भारतीय संविधान और पंच परिवर्तन: सनातन चेतना से सामाजिक नवाचार तक
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होम संघ @100 पंच परिवर्तन स्वदेशी

भारतीय संविधान और पंच परिवर्तन: सनातन चेतना से सामाजिक नवाचार तक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का 'पंच परिवर्तन' अभियान स्वदेशी, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य और पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से भारतीय संविधान की आत्मा को साकार करता है। जानें कैसे यह भारत को विश्वगुरु के पथ पर अग्रसर करता है।

Written byडॉ विश्वास चौहानडॉ विश्वास चौहान
Jul 5, 2025, 11:54 am IST
in स्वदेशी, पंच परिवर्तन, संविधान
indian parliament panch parivartan

प्रतीकात्मक तस्वीर

“संगच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।” — ऋग्वेद 10.191.2

विश्व के सबसे सामाजिक संघठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने समाज परिवर्तन की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल करते हुए ‘पंच परिवर्तन’ का आव्हान प्रस्तुत किया है। इस अभियान में पांच महत्वपूर्ण बिंदुओं—स्वदेशी, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य और पर्यावरण संरक्षण—को समाज जीवन में पुनर्स्थापित करने का संकल्प है।

ये परिवर्तन न केवल सांस्कृतिक राष्ट्रत्व के आधार स्तंभ हैं, अपितु भारतीय संविधान के मूल लक्ष्यों से भी गहन रूप से संबद्ध हैं। पंच परिवर्तन महज़ विचार नहीं, बल्कि भारतीय संविधान की आत्मा में समाहित मूल्यों और कर्तव्यों का मूर्त रूप हैं।

भारतीय संविधान न केवल एक कानूनी दस्तावेज है, बल्कि यह भारतीय समाज की दिशा और दशा को परिभाषित करने वाला नैतिक संहिता भी है। पंच परिवर्तन के सभी घटक संविधान के मूल तत्वों – न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुता, और उत्तरदायित्व – के साथ पूर्णतः सुसंगत है।

पंच परिवर्तन: राष्ट्र निर्माण की पाँच दिशाएं हैं जिनमे पहला परिवर्तन है स्वदेशी अर्थात आत्मनिर्भर भारत का आर्थिक आधार ,साथ ही भारत मे भारत के “स्व” की स्थापना जो विकसित भारत’, के लिए है ‘गुलामी के चिन्हों से मुक्ति’, के लिए है अपनी स्वदेशी ‘विरासत पर गर्व’ के माध्यम से होगी ।

पंच परिवर्तन का दूसरे परिवर्तन का उपकरण कुटुंब प्रबोधन के माध्यम से भारतीय समाज मे परिवार संस्था की पुनः प्रतिष्ठा, परिवार संस्था में मूल्यों की प्रतिष्ठा मूल्यों में भारतीय जीवन मूल्यों को जीने वाले आदर्श परिवारों की स्थापना के लिए है।

तीसरा परिवर्तन भारतीय समाज मे सामाजिक समरसता का लाना है ऐसा समाज जहाँ छुवाछुत ऊंचनीच के जाति-वर्ग विघटन के विरुद्ध विशुद्ध सनातनी सांस्कृतिक समरसता की स्थापना हो जाये।

चौथा परिवर्तन नागरिक कर्तव्य के स्मरण और अभ्यास का है अर्थात , भारत के प्रत्येक नागरिक में अपने देश समाज संस्कृति और राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति कर्तव्य-प्रधान जीवन जीने के प्रति जागरूकता लाने के लिए है ।

पाँचवां परिवर्तन पर्यावरण संरक्षण के लिए है अर्थात प्रकृति के साथ सहजीवन का मूल्यबोध और पोषणीय विकास की संकल्पना को साकार करने के लिए है ।

