में बुनी पहचान में निहित प्रतीकों और प्रथाओं को मान्यता देनी चाहिए। इसके अलावा, बिजाॅय इमैनुएल बनाम केरल राज्य, (1986) 3 एससीसी 615 में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि नागरिकों को अपने विवेक के आधार पर राष्ट्र के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का अधिकार है, जिससे इस विचार को बल मिलता है कि देश के प्रति भक्ति की अभिव्यक्ति किसी एक राज्य या राज्य-निर्धारित प्रारूप के अधीन नहीं है। अत: ‘भारत माता’ मान्यताओं या पंथों के दायरे से परे एक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है जो देशवासियों की भावनात्मक और आध्यात्मिक एकता का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए ‘भारत माता’ के प्रति राज्यपाल की श्रद्धांजलि पंथनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का वैध उदाहरण है जो बांटता नहीं, जोड़ता है।
संवैधानिक शिष्टाचार का उल्लंघन
न्यायमूर्ति रामा जाॅयस का एक मशहूर कथन है, ‘‘भारत में पंथनिरपेक्षता, जिसमें सभी के साथ समान व्यवहार की बात कही गई है, राजधर्म का हिस्सा थी जो हमारा प्राचीन संवैधानिक कानून था।’’ मनुस्मृति (X-311) का एक उद्धरण है, ‘जिस तरह धरती माता सभी जीवों का समान रूप से पालन-पोषण करती है, उसी तरह एक राजा (राज्य) को बिना किसी भेदभाव के सभी का ध्यान रखना चाहिए।’ नारद स्मृति (धर्मकोश) में बताया गया है, ‘राजा को वेदों पर विश्वास करने वालों के साथ-साथ नास्तिकों और अन्य लोगों की सुरक्षा उसी प्रकार करनी चाहिए जिस प्रकार वह अपने किले और क्षेत्र की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होता है।’ यह उद्धहरण साबित करता है कि भारतीय पंथनिरपेक्षता की समावेशी बहुलता की जड़ें संस्कृति और न्याय में गहरे समाई हुई हैं। फिर भी, विडंबना यह है कि वर्तमान समय में जो धर्म का पालन करते हैं, उन्हें अक्सर सांप्रदायिक ठहरा दिया जाता है।
संविधान के अनुच्छेद 163 के तहत राज्यपाल केवल कार्यकारी निर्णयों के संबंध में मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य हैं। समारोह और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति, जैसे पुष्पांजलि आदि इस अनुच्छेद में शामिल नहीं हैं। ऐसे मामलों में भी राज्यपाल से नियमों के अधीन व्यवहार करने की अपेक्षा रखने का अर्थ यह है कि लोगों में उनके कार्यालय और इसकी संवैधानिक स्वतंत्रता संबंधी बुनियादी ज्ञान का अभाव है। यहां वास्तविक खतरा है राष्ट्रीय एकता के प्रतीकों का राजनीतिकरण।
केरल में राज्यपाल के कार्यक्रम के दौरान मंत्रियों का सभागार से बाहर चले जाना, वह भी किसी नीतिगत असहमति पर नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक श्रद्धा निवेदन पर, संवैधानिक शिष्टाचार के गंभीर उल्लंघन को दर्शाता है। अनुच्छेद 153 के अनुसार राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है। मंत्रिगण, अनुसूची III के तहत अपनी शपथ के आधार पर, बिना किसी भय या पक्षपात के संविधान के प्रति निष्ठा बनाए रखने के लिए बाध्य हैं। कार्यक्रम के दौरान उनका बाहर निकल जाना संविधान संबंधी उनके कर्तव्य से विमुख होना दर्शाता है और संवैधानिक शासन के प्रति जनता के विश्वास को आहत करता है।
राज्यपाल से राज्यों का टकराव
केंद्रीय प्रतिनिधियों के प्रति ऐसा वैर कोई नई बात नहीं है। केरल में राज्यपाल और वामपंथी सरकार के बीच पहले भी कई मुद्दों पर विवाद रहा है, जैसे विधेयकों की मंजूरी और विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में राज्यपाल की भूमिका। तमिलनाडु में तो राज्यपालों को अपने कार्यों में अक्सर व्यवधानों का सामना करना पड़ा है। वहीं, पश्चिम बंगाल में राज्य कार्यकारिणी के साथ टकराव आम बात हो चुकी है। यह दृश्य किसी स्वस्थ संघवाद का संकेत नहीं, बल्कि संवैधानिक भाषा की आड़ में राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति की जा रही पक्षपातपूर्ण अवहेलना है।
