विश्व पर्यावरण दिवस : भारतीय शास्त्रों में प्रकृति पूजन, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और पर्यावरण संरक्षण की परंपरा
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विश्व पर्यावरण दिवस : भारतीय शास्त्रों में प्रकृति पूजन, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और पर्यावरण संरक्षण की परंपरा

विश्व पर्यावरण दिवस प्रतिवर्ष 5 जून को मनाया जाता है। इस दिन दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अभियान, कार्यक्रम, पौधारोपण, स्वच्छता अभियान और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

Written byJyotsnaa G BansalJyotsnaa G Bansal
Jun 5, 2025, 10:26 am IST
in भारत
World Environment Day

World Environment Day

विश्व पर्यावरण दिवस प्रतिवर्ष 5 जून को मनाया जाता है। इस दिन दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अभियान, कार्यक्रम, पौधारोपण, स्वच्छता अभियान और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, ताकि मनुष्य अपने जीवन और प्रकृति के बीच के संबंध को समझे और उसके संरक्षण की दिशा में सक्रिय हो। 2025 में विश्व पर्यावरण दिवस प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करने पर केंद्रित होगा।

आज जब पूरी दुनिया त्रिस्तरीय वैश्विक पर्यावरण संकट-

जलवायु परिवर्तन (पृथ्वी का लगातार बढ़ता तापमान )

प्राकृतिक संसाधनों की कमी- (अंधाधुंध वनों की कटाई, विलुप्त होती वन्य प्रजातियाँ, भूमि की घटती उर्वरता)

प्रदूषण और कचरा संकट (जल, वायु और मिट्टी प्रदूषण, औद्योगिक कचरा, रासायनिक अपशिष्ट, प्लास्टिक प्रदूषण)- जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब भारतीय शास्त्रों में हजारों साल पहले दी गई पर्यावरण-हितकारी शिक्षाएं और परंपराएं फिर से प्रासंगिक और प्रेरणास्पद हो गई हैं।

वेदों, उपनिषदों और पुराणों में प्रकृति को माता के रूप में पूजने की परंपरा रही है। भूमि को ‘माता’ के रूप में, नदियों को देवियाँ एवं वृक्षों को जीवनदायिनी माना गया है। हमारी संस्कृति में जीवन का आधार ही जल, वायु, भूमि और अग्नि आदि प्रकृति के पंचतत्वों को माना गया है।

अथर्ववेद में कहा गया है – “यह पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।”

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ — यानी पूरी धरती को एक परिवार मानने का भाव — यह सिखाता है कि मनुष्य को न केवल दूसरों से बल्कि पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों और समस्त जीवों से भी प्रेम और संरक्षण का संबंध रखना चाहिए। भारतीय संस्कृति में पर्यावरण के साथ सह-अस्तित्व और संतुलन की भावना को मानवधर्म का हिस्सा माना गया है।

भारतीय संस्कृति में नदियों को देवियों के समान पूजनीय समझा गया है। गंगा, यमुना, सरस्वती आदि नदियों का वर्णन पवित्रता, पुण्य और जीवनदायिनी शक्ति के प्रतीक के रूप में मिलता है। हमारे वेद, उपनिषद और पुराणों में इन नदियों की महिमा गाई गई है; कहा गया है कि जल ही आनन्द और जीवन का स्रोत है – सभी पौधे, जीव-जंतु और यहाँ तक कि पर्वत और पृथ्वी भी जल से बने हुए हैं। नदियों का जल स्नान, उपासना और दान-पुण्य से तुल्य माना गया है। साथ ही शास्त्र जल को शुद्ध रखने की हिदायत देते हैं और पानी को गंदा करना बड़ा पाप माना गया है- “जो तालाब, कुआँ या सरोवर के जल को दूषित करता है, वह नरक को जाता है”।

वैदिक काल से ही वृक्षों को जीवन की आधारशिला माना गया है। सभी प्रकार के पक्षी और जंतु वृक्षों में आश्रय लेते हैं, हमारा भोजन और ऑक्सीजन वृक्षों से ही मिलता है। वृक्षारोपण को भारतीय वैदिक संस्कृति में अत्यंत पुण्य एवं धार्मिक कर्तव्य माना गया है। यह केवल पर्यावरणीय संतुलन या आर्थिक लाभ का साधन नहीं, बल्कि धार्मिक, आध्यात्मिक और नैतिक जिम्मेदारी का भी प्रतीक है। वैदिक साहित्य और शास्त्रों में वृक्षों को देवतुल्य माना गया है — जो प्राणवायु, छाया, फल-फूल और औषधियाँ प्रदान कर समस्त जीवों के जीवन का आधार बनते हैं।