इसे भी पढ़ें: संविधान, संशोधन और सवाल

उक्त पंच परिवर्तनों को यदि ध्यान से समझे तो स्वदेशी या स्व के लिए प्रत्येक मनुष्य को स्वयम को परिवर्तित होने के लिए है , कटुम्ब प्रबोधन के लिए परिवर्तन परिवारों के लिए , सामाजिक समरसता समाज की आदर्श स्तिथि लाने के लिए है ,नागरिक कर्तव्य राष्ट्र या देश के लिए हैं और पर्यावरण संरक्षण में समस्त विश्व के कल्याण की भावना है ,इस प्रकार व्यक्ति ,परिवार ,समाज ,राष्ट्र और विश्व के कल्याण के लिए ये पंच परिवर्तन “हम भारत के लोग” को करना है ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ‘पंच परिवर्तन’ भारतीय समाज को केवल कर्मभूमि नहीं, सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में विकसित करने का महायज्ञ है। भारतीय संविधान उसकी विधिक संरचना है, जबकि पंच परिवर्तन उसकी आत्मिक अभिव्यक्ति। जब स्वदेशी की आत्मा, समरसता की अनुभूति, कुटुंब की गरिमा, कर्तव्य की चेतना और प्रकृति का संतुलन – संविधान की चेतना से एकाकार होते हैं, तब भारत विश्वगुरु के पथ पर अग्रसर होता है।

संविधान की प्रस्तावना और पंच परिवर्तन

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी “हम भारत के लोग” के लिए उल्लिखित स्वतंत्रता, न्याय , समता और बंधुत्व” की अवधारणा पंच परिवर्तन के उद्देश्यों से पूर्णतः संगत है।

यहां यदि ध्यान से देखेंगे तो “स्व” तंत्रता में स्वदेशी आधार पर अपने स्वयम के तंत्र की स्थापना का एवम आत्मनिर्भर भारत का भाव है । न्याय के अंतर्गत कुटुंब प्रबोधन से निर्मित सामाजिक समरसता का समता मूलक समाज के न्याय का भाव है । सामाजिक समरसता समता में बंधुत्व का भी भाव दिखाई पड़ता है । नागरिक कर्तव्य और पर्यावरण संरक्षण सम्बंधित प्रावधान भी संविधान में हैं ।

स्वदेशी: आत्मनिर्भरता और संवैधानिक दृष्टि

नीति शतक में उलकेखित है “न चोर हार्यं न च राज हार्यं… विद्या धनं सर्व धनं प्रधानम्” अर्थात अपनी कौशलता या स्किल महत्वपूर्ण होती है ,स्किल को ही विद्या भी कहते हैं यह श्लोक हमें विद्या की महत्ता और नश्वर भौतिक धन की तुलना में उसकी श्रेष्ठता को दर्शाता है. विद्या को न तो कोई चुरा सकता है, न ही कोई छीन सकता है, और न ही इसे भाइयों में विभाजित किया जा सकता है. साथ ही, विद्या का खर्च करना इसे बढ़ाता है, जबकि भौतिक धन का खर्च करना इसे कम करता है. इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि विद्या धन सभी धनों में सबसे श्रेष्ठ है.

संविधान का भाग IV (नीति निदेशक तत्व) आर्थिक संरचना को समाजवादी दिशा देने हेतु अनुच्छेद 39 (b)(c) एवं 43 के माध्यम से स्वदेशी उद्योगों और संसाधनों के समान वितरण का आग्रह करता है।

Dahanu Taluka Environment Protection Group v. Bombay Suburban Electric Supply Co. Ltd. (1991) के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने पारंपरिक संसाधनों की रक्षा और स्थानीय कुटीर उद्योगों को प्राथमिकता देने की बात संविधान के आधार पर ही कही। स्वदेशी विचार भारतीय संविधान के मूल दर्शन में रचा-बसा है। यद्यपि “स्वदेशी” शब्द सीधे संविधान में नहीं लिखा गया है, लेकिन इसके विचारधारात्मक पहलू संविधान के निम्न अनुच्छेदों में परिलक्षित होते हैं:

अनुच्छेद 19(1)(g): प्रत्येक नागरिक को किसी व्यापार, व्यवसाय या व्यवसाय करने की स्वतंत्रता दी गई है, जो स्वदेशी उद्यमों को प्रोत्साहन देती है।

अनुच्छेद 43: कुटीर उद्योगों और स्व-रोज़गार को प्रोत्साहित करने का निर्देश, जो स्वदेशी उत्पादन का मूल आधार है।
State of Karnataka vs. Shri Ranganatha Reddy (1977): के केस में सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक लोकतंत्र को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा माना, जो स्वदेशी मॉडल को नैतिक बल प्रदान करता है।

