आपातकाल ‍@50 : हिटलर-गांधी : आपातकाल के ‘गौरव’
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आपातकाल @50 – हिटलर-गांधी : आपातकाल के ‘गौरव’

आपातकाल के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तर प्रदेश-बिहार के क्षेत्र प्रचारक रहे श्री रज्जू भैया को पुलिस गिरफ्तार करने के लिए ढूंढती रही, लेकिन वे पुलिस वालों को चकमा देते रहे। रज्जू भैया वेश बदल कर पुलिस के पहरे में बैठे लोगों से भी मिलते थे। उस समय उन्होंने अपना नाम गौरव रख लिया था

Written byहरि मंगलहरि मंगल
Jun 25, 2025, 09:55 am IST
inभारत, विश्लेषण, संघ @100
प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया

प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया

इस वर्ष आपातकाल लगे और इंदिरा के अलोकतांत्रिक शासन के 50 साल पूरे हो गए। 25 जून, 1975 को देश में आपातकाल लागू हुआ था। इस दिन को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काले दिवस के रूप में याद किया जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने सत्ता में बने रहने के लिए देश में आपातकाल लागू किया था। आपातकाल लागू होने के बाद नागरिक अधिकार निलम्बित कर दिए गए, बड़ी संख्या में राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल दिया गया। इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता भी इंदिरा गांधी के कोपभाजन का शिकार हुए।

हरि मंगल
वरिष्ठ पत्रकार

आपातकाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। पूरे देश में संघ के पदाधिकारियों के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। तमाम सक्रिय पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं पर ‘आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम’ (मीसा) लगा दिया गया। बौद्धिक नगरी प्रयागराज में संघ के पदाधिकारी और कार्यकर्ता कुछ ज्यादा ही सक्रिय थे तो प्रशासन ने वहां भी बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया।

संघ के उत्तर प्रदेश-बिहार के तत्कालीन क्षेत्र प्रचारक प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया, जिनकी कर्मभूमि प्रयागराज रही है, को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस लगातार खोज रही थी, लेकिन वे न केवल पहचान छिपा कर और स्थान बदल कर गिरफ्तारी से बचते रहे, अपितु संघ के कार्यकर्ताओं को आपातकाल के विरोध में संगठित और उत्साहित करते रहे। रज्जू भैया के मित्र वीरेन्द्र कुमार सिंह चौधरी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विख्यात अधिवक्ता होने के साथ ही संघ के पदाधिकारी थे, उनको भी प्रशासन ने नैनी जेल में बंद कर दिया था।

आपातकाल में अमानवीय यातनाओं का ऐसा दौर चल रहा था कि कोई अपना सगा-संबंधी भी किसी से मिलने का साहस नहीं कर पा रहा था, लेकिन रज्जू भैया बहुत ही निडरता से संगठन और कार्यकर्ताओं के लिए समर्पित रहे। रज्जू भैया के साहस से जुड़े तमाम किस्से वीरेन्द्र जी की यादों में थे। रज्जू भैया की निडरता का एक किस्सा इलाहाबाद उच्च न्यायालय से जुड़ा है। आपातकाल में श्री वीरेन्द्र चौधरी ने उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर रखी थी जिस पर बहस हेतु न्यायालय उन्हें नियत तारीख पर बुलाता था।

चौधरी जब न्यायालय आते तो बड़ी संख्या में पुलिस बल के साथ स्थानीय खुफिया विभाग के लोग उनके आसपास होते, ताकि कोई राजनीतिक व्यक्ति या संघ के लोग उनसे मिल न सकें। एक दिन श्री चौधरी अपने अधिवक्ता कक्ष में बैठ कर याचिका में बुलावे की प्रतीक्षा कर रहे थे, तभी एक वकील साहब पूर्ण वेश में गाउन और नेक बैंड लगाए तेजी से कक्ष में घुसे और उच्च स्वर में कहने लगे, “कानपुर से अभी अपने वकालत के कार्य से आया था। आप दिख गए, तो अंदर आ गया। आपके यहां मैंने कुछ वर्ष पूर्व एक मुकदमा भेजा था, आपने उसमें स्थगन आदेश भी करवा दिया था।”

