वीर सावरकर : हिंदुत्व के तेज, तप और त्याग की प्रतिमूर्ति
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होम भारत

वीर सावरकर : हिंदुत्व के तेज, तप और त्याग की प्रतिमूर्ति

स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर की जयंती 28 मई पर विशेष लेख। वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बेकश्वर में बड़े-बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ। विदेशी वस्त्रों की पहली होली पुणे में 7 अक्टूबर 1905 को वीर सावरकर ने जलाई थी।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
May 28, 2025, 12:00 am IST
in भारत
वीर सावरकर

वीर सावरकर

स्व के आलोक में तप, त्याग और तितिक्षा जैसे गौरवशाली भारतीय मूल्यों को मिट्टी में गूंथकर यदि एक हिंदुत्व की मूर्ति गढ़ी जाए, तो उस मूर्ति का नाम होगा ‘वीर विनायक दामोदर सावरकर परंतु वीर सावरकर का नाम आते ही रंगे सियारों में दहशत का वातावरण निर्मित हो जाता है और हृदय की धड़कन तेज हो जाती हैं। कतिपय लोगों की तो हृदय गति ही रुकने लगती है।

प्रकारांतर से वीर सावरकर के स्वतंत्रता संग्राम योगदान और उनकी पवित्र आहुतियों पर बिना विचार विमर्श किए तथाकथित लोगों की जमात नकारात्मक विचारों को फैलाने की कोशिश करते हैं, परंतु दुर्भाग्य का विषय यह भी है कि मर्सी पिटिशन का क्या आशय है? और मर्सी पिटिशन क्यों लगाई गई? किसने लगवाई? इसे बिना जाने और समझे यह आरोप मढ़ दिया जाता है कि वीर सावरकर ने माफी मांग ली थी परंतु सच तो यह है कि गांधी जी ने कूटनीति के चलते विनायक दामोदर सावरकर को मर्सी पिटीशन के लिए तैयारी करवाई थी क्योंकि असहयोग आंदोलन सफल बनाना था।

सच तो यह है कि वीर सावरकर की दया याचिका पर चर्चा करने का कांग्रेस नेताओं का प्राथमिक उद्देश्य बीते समय में अपनी ही पार्टी के नेताओं मसलन पंडित नेहरू द्वारा दी गई दया याचिका को छिपाना है। ऐसे में एक यक्ष प्रश्न यही उठता है कि केवल सावरकर के माफीनामे का ही क्यों उल्लेख कर उनके प्रति तिरस्कृत व्यवहार किया जाता है? दया याचिका या ‘रॉयल ​​क्लेमेंसी’ अंग्रेजों द्वारा हिरासत में लिए गए आरोपी द्वारा अपनाई जाने वाली एक प्रक्रिया के अलावा और कुछ नहीं थी यह एक विशिष्ट प्रारूप था, जिसे प्रत्येक हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अपनी रिहाई के लिए आवेदन करते वक्त जरूरत पड़ती थी।

स्वघोषित इतिहासकार भी इस ऐतिहासिक किंतु शाब्दिक तथ्य से अच्छे से परिचित हैं, फिर भी अपमान और केवल वीर सावरकर का ही किया जाता है। यदि स्पष्टतः कहा जाए तो वीर सावरकर ने कभी भी अंग्रेजों से माफ़ी नहीं मांगी थी। जिस महापुरुष ने दस साल सेलुलर जेल की अमानवीय यातनाएं सही हों, उसके विषय में ‘माफीनामा’ या ‘दया याचिका’ बात करना आश्चर्यजनक लगता है।

वास्तविकता यह है कि आज तक हमें जिस माफीनामे के बारे में बताया जाता रहा है, वह केवल एक सामान्य सी याचिका थी, जिसे दाखिल करना राजनीतिक कैदियों के लिए एक सामान्य कानूनी विधान था। पारिख घोष जो कि महान क्रांतिकारी अरविंद घोष के भाई थे, शचीन्द्रनाथ सान्याल, जिन्होंने एच.आर.ए .का गठन किया था, इन सबने भी ऐसी ही याचिकाएं दायर की थीं और इनकी याचिकाए स्वीकार भी हुई थी।

