सनातन हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी विशेषता इसमें श्रद्धा और तर्क दोनों का अद्भुत समन्वय है। इस सनातनी ज्ञान-विज्ञान को जांचने-परखने और अनुभव करने का सर्वाधिक फलदायी साधनाकाल है ‘चातुर्मास’ यानी वर्षाकाल के चार महीने। मन और जीवन को श्रेष्ठ व उन्नत बनाने वाले चातुर्मास के नियम वैज्ञानिकता से भी जुड़े हैं। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से कार्तिक माह की देवोत्थानी एकादशी तक की चार महीनों की इस अवधि का सनातन हिन्दू संस्कृति में विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व तो है ही; संयम, मौन और सहिष्णुता की सीख देने वाली यह विशेष कालावधि सांस्कृतिक और व्यावहारिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
वैदिक मान्यता के अनुसार सृष्टि के संचालक श्रीहरि विष्णु के इस चार मासीय योगनिद्रा काल की अवधि में सृष्टि संचालन का दायित्व देवाधिदेव महादेव स्वयं अपने कन्धों पर उठाते हैं। इसी कारण चौमासे में विशेष रूप से महाधिदेव के जलाभिषेक की परम्परा है। श्रावण माह में देश भर में निकलने वाली कांवड़ यात्राएं हमारी इसी सांस्कृतिक संचेतना का पर्याय मानी जाती हैं। यह अवधि इस वर्ष 6 जुलाई से शुरू होकर 2 नवंबर तक रहेगी। देश की युवा पीढ़ी को सनातन ज्ञानतंत्र की इस अनूठी वैज्ञानिकता को आधुनिक सन्दर्भों में कहीं अधिक गहराई व बारीकी से समझने व आत्मसात करने की जरूरत है।
स्व से समष्टि की यात्रा कराता है चातुर्मास : पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्री महाविद्या के महामनीषी पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य चातुर्मास की महत्ता पर प्रबोधित करते हुए कहते हैं,’’ परम प्रभु का योगनिद्रा काल मनुष्य के दैविक जीवन में ही नहीं, दैहिक जीवन भी दिव्य जागृति लेकर आता है। इस चार मासीय योगनिद्रा काल में मानव खुद की अंतर्यात्रा कर स्व से समष्टि की ओर बढ़ सकता है। प्रतिवर्ष चार माह की यह कैवल्य अवधि आंतरिक प्रकृति की शुद्धि द्वारा बाहरी प्रकृति व पर्यावरण की शुद्धि हेतु स्वयं को समर्पित करने का सुअवसर प्रदान करती है। जीवन का एक-एक क्षण मूल्यवान है। जो क्षण चला गया, वह कभी लौटकर नहीं आता और आने वाला क्षण हमारे हाथ में नहीं है, इसलिए वर्तमान क्षण का सर्वोत्तम सदुपयोग कर उसे सार्थक बनाना, यही हमारे वश में है। जीवन में सेवा के बीजों को अंकुरित, पल्लवित व पुष्पित होने दें। इससे स्वयं का जीवन तो उमंग व तरंग से खिल उठेगा ही, औरों के जीवन में भी उल्लास का संचार होगा। चातुर्मास आध्यात्मिक जागरण के साथ अपने मूल, मूल्य, जड़ों से जुड़ने, नूतन व श्रेष्ठ विचारों पर चितंन करने का अवसर प्रदान करता है। इस समय का सर्वश्रेष्ठ सदुपयोग कर हम अतीत का मंथन, वर्तमान में जीवन और भविष्य का चितंन कर नवजीवन की ओर आगे बढ़ सकते हैं।