इसी प्रकार Samatha vs. State of Andhra Pradesh (1997): के केस में सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी कम्पनियों द्वारा आदिवासी क्षेत्रों में खनिज दोहन के खिलाफ परंपरागत स्वदेशी अधिकारों की रक्षा की। इसी प्रकार श्री एल्युमिनियम गाँव, ओडिशा के केस में न्यायालय ने स्थानीय ग्राम समितियों ने विदेशी खनन कंपनियों का विरोध कर स्वदेशी कृषि और हस्तकला आधारित आजीविका को बढ़ावा दिया है।

संघ दृष्टि स्वदेशी को केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतिरूप मानती है। ‘वोकल फॉर लोकल’ उसी विचार का व्यवहारिक प्रारूप है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित ‘लोकल फॉर वोकल’ अभियान गांव-गांव में स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण और विपणन सहायता दी जा रही है।

कुटुंब प्रबोधन: परिवार संस्था की गरिमा और संविधान

भारत की प्राचीन परम्पराओं में “गृहमेव तपोवनं” की कल्पना है अर्थात ” जब परिवार तपस्थली हो, वहीं राष्ट्रधर्म पुष्पित होता है।”, इसी प्रकार तैत्तिरीय उपनिषद में उलकेखित है ” मातृदेवो भव, पितृदेवो भव…” यह श्लोक यह दर्शाता है कि माता-पिता हमारे कुटुम्बिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और उनका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। यह श्लोक न केवल माता-पिता का सम्मान करने के लिए बल्कि उन्हें देवता के समान मानने के लिए भी कहता है।

संविधान का अनुच्छेद 51A(h) नागरिकों को “वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन की भावना” को बढ़ावा देने का कर्तव्य सौंपता है, जो कि कुटुंब (परिवार) नामक प्रथम सामाजिक संस्था से प्रारंभ होता है।

Sarla Mudgal v. Union of India (1995) के केस में सुप्रीम कोर्ट ने परिवार संस्था में एकरूपता और समानता के लिए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता जताई गई। इसी प्रकार संविधान का अनुच्छेद 15(3): महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान करता है वास्तव में यह प्रावधान परिवार-केन्द्रित नीति का समर्थन।करता है । इसी प्रकार अनुच्छेद 47: पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य की उन्नति की जब बात करता है तो घर की बुनियादी जिम्मेदारी की ओर संकेत करता है ।
Githa Hariharan vs. RBI (1999): सुप्रीम कोर्ट ने माता को भी समान संरक्षक का अधिकार दिया, जिससे पारिवारिक निर्णयों में लिंग-समानता की पुष्टि होती है।

एक अन्य केस Danial Latifi vs. Union of India (2001): में न्यायालय ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण के अधिकार को संविधान के समानता और गरिमा के सिद्धांत से जोड़ा।

संघ दृष्टि से वास्तव में परिवार राष्ट्र की पहली इकाई है। कुटुंब प्रबोधन का उद्देश्य उसी इकाई को संस्कारित कर सामाजिक ताने-बाने को सुदृढ़ करना है। कुछ प्रान्तों में संघ का “संस्कृति संवर्धन” अभियान से बालकों में पारिवारिक मूल्यों, भारतीय शिष्टाचार और माता-पिता के प्रति श्रद्धा की शिक्षा दी जा रही है। इसी प्रकार सेवा भारती द्वारा “फैमिली काउंसिलिंग सेंटर” जहाँ परिवारों के टूटते संबंधों को संवाद और परामर्श के माध्यम से जोड़ा जा रहा है।

सामाजिक समरसता: समता की सनातन साधना और संवैधानिक उद्देश्य

महाउपनिषद् में उल्लेखित है “अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्, उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।” वास्तव में जब सम्पूर्ण सृष्टि को ही कुटुंब मान लिया जाए तो समाजिक समरसता का भाव स्वतः ही आ जाता है।

संविधान सभा की बहस में डॉ. अंबेडकर ने सामाजिक समानता को राजनीतिक लोकतंत्र की पूर्वशर्त बताया था।
संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित “समानता” और “बंधुता” सामाजिक समरसता की नींव हैं।