जॉर्ज पंचम की भारत यात्रा और प्रथम विश्व युद्ध के बाद पूरी दुनिया में राजनीतिक बंदियों को अपने बचाव के लिए ऐसी सुविधाएं दी गयी थीं। सावरकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ‘जब-जब सरकार ने सहूलियत दी, तब-तब मैंने याचिका दायर की’। उन्होंने अपने छोटे भाई नारायण राव को जो पत्र लिखे, उनमें भी अपनी पिटिशन के बारे में लिखा है, कभी कुछ छुपाया नहीं। अगर आप फिर भी सावरकर को दोषी मानते हैं तो आपको स्वयं अपनी अंतरात्मा से पूछना चाहिए कि एक राजनीतिक बंदी के रूप में, अगर आप निरपराध जेल में बंद हों और सरकार आपको अपना बचाव करने का कोई एक मौका दे दे तो आप क्या करेंगे? क्या आप बंधन से मुक्त होना नहीं चाहेंगे?

वीर सावरकर ने भी अपनी याचिका इसीलिए दायर की थी कि कहीं वो भारत माता की स्वतंत्रता के दिव्य यज्ञ में आहुति डालने का कोई मौका चूक न जाएं। कहीं ऐसा न हो कि उनका जीवन जेल की सलाखों के पीछे ही फंसकर समाप्त हो जाए और भारतीय स्वतंत्रता का उनका महालक्ष्य अधूरा रह जाए। महात्मा गांधी ने भी 1920-21 में अपने पत्र ‘यंग इंडिया’ में वीर सावरकर के पक्ष में लेख लिखे थे।

गांधी जी का भी विचार था कि सावरकर को चाहिए कि वे अपनी मुक्ति के लिए सरकार को याचिका भेजें, इसमें कुछ भी बुरा नहीं है, क्योंकि स्वतंत्रता व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार है। और इसके बाद वीर सावरकर को 1921 में 10 साल की सजा काटने के बाद सेलुलर जेल से रिहा कर दिया गया था।

वीर सावरकर वही क्रांतिवीर हैं जिन्हें बरतानिया सरकार ने क्रांति के अपराध में काला-पानी का दंड देकर 50 वर्षों के लिए अंडमान की सेलुलर जेल भेज दिया था।

10 साल बाद जब वीर सावरकर काला-पानी की हृदय विदारक यातनाओं को झेलने के बाद जेल से बाहर आए, तब से हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवी उनके कृतित्व को भूलकर उन पर अंग्रेज़ों से माफ़ी मांगने का आरोप लगाते रहे हैं। इन सब षड्यंत्रों के बावजूद वीर सावरकर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर किसी प्रकार का प्रश्न चिन्ह नहीं लगता है क्योंकि यह सर्वश्रुत है कि सूरज की ओर मुंह करके थूंकने से, थूंक स्वयं के मुख पर आ गिरता है। यही स्थिति उनकी है जो वीर सावरकर की ओर उंगली उठाने की कोशिश करते हैं।

आधुनिक भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महामानव और हिंदुत्व के पुरोधा वीर विनायक दामोदर सावरकर की जयंती पर आज उनके जीवन के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं से रंगा एक संकलित चित्रफलक प्रस्तुत है।

वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी देशभक्त थे, जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में शोक सभा का विरोध किया और कहा कि वह हमारे शत्रु देश की रानी हैं हम शोक क्यों करें? क्या किसी भारतीय महापुरुष के निधन पर ब्रिटेन में शोक सभा हुई है? वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बेकश्वर में बड़े-बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ। विदेशी वस्त्रों की पहली होली पुणे में 7 अक्टूबर 1905 को वीर सावरकर ने जलाई थी।

