नई दिल्ली । दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर लंबे समय से अटकलें लगाई जा रही हैं, और हाल ही में चीन की तरफ से आए एक बयान ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया। चीन ने कहा था कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी के चयन को तभी वैध माना जाएगा, जब उसमें उनकी मंजूरी होगी। अब भारत ने इस बयान पर बेहद स्पष्ट और तीखा जवाब दिया है- वो भी बिना नाम लिए।
भारत का संदेश साफ है
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा- “दलाई लामा का पद सिर्फ तिब्बतियों के लिए नहीं, बल्कि दुनिया भर के करोड़ों अनुयायियों के लिए बेहद आध्यात्मिक और भावनात्मक महत्व रखता है। उनके उत्तराधिकारी का फैसला पूरी तरह उन्हीं के अधिकार में है, इसमें कोई दूसरा पक्ष दखल नहीं दे सकता।”
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रिजिजू का यह बयान चीन की टिप्पणी के तुरंत बाद आया और इसे भारत की तरफ से एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि धार्मिक मामलों में राजनीतिक दखल को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
भारत ने बिना लाग-लपेट के यह संदेश दे दिया है कि दलाई लामा जैसे आध्यात्मिक विषयों में बाहरी दखल को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अब जब खुद दलाई लामा यह स्पष्ट कर चुके हैं कि उनके उत्तराधिकारी की पहचान धार्मिक परंपराओं और ट्रस्ट के फैसले से तय होगी, तो ऐसे में चीन की जिद पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है।
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बता दें कि यह पूरा मामला सिर्फ एक धार्मिक परंपरा का नहीं है, बल्कि तिब्बत की पहचान, आज़ादी और आत्मसम्मान का भी है — और भारत इस पर खुलकर दलाई लामा के साथ खड़ा नजर आ रहा है।
क्या चाहता है चीन ?
दरअसल, चीन का दावा है कि तिब्बत उसका हिस्सा है, और इसीलिए वह दलाई लामा की परंपरा को भी अपने नियंत्रण में रखना चाहता है। बीजिंग का कहना है कि अगले दलाई लामा की नियुक्ति तभी वैध मानी जाएगी, जब चीन की सरकार उसकी मंजूरी दे।
क्या कहा दलाई लामा ने ..?
हालांकि धर्मशाला में खुद दलाई लामा ने हाल ही में यह स्पष्ट कर दिया है कि उनकी परंपरा (दलाई लामा) जारी रहेगी, और उनके उत्तराधिकारी को लेकर निर्णय सिर्फ गादेन फोडरंग ट्रस्ट लेगा। यह वही ट्रस्ट है जिसे दलाई लामा ने 2015 में स्थापित किया था, और अब वही संस्था इस परंपरा को आगे बढ़ाएगी।
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उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में उनका उत्तराधिकारी कोई महिला भी हो सकती है, या वह किसी ऐसे स्थान पर जन्म ले सकता है जो चीन के बाहर हो। इस तरह, उन्होंने यह संकेत दिया कि उत्तराधिकारी के चयन में परंपरा, तिब्बती भावना और व्यक्तिगत इच्छा का सम्मान किया जाएगा- न कि किसी राजनीतिक दबाव का।
क्या है पूरा मामला.?
दलाई लामा तिब्बती बौद्ध धर्म के सबसे ऊंचे आध्यात्मिक पद पर हैं और उन्हें अवलोकितेश्वर (करुणा के बोधिसत्त्व) का अवतार माना जाता है। उनकी पुनर्जन्म की परंपरा सदियों पुरानी है। हर बार नए दलाई लामा को खास धार्मिक प्रक्रियाओं के जरिए खोजा और मान्यता दी जाती है।
लेकिन चीन लंबे समय से इस प्रक्रिया को राजनीतिक रूप से नियंत्रित करना चाहता है। चीन पहले भी पंचेन लामा के मामले में ऐसा कर चुका है, जहां उसने खुद से एक उत्तराधिकारी घोषित किया और जिसे अधिकतर तिब्बती मान्यता नहीं देते।











