राजनाथ-दोंग जून वार्ता के बाद, ​बीजिंग ने सीमा विवाद को बताया 'जटिल', लेकिन संवाद बनाए रखने का दिया संकेत
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राजनाथ-दोंग जून वार्ता के बाद, ​बीजिंग ने सीमा विवाद को बताया ‘जटिल’, लेकिन संवाद बनाए रखने का दिया संकेत

संबंधों की सलवटों को दूर करने में चुनौतियां कम नहीं हैं। गलवान जैसी घटनाओं के बाद दोनों देशों के बीच विश्वास बहाल करने के प्रयास जारी हैं

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Jul 1, 2025, 12:17 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
राजनाथ सिंह और दोंग जून

राजनाथ सिंह और दोंग जून

भारत और चीन के बीच रिश्ते ऐतिहासिक रूप से नरम-गरम रहे हैं। हाल में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन के लिए चीन गए भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और चीन के रक्षा मंत्री दोंग जून की सम्मेलन से इतर भेंट दोनों देशों के संबंधों के संदर्भ में एक अहम कदम मानी जा सकती है, क्योंकि इसमें भारत की तरफ से स्पष्ट कहा गया कि हम सीमा का स्थायी हल चाहते हैं, स्पष्ट सीमांकन चाहते हैं जिससे इस्पष्टता न रहे। इसके साथ ही, द्विपक्षीय संबंधों के अन्य आयामों पर भी नई दिल्ली और बीजिंग के आगे बढ़ने का संभावित खाका भी चर्चा में आया। दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों की 27 जून को हुई उस भेंट के बाद चीन ने एक विशेष बयान जारी किया है। उसने सीमा विवाद को “जटिल” बताते हुए इसे सुलझाने की इच्छा भी जताई है और भारत के साथ विकास की दिशा में आगे बढ़ने की बात भी कही है। विशेषज्ञ इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि क्या बीजिंग का यह बयान दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों में संभावित नरमी का संकेत है।

इसमें संदेह नहीं है कि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद दशकों पुराना है, विशेष रूप से लद्दाख क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर। 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने दोनों देशों के बीच विश्वास की खाई को और गहरा कर दिया था। इसके बाद से कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ताएं हुईं, लेकिन कोई स्थायी समाधान अभी तक नहीं निकल पाया है।

चीनी रक्षा मंत्री से अपनी वार्ता में राजनाथ सिंह ने सीमा पर तनाव कम करने और स्पष्ट परिसीमन की आवश्यकता पर जोर दिया था। उन्होंने एक “सुस्पष्ट रोडमैप” की बात की जिससे जमीनी स्तर पर विश्वास बहाली हो सके। दोनों नेताओं की उस भेंट के बाद कल चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि सीमा विवाद जटिल है और इसे सुलझाने में समय लगेगा, लेकिन दोनों देश संवाद बनाए रखने और शांति स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि सीमा विवाद जटिल है और इसे सुलझाने में समय लगेगा

इस वक्तव्य में चीन ने यह भी स्वीकार किया कि विशेष प्रतिनिधि स्तर की 23 बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन समाधान अभी भी दूर ही दिख रहा है। लेकिन दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों की बैठक और चीन के उक्त बयान से कुछ अहम कूटनीतिक संकेत जरूर मिलते हैं। एक, दोनों देशों ने यह स्पष्ट किया है कि वे विभिन्न स्तरों पर संवाद बनाए रखने को तैयार हैं। यह एक सकारात्मक संकेत है, विशेष रूप से तब जब सीमा पर सैन्य तनाव बना हुआ है। दो, चीन ने भारत के साथ विकास की इच्छा जताई है, जो आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में एक कदम हो सकता है।

इसके अलावा एक संकेत यह भी है कि यह बैठक एससीओ सम्मेलन के इतर हुई थी, जो दर्शाता है कि बहुपक्षीय मंचों का उपयोग द्विपक्षीय मुद्दों को सुलझाने के लिए किया जा रहा है। मार्ग भले तय हो, लेकिन संबंधों की सलवटों को दूर करने में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। एक, गलवान जैसी घटनाओं के बाद दोनों देशों के बीच विश्वास बहाल करना आसान नहीं दिख रहा है। दो, सीमा की अस्पष्टता बार-बार तनाव का कारण बनती रही है। तीन, दोनों देशों को घरेलू राजनीतिक दबावों के बीच एक संतुलन बनाना होगा ताकि वार्ता ठोस दिशा में बढ़ती रहे। भारत में कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी चीन पर विवादित बयान देकर मुद्दे को और उलझाते रहे हैं और जवाहरलाल नेहरू सरकार द्वारा चीन को सौंपी गई भारत की जमीन का मुद्दा गायब कर जाते हैं।

Held talks with Admiral Don Jun, the Defence Minister of China, on the sidelines of SCO Defence Minitsers’ Meeting in Qingdao. We had a constructive and forward looking exchange of views on issues pertaining to bilateral relations.

Expressed my happiness on restarting of the… pic.twitter.com/dHj1OuHKzE

— Rajnath Singh (@rajnathsingh) June 27, 2025

लेकिन, जैसा पहले बताया, दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों की इस ताजा वार्ता को भारत-चीन संबंधों में एक संभावित मोड़ के रूप में देखा जा सकता है। जहां एक ओर चीन का बयान संवाद और सहयोग की बात करता है, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट है कि सीमा विवाद का समाधान त्वरित नहीं होगा। भारत की ओर से राजनाथ सिंह का स्पष्ट और ठोस रुख यह दर्शाता है कि भारत अब अस्पष्टता को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। एक संकेत यह भी है कि चीन अब बातचीत को राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर भी आगे बढ़ाना चाहता है।

राजनाथ सिंह और दोंग जून की बैठक सीमा विवाद के समाधान में एक कदम आगे कहा जा सकता है, लेकिन बीजिंग में संवाद की निरंतरता और विकास की इच्छा सतत बनी रहेगी तो दोनों देशों के लिए एक सकारात्मक दिशा में बढ़ना संभव हो पाएगा। इससे न केवल द्विपक्षीय संबंध सुधारेंगे, बल्कि दक्षिण एशिया में स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।

Topics: New Delhiborder disputeसीमा विवादindo china relationsrajnath dong talkभारतचीनbeijing
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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