वीर सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने विदेशी वस्त्रों का दहन किया तब बाल गंगाधर तिलक ने अपने पत्र केसरी में उनको शिवाजी के समान बताकर उनकी प्रशंसा की थी। जबकि इस घटना की दक्षिण अफ्रीका के अपने समाचार पत्र ‘इंडियन ओपिनियन’ में गांधी जी ने निंदा की थी। सावरकर द्वारा विदेशी वस्त्र दहन की इस प्रथम घटना के 16 वर्ष बाद गांधीजी उनके मार्ग पर चले और 11 जुलाई 1921 में मुंबई के परेल में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया।

वीर सावरकर पहले भारतीय थे, जिनको 1905 में विदेशी वस्त्र दहन के कारण पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज से निकाल दिया गया और ₹10 का जुर्माना किया। इसके विरोध में हड़ताल हुई, स्वयं तिलक जी ने केसरी पत्र में सावरकर के पक्ष में संपादकीय लिखा। वीर सावरकर ऐसे बैरिस्टर थे जिन्होंने 1909 में ब्रिटेन में परीक्षा पास करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफादार होने की शपथ नहीं ली, इस कारण उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नहीं दिया गया। वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा गदर कहे जाने वाले संघर्ष को सन् 1857 का स्वातंत्र्य समर नामक ग्रंथ लिखकर सिद्ध कर दिया।

वीर सावरकर ऐसे क्रांतिकारी लेखक थे जिनकी लिखी सन् 1857 का स्वातंत्र्य समर पुस्तक पर ब्रिटिश संसद में प्रकाशित होने से पहले प्रतिबंध लगाया था। सन् 1857 का स्वातंत्र्य समर भारत में भगत सिंह ने छपवाया था। जिसकी एक-एक प्रति ₹300 में बिकी थी।यह पुस्तक भारतीय क्रांतिकारियों के लिए पवित्र गीता थी। पुलिस छापों में देशभक्तों के घरों में यही पुस्तक मिलती थी। वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय 8 जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और फ्रांस पहुंच गए थे।

वीर सावरकर विश्व के पहले क्रांतिकारी और भारत के राष्ट्रभक्त थे जिनका मुकदमा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला, परंतु ब्रिटेन और फ्रांस की मिलीभगत के कारण उनको न्याय नहीं मिला और बंदी बनाकर भारत लाया गया।

वीर सावरकर विश्व के पहले क्रांतिकारी और भारत के पहले राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सरकार ने दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई थी। सावरकर पहले ऐसे देश भक्त थे, जो दो जन्म की कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले चलो ईसाई सत्ता ने हिंदू धर्म के पुनर्जन्म के सिद्धांत को मान लिया।

वीर सावरकर पहले राजनीतिक बंदी थे जिन्होंने काला पानी की सजा के समय 10 साल से भी अधिक समय तक स्वतंत्रता के लिए कोल्हू चलाकर 30 पौंड तेल प्रतिदिन निकाला। वीर सावरकर काला पानी में पहले ऐसे कैदी थे जिन्होंने काल कोठरी की दीवारों पर कंकर कोयले से कविताएं लिखीं और 6000 पंक्तियां याद रखीं।

वीर सावरकर पहले देशभक्त लेखक थे जिनकी लिखी हुई पुस्तकों पर आजादी के बाद कई वर्षों तक प्रतिबंध लगा रहा। वीर सावरकर पहले विद्वान लेखक थे जिन्होंने हिंदू को परिभाषित करते हुए लिखा कि
“आसिंधु सिंधुपर्यंता यस्य भारत भूमिका:,
पितृभू: पुण्यभूमिश्चेव स वै हिंदुरितीस्मृत:’
अर्थात समुद्र से हिमालय तक भारत भूमि जिसकी पितृभू है, जिसके पूर्वज यही पैदा हुए हैं व यही पुण्य भू है, जिसके तीर्थ भारत में ही हैं वही हिंदू है।