जब हम एकांत में होते हैं तो वह समय दुनिया को समझने, सही और गलत के बीच निर्णय लेने में हमारी मदद करता है। यदि आज के युवा चातुर्मास के इस महत्व को जान लें, तो उन्हें अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने में अत्यधिक मदद मिलेगी। उनके ज्ञान और रचनात्मकता को बढ़ाने में भी उनकी सहायता होगी। हमारा जीवन हमारे निर्णयों का ही तो परिणाम होता है, इसलिए उसे श्रेष्ठ बनाने के लिए हमें उन सनातन वैदिक परंपराओं को आत्मसात करना होगा, जिन्हें हमारे ऋषियों ने बड़े ही शोध, वैज्ञानिकता और आध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर तैयार किया था। चातुर्मास का समय उसी शोध का दिव्य उदाहरण है, जिसका प्रयोग कर हम जीवन में सत्य, अहिंसा और अनुशासन सीख सकते हैं। नैतिकता, मूल्यों और श्रेष्ठ गुणों से समृद्ध जीवन का निर्माण कर एक श्रेष्ठ समाज और जिम्मेदार नागरिकों का निर्माण कर सकते हैं।
‘इंटरनेट’ के साथ ‘इनरनेट’ से जुड़ने की जरूरत : चिदानंद मुनि
इसी क्रम में परमार्थ निकेतन के प्रमुख चिदानंद मुनि राष्ट्र की युवा शक्ति का आह्वान कहते हुए कहते हैं कि तनाव, विग्रह, क्रोध व क्रूरता से भरे आज के समाज में जब मामूली सी कहासुनी से शुरू हुए झगड़े में जान तक ले लेने की खबरें आम हो गयी हैं। आपसी विश्वास और संवेदना के छीजने से मानवीय रिश्ते तार-तार हो रहे हैं। उचित मार्गदर्शन और सुसंस्कारों के अभाव में नयी पीढ़ी नशाखोरी के दुर्व्यसनों और अपराधों के चंगुल में फंसती जा रही है। किन्तु कहते हैं न कि जब जागो तभी सवेरा। वर्तमान समय में युवाओं को इंटरनेट के साथ इनरनेट से जुड़ने की भी जरूरत है और इनरनेट से जुड़ने का सबसे श्रेष्ठ माध्यम है चातुर्मास। परम प्रभु श्रीहरि का यह योगनिद्रा काल अंतस में प्रवेश की दिव्य यात्रा है। यह वह अवसर है हम संयम और साधना के द्वारा मन के वैचारिक अंधकार को दूर कर सर्वत्र सद्ज्ञान का उजास फैला सकते हैं।
इसके लिए अतंस को, आंतरिक अंधकार को दूर करने के लिए भीतर ज्ञान का दीप जलाना जरूरी है। किन्तु; जब हम भीतर के प्रकाश को खोजने निकलें तो भीतर की कुविचारों की जंक फाइल्स को डिलीट करते चलें, भीतर पड़ी धूल को हटाएं, भीतर सद्गुणों का रंग-रोगन करें, ताकि चैतन्य जाग्रत हो, ज्ञान के सूर्य का उदय हो। चातुर्मास में बाहरी प्रकृति में भी परिवर्तन होता है। बाहर तो प्रकाशमान ऊर्जा व्याप्त है, लेकिन हम अपने भीतर कैवल्य का नन्हा-सा दीप प्रज्वलित कर लें; जो भेदभाव की सारी दीवारों को मिटा दे, दरारों को भर दे और सभी के दिलों में भी प्रेम व सद्भाव के दीप जला दे तो हमारा अंतर्मन प्रकाशित हो उठेगा। अपने विचारों से, व्यवहार से, दृष्टिकोण से हमने अपने जिस आंतरिक प्रकाश को ढक रखा है, हमें उसे हटाना है। जिस प्रकार सूर्य बाहर चमकता रहता है, लेकिन यदि हम अपने घर की खिड़कियां न खोलें और पर्दे से पूर्णतया ढक दें तो घर में प्रकाश नहीं आएगा, सदैव घर के अंदर अंधकार ही रहेगा। अर्थात यदि हमें प्रकाश चाहिए तो घर की खिड़कियों को खोलना ही होगा, पर्दों को हटाना ही होगा। तब प्रकाश स्वतः ही हमारे घर में प्रवेश कर लेगा। इसी प्रकार जब हम अपने विचार, व्यवहार और सोच पर से रूढ़ियों, आकांक्षाओं और ईर्ष्या के पर्दे हटा देंगे तो फिर हमारी चेतना, हमारा अंत:करण स्वतः ही आलोकित हो उठेगा।
प्रकृति के संरक्षण व संवर्धन की सीख