संविधान का अनुच्छेद 14-18: समानता का अधिकार, छुआछूत का उन्मूलन, और अवसर की समानता। की बात सामाजिक समरसता के लिए करता है इसी प्रकार अनुच्छेद 46 भी अनुसूचित जातियों, जनजातियों और दुर्बल वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की रक्षा का दायित्व सम्पूर्ण समाज का बताता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15, 17 और 46 सामाजिक भेदभाव के उन्मूलन और पिछड़े वर्गों के उत्थान हेतु संविधान प्रदत्त दिशाएं हैं।

Indian Young Lawyers Association v. State of Kerala (2018) के केस में समानता बनाम परंपरा की बहस में सामाजिक समरसता की आधुनिक व्याख्या न्यायालय ने भी इसी प्रकार से की है। Indra Sawhney vs. Union of India (1992): के केस में कोर्ट ने सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को संविधान सम्मत घोषित किया गया।

Nagaraj Case (2006) के केस में कोर्ट ने सामाजिक न्याय के संदर्भ में प्रमोशन में आरक्षण की वैधता को स्वीकार करते हुए “समरसता” का सैद्धांतिक पक्ष स्पष्ट किया।

संघ दृष्टि से समरसता केवल समानता नहीं, परस्पर सम्मान है। संघ की दृष्टि में जाति नहीं, गुण और सेवा महत्वपूर्ण हैं।
“एकात्म मानव दर्शन” पर आधारित समरसता भोज विभिन्न जाति, वर्ग और संप्रदाय के लोग साथ बैठकर भोजन करते हैं, जिससे सामाजिक दूरियाँ मिटती हैं। “सेवा कुंभ” (कुंभ 2019, प्रयागराज): हर वर्ग को जोड़ने हेतु सांस्कृतिक, चिकित्सकीय, और शैक्षिक शिविरों का आयोजन किया गया।

नागरिक कर्तव्य: संविधान का अनुपूरक तत्व और राष्ट्रभाव का आधार

तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है “कर्तव्यमेव अप्रमत्तव्यम्” अर्थात “कर्तव्य ही सर्वोपरि है, और उसे बिना प्रमाद (लापरवाही) के निभाना चाहिए।”

संविधान का भाग IVA (अनुच्छेद 51A) नागरिकों के कर्तव्यों की व्याख्या करता है। जिनमे निम्नलिखित प्रमुख कर्तव्य हैं –

  • राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा
  • सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा
  • महिलाओं का सम्मान
  • प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास संविधान का पालन
  • राष्ट्र रक्षा
  • समरसता को बढ़ावा
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण
  • सार्वजनिक संपत्ति की रक्षानागरिक कर्तव्यों को भारतीय संविधान में 42वें संशोधन (1976) द्वारा जोड़ा गया, ताकि मौलिक अधिकारों के साथ कर्तव्यों का संतुलन भी बना रहे।

हितोपदेश में कहा गया है “नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा, संयमो दुरुपायश्च कर्तव्यानाम् विवेचनम्।”

AIIMS Students Union v. AIIMS (2001) के केस में कोर्ट ने कर्तव्यों को अधिकारों के साथ संतुलित रूप में स्वीकार करने की बात न्यायालय ने की।

संघ दृष्टि से देखे तो कर्तव्य आधारित जीवन दृष्टि – ‘सुव्यवस्थित समाज’ का आधार है। संघ की शाखाएं नागरिक अनुशासन और कर्तव्य-बोध की प्रयोगशालाएं हैं। संघ द्वारा विभिन्न प्रान्तों में राष्ट्रीय नागरिक कर्तव्य अभियान” जिसमें लोगों को मतदान, कर भुगतान, जल-संरक्षण जैसे कार्यों के लिए प्रेरित किया जाता है। “स्वच्छ भारत अभियान” के अंतर्गत कई शाखाओं और स्वयंसेवकों ने सार्वजनिक स्थलों की सफाई की जाती रही है।

पर्यावरण संरक्षण: सनातन संस्कृति और संवैधानिक प्रावधान

— अथर्ववेद में कहा गया है “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” – भूमि को माता मानना पर्यावरणीय संस्कृति की आधारशिला है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48A एवं 51A(g) पर्यावरण की रक्षा को नीति व कर्तव्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
अनुच्छेद 48A (नीति निदेशक सिद्धांत): राज्य का कर्तव्य है कि वह पर्यावरण की रक्षा करे।
अनुच्छेद 51A(g): प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे।