मत्स्य पुराण में वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण की भावना — पार्वतीजी की वाणी के माध्यम से मत्स्य पुराण (अध्याय 154) में देवी पार्वती ने जलविहीन स्थानों में कुएँ, बावड़ियाँ और सरोवर बनवाने तथा पर्यावरण संरक्षण के महत्व को अत्यंत भावपूर्ण और व्यावहारिक तरीके से प्रस्तुत किया है। उन्होंने पर्यावरणीय दृष्टिकोण से जल-स्रोतों और वृक्षों की तुलना करते हुए बताया-

“दस कुओं के बराबर एक बावड़ी होती है, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब होता है दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है। यही लोकों का कल्याण करनेवाली मर्यादा है, जिसे मैं निर्धारित कर रही हूं।”

यह श्लोक जल संचयन और जल स्रोतों का निर्माण के साथ ही वृक्षारोपण के महत्व को दर्शाता है, जिसमें एक वृक्ष को दस पुत्रों के बराबर माना गया है। यह दृष्टिकोण भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण और वृक्षों के चिरकालीन महत्व को रेखांकित करता है।

पार्वतीजी स्वयं इस मर्यादा को ‘लोकों के कल्याण की मर्यादा’ कहती हैं, अर्थात यह केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिस्थितिक उत्तरदायित्व है, जिसे आज के सन्दर्भ में भी पूरी तरह लागू किया जा सकता है।

यह स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति और शास्त्रों में हजारों वर्षों पहले ही पर्यावरण-संरक्षण की अवधारणाएँ विस्तार से प्रस्तुत की गई थीं। वृक्षारोपण, नदियों और जलस्रोतों का संरक्षण, भूमि की उर्वरता को बनाए रखना और समस्त प्रकृति को ईश्वर का स्वरूप मानना—ये सभी विचार हमारे वेदों, पुराणों और उपनिषदों में बार-बार व्यक्त हुए हैं। इसलिए जब आज हम विश्व पर्यावरण दिवस पर वृक्ष लगाने, जल स्रोत बचाने और प्रकृति के संरक्षण की बात करते हैं, तो यह कोई आधुनिक विचार नहीं, बल्कि हमारी प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा का ही आधुनिक-वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मार्गदर्शन है।

देवी पार्वती द्वारा वृक्ष को दस पुत्रों के बराबर पुण्यदायक बताना अथवा जलरहित स्थानों में कुएँ, बावड़ियाँ और सरोवर बनवाने की प्रशंसा—ये केवल धार्मिक कथन नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन के लिए अत्यंत वैज्ञानिक दृष्टिकोण हैं।

आज जब विश्व समुदाय “पुनर्वनीकरण Reforestation)”, “जल संरक्षण (Save Water)”, “प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा (Protect Nature)” जैसे अभियानों को आगे बढ़ा रहा है, तब यह समझना आवश्यक है कि इन आधुनिक पहलों की जड़ें हमारी प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में पहले से ही मौजूद हैं। इस विश्व पर्यावरण दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम न केवल अपने पूर्वजों की इस अमूल्य धरोहर पर गर्व करें, बल्कि उसके अनुरूप आचरण भी करें—वृक्ष लगाएँ, जल स्रोतों की रक्षा करें और धरती माता को पुनः हरा-भरा बनाएं। यही सच्चा “वसुधैव कुटुम्बकम्” का पालन होगा।

Topics: जल संरक्षणWorld Environment Dayपर्यावरण संरक्षणवसुधैव कुटुम्बकम्विश्व पर्यावरण दिवस 2025वृक्षारोपण का महत्वभारतीय ज्ञान परंपरा और पर्यावरण
Jyotsnaa G Bansal
Jyotsnaa G Bansal
Jyotsnaa G Bansal Reiki Grandmaster | Numerologist | IKS & Vedic Learner & Seeker | Author | Researcher | Columnist
  • Presented research papers from IKS (Purans, Ayurveda, Numerology, Chakra System etc.)at prestigious forums such as St. Stephen’s College (DU), Central Sanskrit University, Shri LalBahadur Shastri National Sanskrit University & many more.
  • Her paper features in First-10 out of the top 66 papers (from 300+ submissions) at DU Conference, unveiled by Hon’ble Education Minister Sh. Dharmendra Pradhan.
  • First female numerologist to publish Numerology research papers in International Journal of Applied Research (RJIF 8.4)
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  • Articles published in Newspapers, Magazines, Astrological Journals and Magazines.
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