चातुर्मास के दौरान धरती पर अनगिनत जीव, नन्हे पौधे और वनस्पतियां विकसित होती हैं। यह कितनी सुन्दर बात है कि हमारी संस्कृति में पेड़-पौधों में भी जीवन और संवेदना का वास माना गया है। यही बात अब वैज्ञानिक शोध में भी साबित हो चुकी है। यही कारण है पर्यावरण को सहेजने का भाव हमारी सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है। चातुर्मास में तुलसी, पीपल सींचने और अक्षय नवमी को आंवले के वृक्ष की पूजा की भी परंपरा है। इस परंपरा को हम प्रकृति और परमात्मा के प्रेम का प्रतीक भी मान सकते हैं। कोरोना विपदा के बाद हम पीपल, तुलसी, आंवला जैसे औषधीय और जीवनरक्षक पौधों की पूजा के मायने समझने लगे हैं। यह प्रकृति पूजन कहीं न कहीं स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का ही संदेश देता है। प्राणवायु देने वाले- तुलसी, आंवला और पीपल के पौधों को संरक्षित रखने की बात भी चातुर्मास के नियमों का हिस्सा है। यह किसी अंधविश्वास से नहीं, बल्कि पूरी तरह वैज्ञानिक और जनकल्याण के भाव से जुड़े हैं। आज के समय में जब हमें अपनी परंपराओं को जीवित रखने की जरूरत है, वैज्ञानिकता के साथ बनाये गये चातुर्मास के ये नियम सेहत, संयम और संस्कृति के सच्चे वाहक हैं।
चातुर्मास काल का अनूठा आहार विज्ञान
वैदिक साहित्य में भगवान विष्णु के नाम ‘सूर्य’, ‘अग्नि’ और ‘हरि’ भी हैं। हरिशयनी एकादशी से हरि के योगनिद्रा में जाने के पीछे का मूल भाव प्रकृति में अग्नि तत्व की न्यूनता और जल तत्व की अधिकता को दर्शाता है। भारतीय आयुर्वेद के मनीषियों के अनुसार सूर्य या अग्नि तत्व पोषण की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण होते हैं तथा वर्षाकाल में प्रकृति के सापेक्ष शरीर की जठराग्नि मन्द पड़ जाने से पाचन शक्ति कमजोर हो जाने से उदर व संक्रामक रोगों का प्रसार होने लगता है। मौसम में सूर्य के ताप में धीरे धीरे कमी और बरसात के साथ प्रकृति में जल तत्व की अधिकता से नमी या सीलन के कारण प्रतिरोधक क्षमता में कमी के चलते संक्रामक रोगाणुओं को पनपने का वातावरण मिल जाता है। अतः कमजोर पाचन के साथ त्वचा पर फोड़े-फुंसियां, घमौरी के अलावा सर्दी, जुखाम, बुखार आदि रोग बढ़ने लगते हैं। बरसात के कारण जगह जगह दूषित पानी व गन्दगी जमा होने से मक्खी, मच्छर या अन्य कीड़े मकोड़े के द्वारा होने वाले जैसे मलेरिया, टायफायड, चिकनगुनिया, डेंगू, ज्वर, पीलिया आदि में भी वृद्धि हो जाती है। प्रतीत होता है कि हमारे वैदिक मनीषी वर्षाकाल में पनपने वाली इन व्याधियों से भली भांति परिचित थे; तभी तो उन्होंने इन रोगों से बचाव के जो नियम सदियों पहले बनाये थे, उनकी प्रासंगिकता आज भी जस की तस है। हमारे स्वास्थ्य विज्ञानियों की वर्षा ऋतु में देर से पचने वाले गरिष्ठ मसालेदार तैलीय व बासी भोजन, मांसाहार, बहुत ठंडे पेय के सेवन से बचने, दूध, दही व साग से परहेज करने तथा सादा सात्विक आहार लेने की सलाह को अब आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सक भी उचित मान रहे हैं ताकि जीवनी शक्ति और मस्तिष्क की क्रिया में सन्तुलन बना रहे।

