MC Mehta v. Union of India (1987, 1992) – पर्यावरण संरक्षण को जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का अंग माना गया।

MC Mehta Series Cases: यमुना और गंगा प्रदूषण, वायु प्रदूषण, औद्योगिक अपशिष्ट आदि पर सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने हेतु कई आदेश दिए।

Subhash Kumar vs. State of Bihar (1991): स्वच्छ पर्यावरण को जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा माना गया।

MC Mehta vs. Union of India (1987): पर्यावरणीय संरक्षण को नागरिक कर्तव्य के रूप में रेखांकित किया गया।

संघ दृष्टि से देखे तो संघ द्वारा ‘ग्राम वन योजना’, ‘गो सेवा’, ‘पौधारोपण’ आदि अभियानों के माध्यम से पर्यावरणीय चेतना को सांस्कृतिक बोध से जोड़ा गया।

“पर्यावरण मित्र” अभियान में हर स्वयंसेवक को एक वृक्ष लगाने और उसकी देखभाल करने की जिम्मेदारी।”जलग्राम योजना” जल-संरक्षण हेतु ग्रामीण स्तर पर तालाबों, कुओं और चेक डैमों का निर्माण।

पंच परिवर्तन का समेकित प्रभाव

पंच परिवर्तन महज़ वैचारिक अभियान नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की दिशा में संघ की सक्रिय सामाजिक और संवैधानिक भागीदारी है। यह उन तत्वों को बल देता है जिन्हें संविधान ने मूल अधिकारों और नीति-निर्देशक सिद्धांतों में स्थान दिया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों ने बार-बार नागरिक कर्तव्यों, सामाजिक समरसता और पर्यावरण जैसे विषयों को सशक्त किया है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह दृष्टिकोण भारत की लोकतांत्रिक यात्रा को अधिक उत्तरदायी, आत्मनिर्भर, समरस और टिकाऊ बनाने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

निष्कर्ष

“पंच परिवर्तन” भारतीय संविधान की आत्मा का समाजशास्त्रीय रूपांतरण है। संविधान की प्रस्तावना में वर्णित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता जैसे मूल्य, RSS के इस अभियान में स्वदेशी, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य, और पर्यावरण संरक्षण के रूप में मूर्त होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय, नीति निदेशक सिद्धांत और मौलिक कर्तव्यों की व्याख्या इस अभियान को एक संवैधानिक वैधता प्रदान करती है।

संविधान के इस युग में जब अधिकारों के साथ कर्तव्यों की पुनः खोज हो रही है, तब “पंच परिवर्तन” भविष्य की पीढ़ियों को एक उत्तरदायी, संवेदनशील और न्यायपूर्ण भारत के निर्माण की दिशा में अग्रसर करता है।

आज आवश्यकता है कि संविधान केवल ग्रंथ न रहे, वह प्रत्येक भारतीय के मन-मंदिर में पंच परिवर्तन के दीप से आलोकित हो।

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डॉ विश्वास चौहान
डॉ विश्वास चौहान
संयोजक जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र , मध्यप्रदेश ( प्राध्यापक विधि , शासकीय स्टेट लॉ कॉलेज भोपाल, मध्य प्रदेश ) [Read more]
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बिहार: किशनगंज में जनजातीय बच्चों को दी जा रही मजहबी शिक्षा, केरल की संस्था पर भड़के ग्रामीण

रावलकोट में पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन करते स्थानीय लोग। (फोटो- वीडियो ग्रैब)

PoJK में भड़का पाकिस्तान के खिलाफ सबसे बड़ा विद्रोह, प्रदर्शनकारी बोले- ‘कश्मीर नहीं पाक का हिस्सा, करेंगे भारत का रुख’

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इजरायल के PM नेतन्याहू की चेतावनी: बोले- फिर करेंगे ईरान पर सैन्य हमला…ट्रंप की टेंशन बढ़ी

Explainer: अब VB G-RAM-G का जमाना, 25 फीसदी बढ़ी मजदूरी; बदलेगी गांवों की दशा-दिशा

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