सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जस्टिस बीआर गवई ने अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को मिलने वाले आरक्षण में भी क्रीमी लेयर कैटेगरी को लागू करने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि अधिकारियों के बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। चीफ जस्टिस का कहना है कि ऐसा होने से आरक्षण दिए जाने की मूल भावना कमजोर होती है।
टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में भारत के मुख्य न्यायधीश ने ये बात कही है। उन्होंने तर्क दिया कि उच्च पदों पर बैठे एससी/एसटी अधिकारियों के बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए, जब वे पहले ही सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त हो चुके हैं। यह बयान सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ के विचार-विमर्श के दौरान आया, जिसमें आरक्षण नीति की समीक्षा की जा रही थी।
क्या है क्रीमीलेयर कोटा?
संविधान के तहत क्रीमी लेयर वे लोग होते हैं, जो कि सामाजिक और आर्थिक तौर पर दूसरों की तुलना में अधिक संपन्न होते हैं। फिर चाहे वो अर्थ हो या शिक्षा का क्षेत्र। चीफ जस्टिस का मानना है कि अगर क्रीमीलेयर को आरक्षण की सुविधा से वंचित किया जाता है तो बाकियों को भी आगे बढ़ने का मौका मिलेगा। उदाहरण के तौर पर एक आईएएस या आईपीएस अधिकारी की संतान, जो कि पहले से ही सक्षम और सुविधा संपन्न है, अगर उसे आरक्षण मिलता है तो वो असली जरूरमंदों को प्रभावित कर सकता है।
क्रीमीलेयर पर बहस क्यों?
क्रीमीलेयर पर बहस आजकल इसलिए हो रही है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की पीठ वर्तमान में आरक्षण से संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इस दौरान यह सवाल उठा कि क्या एससी-एसटी समुदायों में क्रीमी लेयर की अवधारणा को अनिवार्य किया जाना चाहिए, जैसा कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए पहले से लागू है। सीजेआई ने इस मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श की जरूरत पर बल दिया। ताकि समाज में समानता लाई जा सके।
न्यायिक आतंकवाद पर कही बड़ी बात
इसके साथ ही चीफ जस्टिस गवई ने न्यायिक आतंकवाद के मुद्दे पर भी बात की। उन्होंने न्यायिक अतिक्रमण को गंभीर मामला बताते हुए कहा कि न्यायिक सक्रियता बनी रहनी चाहिए, लेकिन इसे न्यायिक आतंकवाद या दुस्साहस नहीं बनना चाहिए। क्योंकि संसद कानून बनाती है, कार्यपालिका उसे लागू करती है और न्यायपालिका उसका संवैधानिक अनुपालन सुनिश्चित करने का काम करती है। सीमाओं का अतिक्रमण संतुलन को बिगाड़ देगा। चीफ जस्टिस ने कहा कि केवल एक कानूनी दस्तावेज ही नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का साधन भी है।
