चौधरी जी आगंतुक की वेशभूषा और चाल-ढाल देख कर अपने मस्तिष्क पर जोर डालने लगे कि ये कौन वकील साहब हैं, इनका कौन सा-मुकदमा था, तभी उन्होंने तपाक से कहा, ‘मेरा नाम गौरव है।’ चौधरी जी हतप्रभ रह गए और बोले-‘अरे गौरव!’ ये गौरव और कोई नहीं, रज्जू भैया थे। बता दें कि आपातकाल में पुलिस की पकड़ से दूर चल रहे रज्जू भैया का आपस में बातचीत के लिए छद्म नाम गौरव रखा गया था। बस चौधरी जी ने रज्जू भैया से हाथ मिला कर वकील के लहजे में बात प्रारंभ कर दी। वे कहने लगे, “आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई। मुझे आपके द्वारा भेजा गया वह प्रकरण याद है।” रज्जू भैया भी उस समय यही चाहते थे। बस दोनों लोग संगठन और कार्यकर्ताओं के बारे में बात करते रहे। कक्ष के बाहर पुलिस वाले अपनी ड्यूटी कर रहे थे और अंदर रज्जू भैया निश्चिंत भाव से बातें करते रहे। रज्जू भैया जिस साहस और निडरता से उच्च न्यायालय में चौधरी से मिलने आए थे, उसकी चर्चा अब भी होती है।

एक और किस्सा प्रयागराज के स्वरूपरानी अस्पताल के ‘मीसा वार्ड’ से जुड़ा है। नैनी जेल में लगभग एक साल तक रहने के बाद श्री चौधरी को सिर में तेज दर्द रहने लगा। पहले तो प्रशासन ने गंभीरता से नहीं लिया। इलाज के लिए टालमटोल करता रहा। दरअसल, प्रशासन को लग रहा था कि जेल से बाहर जाने का बहाना बनाया जा रहा है, लेकिन दबाव बना तो उन्हें स्वरूपरानी अस्पताल के ‘मीसा वार्ड’ में भर्ती किया गया। चिकित्सकों ने परीक्षण में पाया कि उन्हें माइग्रेन है। इस कारण उन्हें एक माह तक अस्पताल में ही रखा गया।

मीसा बंदियों के वार्ड के बाहर पुलिस का कड़ा पहरा रहता था। मिलने के लिए आने वाले कम ही लोग होते थे, जो आते वे शाम को टहलते समय ही मिल लेते। रज्जू भैया को पता चला तो वे भी एक दिन गौरव बनकर बड़े ही निर्भीक और अलग अंदाज में मिलने पहुंच गए। पुलिस वालों को जरा सा आभास नहीं हुआ कि जिसकी गिरफ्तारी का वारंट लेकर पुलिस खोज रही है वह मीसा बंदी से मिल कर चला गया। आज भले ही रज्जू भैया हम सबके बीच नहीं हैं, लेकिन प्रयागराज में उनके साहस की कहानियों की चर्चा अब भी होती है। आपातकाल का समय आते ही संघ विचार परिवार के कार्यकर्ता रज्जू भैया को याद कर हैं। उनके साहस और वाक्पटुता के किस्से सुन हतप्रभ रह जाते हैं।

Topics: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघइंदिरा गांधीआपातकालउच्च न्यायालयरज्जू भैयापाञ्चजन्य विशेषभारतीय लोकतंत्रनैनी जेल
हरि मंगल
हरि मंगल
वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार। संस्कृति के जानकार। विभिन्न समाचार पत्रों में लेख प्रकाशित। [Read more]
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