वीर सावरकर प्रथम राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सत्ता ने कई वर्षों तक जेल में रखा तथा आजादी के बाद 1948 में नेहरू सरकार ने गांधीजी के वध की आड़ में लाल किले में बंद रखा। परंतु न्यायालय द्वारा आरोप झूठे पाए जाने की बाद ससम्मान रिहा कर दिया। देसी- विदेशी दोनों सरकारों को उनके राष्ट्रवादी विचारों से डर लगता था।

वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जब 26 फरवरी सन् 1966 को उनका स्वर्गारोहण हुआ तब भारतीय संसद में कुछ सांसदों ने शोक प्रस्ताव रखा तो यह कहकर रोक दिया गया कि वे संसद सदस्य नहीं थे। जबकि चर्चिल की मौत पर शोक मनाया गया था। वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त स्वातंत्र्यवीर थे जिनके मरणोपरांत 26 फरवरी 2003 को उसी संसद में मूर्ति लगी जिसमें कभी उनके निधन पर शोक प्रस्ताव भी रोका गया था।

वीर सावरकर ऐसे पहले राष्ट्रवादी विचारक थे जिनके चित्र को संसद में लगाने से रोकने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष महोदया सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा लेकिन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने सुझाव पत्र नकार दिया और वीर सावरकर के चित्र का अनावरण राष्ट्रपति के कर कमलों से किया गया।

वीर सावरकर ऐसे राष्ट्रभक्त हुए जिनके शिलालेख को अंडमान की सेल्युलर जेल के कीर्ति स्तंभ से यूपीए सरकार के मंत्री मणिशंकर अय्यर ने हटवा दिया था और उसकी जगह गांधीजी का शिलालेख लगवा दिया था। वीर सावरकर ने 10 साल आजादी के लिए काला पानी में कोल्हू चलाया था ।

महान् स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी देशभक्त उच्च कोटि के साहित्य के रचनाकार, हिंदी – हिंदू- हिंदुस्तान के मित्र दाता, हिंदुत्व के सूत्रधार वीर विनायक दामोदर सावरकर पहले ऐसे भव्य- दिव्य पुरुष, भारत माता के सच्चे सपूत थे जिनसे अंग्रेजी सत्ता भयभीत थी। स्वाधीनता के बाद नेहरू की कांग्रेस सरकार भयभीत थी। परंतु श्रीमती इंदिरा गांधी वीर सावरकर की प्रशंसक थीं। वीर सावरकर मां भारती के पहले सपूत थे जिन्हें जीते जी और मरने के बाद भी आगे बढ़ने से रोका गया। परंतु आश्चर्य की बात यह है कि इन सभी विरोधियों के घोर अंधेरे को चीरकर आज वीर सावरकर के राष्ट्रवादी विचारों का सूर्योदय हो रहा है।

श्री रामावतार त्यागी जी की यह कविता वीर सावरकर के कृतित्व और व्यक्तित्व पर सटीक बैठती है।

“मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।
माँ तुम्‍हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊँ सजाकर भाल मैं जब भी,
कर दया स्‍वीकार लेना यह समर्पण।
गान अर्पित, प्राण अर्पित,
रक्‍त का कण-कण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।
माँज दो तलवार को, लाओ न देरी,
बाँध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी,
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी,
शीश पर आशीष की छाया धनेरी।
स्‍वप्‍न अर्पित, प्रश्‍न अर्पित,
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।
तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो,
गाँव मेरी, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो,
आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो,
और बाऍं हाथ में ध्‍वज को थमा दो।
सुमन अर्पित, चमन अर्पित,
नीड़ का तृण-तृण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।”

(डिस्क्लेमर- स्वतंत्र लेखन। ये लेखक के निजी विचार हैं, जरूरी नहीं कि पाञ्चजन्य इससे सहमत हो)

Topics: veer savarkarवीर सावरकरसावरकर जयंतीकौन थे वीर सावरकरकाला पानी की सजाअंदमान की सेलुलर जेल1857 का स्वतंत्रता समर
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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