जबलपुर से हुआ झंडा सत्याग्रह का श्रीगणेश, फिर भारत में मना झंडा दिवस
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जबलपुर से हुआ झंडा सत्याग्रह का श्रीगणेश, फिर भारत में मना झंडा दिवस

जबलपुर से 18 मार्च 1923 को झंडा सत्याग्रह का शुभारंभ हुआ, और नागपुर से इसने व्यापक रूप लिया, जिसका 18 जून 1923 को "झंडा दिवस" के रुप में देशव्यापीकरण हुआ और मनाया गया था

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Jun 18, 2025, 08:42 pm IST
inमध्य प्रदेश
तिरंगा झंडा थामे सत्याग्रही

तिरंगा झंडा थामे सत्याग्रही

“झंडा” किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता और सत्ता का सर्वोच्च प्रतीक है,इसलिए तो स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस – राष्ट्रीय पर्व में क्रमशः ध्वजारोहण और ध्वज फहराया जाता है,इसलिए भारतीय तिरंगे झंडे का महत्व समझा जाना चाहिए उसे फैशन की वस्तु नहीं समझना चाहिए – वर्ष में केवल दो दिन ही झंडे का महत्व नहीं है।

तिरंगे को फहराने के लिए जबलपुर से ही सर्वप्रथम “झंडा सत्याग्रह” का शुभारंभ हुआ और जिसका संपूर्ण भारत में विस्तार हुआ, परंतु कितना संघर्ष हुआ जब जबलपुर में यूनियन जैक की जगह तिरंगा फहराया गया। अत्यंत गर्व और गौरव का विषय है कि जबलपुर से 18 मार्च 1923 को झंडा सत्याग्रह का शुभारंभ हुआ, और नागपुर से इसने व्यापक रूप लिया, जिसका 18 जून 1923 को “झंडा दिवस” के रुप में देशव्यापीकरण हुआ और मनाया गया था।

झंडा सत्याग्रह की पृष्ठभूमि और इतिहास आरंभ अक्टूबर 1922 से ही हो गया था जब असहयोग आंदोलन की सफलता और प्रतिवेदन के लिए कांग्रेस ने एक जांच समिति बनाई थी और वह जबलपुर पहुंची तब समिति के सदस्यों को विक्टोरिया टाऊन हाल में अभिनंदन पत्र भेंट किया गया और तिरंगा झंडा (उन दिनों चक्र की जगह चरखा होता था) भी फहरा दिया गया। समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरें इंग्लैंड की संसद तक पहुंच गईं… हंगामा हुआ और भारतीय मामलों के सचिव विंटरटन ने सफाई देते हुए आश्वस्त किया कि अब भारत में किसी भी शासकीय या अर्धशासकीय इमारत पर तिरंगा नहीं फहराया जाएगा। इसी पृष्ठभूमि ने झंडा सत्याग्रह को जन्म दिया।

दबाव के बावजूद यूनियन जैक नहीं फहराया

मार्च 1923 को पुनः कांग्रेस की एक दूसरी समिति रचनात्मक कार्यों की जानकारी लेने जबलपुर आई जिसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी, जमना लाल बजाज और देवदास गांधी प्रमुख थे। सभी को मानपत्र देने हेतु म्युनिसिपल कमेटी प्रस्ताव कर डिप्टी कमिश्नर किस्मेट लेलैंड ब्रुअर हेमिल्टन को पत्र लिखकर टाऊन हाल पर झंडा फहराने की अनुमति मांगी लेकिन हेमिल्टन ने कहा कि साथ में यूनियन जैक भी फहराया जाएगा। इस बात पर म्युनिसिपैलटी के अध्यक्ष कंछेदी लाल जैन तैयार नहीं हुए। इसी बीच नगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पं. सुंदरलाल ने जनता को आंदोलित किया कि टाऊन हाल में तिरंगा अवश्य फहराया जाएगा। तिथि 18 मार्च तय की गई क्योंकि महात्मा गांधी को 18 मार्च 1922 को जेल भेजा गया था और 18 मार्च 1923 को एक वर्ष पूर्ण हो रहा था।

350 सत्याग्रही टाऊन हाल पहुंचे

18 मार्च को पं. सुंदरलाल की अगुवाई पं. बालमुकुंद त्रिपाठी, बद्रीनाथ दुबे जी, श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान,माखन लाल चतुर्वेदी, एवं नाथूराम मोदी जी के साथ लगभग 350 सत्याग्रही टाऊन हाल पहुंचे और उस्ताद प्रेमचंद ने अपने 3 साथियों सीताराम जादव, परमानन्द जैन और खुशालचंद्र जैन ने मिलकर टाऊन हाल पर तिरंगा झंडा फहराया दिया। कैप्टन बंबावाले ने लाठीचार्ज करा दिया जिसमें सीताराम जादव के दांत तक टूट गए थे। सभी को गिरफ्तार किया और तिरंगा को पैरों तले कुचल कर जब्त कर लिया। अगले दिन पं सुंदरलाल जी को छोड़कर सभी मुक्त कर दिए गए। इन्हें 6 माह का कारावास हुआ। उसके बाद से इन्हें तपस्वी सुंदरलाल जी के नाम से जाना जाने लगा। इस सफलता के उपरांत उत्साहित होकर नागपुर से व्यापक स्तर पर झंडा सत्याग्रह का आरंभ एवं प्रसार लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में हुआ, जिसमें जबलपुर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने न केवल भाग लिया वरन् गिरफ्तारी भी दी।

नागपुर में सत्याग्रह पर सरदार पटेल

सुभद्रा कुमारी चौहान ने दी गिरफ्तारी

श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान भारत की पहली महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थीं जिन्होंने झंडा सत्याग्रह में अपनी गिरफ्तारी दी। 18 जून को झंडा सत्याग्रह का देशव्यापीकरण हुआ और झंडा दिवस मनाया गया। झंडा सत्याग्रह व्यापक स्तर पर फैल गया और आखिरकार 17 अगस्त 1923 को 110 दिनों के संघर्ष उपरांत अपना लक्ष्य प्राप्त कर झंडा सत्याग्रह वापस ले लिया गया। इस समझौते के अंतर्गत राष्ट्रीय झंडे को ले जाने का अधिकार प्राप्त हुआ और नागपुर के सत्याग्रही मुक्त कर दिए गए परंतु जबलपुर के सत्याग्रही अपनी पूरी सजा काटकर ही वापस आए। जिसमें नाथूराम मोदी दृढ़ संकल्प के प्रतीक रहे और उन्हें 1923 के झंडा सत्याग्रह में डेढ़ वर्ष का सश्रम कारावास हुआ।

1265 सत्याग्रहियों को कारावास की सजा भुगतनी पड़ी

कारावास की कठिन यातनाओं के कारण इनके रक्त में खराबी उत्पन्न हो जाने पर जेल से छूटने के बाद अधिक समय तक जीवित न रह सके। हिंदी भाषी मध्य प्रदेश से 1265 सत्याग्रहियों को कारावास की सजा भुगतनी पड़ी। इस तरह भारत के स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रीय झंडे की मानरक्षा और फहराने का श्रेय जबलपुर के महान् स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को जाता है।

 

Topics: जबलपुर समाचारJabalpurझंडा सत्याग्रह18 जून झंडा दिवसजबलपुर में झंडा सत्याग्रहFlag Satyagraha
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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