चिंता की बात यह है कि ऐसा राजनीतिकरण एक खतरनाक प्रतिरोधी वातावरण को बढ़ावा देता है। जो लोग भारत माता का सम्मान करते हैं, उन्हें ‘भगवा’ कहा जाता है और जो विरोध करते हैं उन्हें ‘प्रगतिशील’ के रूप में पेश किया जाता है। ऐसी पटकथाएं छात्रों और युवाओं को गुमराह कर उन्हें देशभक्ति की भ्रामक परिभाषा पढ़ाने लगती हैं, जिससे वे और उलझ जाते हैं। यह कार्य न केवल नागरिकों की परस्पर एकता पर घात लगाता है, बल्कि राष्ट्रीय पहचान संबंधी भावनात्मक और आध्यात्मिक जुड़ाव के लिए भी ग्रहण बन जाता है।
राज्यपाल का रुख न केवल संवैधानिक रूप से सही है, बल्कि इतिहास और संस्कृति के साथ स्पष्टता से जुड़ा है। संसद में लोकसभा को विविध विचारों और आदर्शों के स्वतंत्र प्रवाह का मंच माना जाता है, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना अनुचित है।
राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को स्पष्टता से याद दिलाया कि जब 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया तो राष्ट्रभाव ‘भारत माता’ या ‘भारतंबा’ के रूप में देशवासियों के हृदय में अंकित हो गया।
‘भारत माता’ का विचार स्वतंत्रता के पहले अवतरित हुआ और भारतीयों की सामूहिक चेतना में शाश्वत रूप से बस गया। बहस राज्यपाल द्वारा किए गए पुष्पार्चन पर नहीं, बल्कि इस सवाल पर होनी चाहिए कि संवैधानिक प्राधिकारी भारत माता पर पुष्प क्यों नहीं अर्पित कर सकते? हमारे वर्तमान संविधान में भारतीय परंपरागत मूल्यों का समावेश है या यह एक कठोर, उधार लिया गया सिद्धांत है जो हमारी सांस्कृतिक आत्माभिव्यक्ति पर चोट कर रहा है?
यही सही समय है, जब हमें पंथनिरपेक्षता के इस आयातित, वेटिकन/यूरोपीय मॉडल का बहिष्कार करना होगा जो राष्ट्रीय एकता के स्वदेशी प्रतीकों को अनुचित ठहराना चाहता है। अगर भारत को अपनी स्वर्णिम विरासत और राष्ट्रीय गौरव को पूर्णरूपेण प्राप्त करना है, तो इन बौद्धिक बाधाओं का दृढ़ता से निवारण करना होगा।
ध्यान देने वाली बात है कि कभी ऐसे ही बौद्धिक वर्ग ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान के रूप में अपनाने का विरोध किया था। तब एक छोटे से वर्ग को तुष्ट करने के लिए बंकिम चंद्र की मूल कविता का केवल एक छोटा सा अंश ही अपनाया गया। राष्ट्रीय प्रतीकों को तुष्टीकरण केंद्रित राजनीति के तहत धूमिल करना विविधता में अखंडता के प्रतीक हमारे राष्ट्रवाद की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है। हमें याद रखना है कि ‘भारत माता’ कोई धार्मिक छवि नहीं, वह हमारे देश की धरती और आत्मा का एक काव्यात्मक अवतार हैं (एक रूपक) जिससे हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और अन्य सभी समुदायों की साझा भावनाएं जुड़ी हैं। आस्था व्यक्तिगत हो सकती है, लेकिन मातृभूमि के प्रति श्रद्धा सांप्रदायिक सीमाओं से मुक्त है।
आज उनके आह्वान का बहिष्कार नहीं, उन्हें अपने हृदय में सहेजने का अवसर है। हमारा संविधान ‘हम भारत के लोग’ वाक्य से शुरू होता है। यह हमारी साझा पहचान है जो राजनीतिक हितों और वैचारिक कट्टरता से ऊपर रहनी चाहिए। राज्यपाल द्वारा उन्हें पुष्प अर्पण करना वास्तव में भारतीय संस्कृति को किया गया नमन है, न कि किसी पार्टी का पक्ष प्रदर्शन। अत: राज्यपाल का पक्ष लेकर हम किसी एक पार्टी या व्यक्ति का बचाव नहीं कर रहे, बल्कि गणतंत्र की भावना और इसके संवैधानिक ढांचे का बचाव कर रहे हैं।
हमें भारत की स्वर्णिम परंपरागत पहचान को नष्ट करने के लिए आतुर सेकुलर राजनीतिक हथियार पर अनिवार्य रूप से रोक लगानी होगी। हमें सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के अपने अधिकार को पुनः प्राप्त करना है। हमें याद रखना है कि भारत की आत्मा (स्वयं ‘भारत माता’ की तरह) कालजयी, समावेशी और अविभाज्य है।
(लेखकद्वय सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं)
















