बांग्लादेश में शेख हसीना की अवामी लीग की गतिविधियां प्रतिबंधित: क्या इस्लामिक शासन की औपचारिक शुरुआत?
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बांग्लादेश में शेख हसीना की अवामी लीग की गतिविधियां प्रतिबंधित: क्या इस्लामिक शासन की औपचारिक शुरुआत?

बांग्लादेश में अवामी लीग पर प्रतिबंध से कट्टरपंथी ताकतें मजबूत हो रही हैं। शेख हसीना की पार्टी पर रोक के पीछे क्या है धार्मिक या राजनीतिक कारण?

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
May 13, 2025, 11:44 am IST
inविश्व, विश्लेषण
awami league ban in Bangladesh

मुहम्मद यूनुस (बाएं) और शेख हसीना वाजेद

जहाँ एक ओर पाकिस्तान की सेना अपने आप को यह साबित कर रही है कि जिहाद से वह पीछे नहीं हटती है, तो वहीं अब तक कथित रूप से धर्मनिरपेक्ष माने जाने वाले बांग्लादेश से भी ऐसे समाचार आ रहे हैं, जो यह बता रहे हैं कि बांग्लादेश भी अब औपचारिक रूप से कट्टरपंथ की ओर चल पड़ा है।

जहां एक ओर लोग यह देख रहे हैं कि कैसे पाकिस्तान की सेना और आतंकवादियों के बीच भेद मिट गया है तो वहीं बांग्लादेश में भी राजनीतिक दल और मजहबी कट्टरपंथी पार्टियों के बीच का सारा भेद मिटने जा रहा है, क्योंकि बांग्लादेश को बांग्लादेश की पहचान दिलाने वाली अवामी लीग पर मोहम्मद यूनुस की सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है।

हालांकि, यह प्रतिबंध कहा जा रहा है कि कुछ समय के लिए है। कुछ समय अर्थात यह तब तक रहेगा जब तक इंटेरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल एक्ट के अंतर्गत हजारों आंदोलनकारियों की मौत पर शेख हसीना और उनकी पार्टी पर मुकदमा चल रहा है और यह समाप्त नहीं हो जाता। अवामी लीग की छात्र शाखा बांग्लादेश छात्र लीग पर अक्टूबर में पहले ही प्रतिबंध लग चुका है। उसे आतंकी संगठन का तमगा देकर यह प्रतिबंध लगाया था।

बांग्लादेश की अवामी लीग के प्रति मोहम्मद यूनुस सरकार की और उनके सहयोगियों की घृणा किसलिए है, अब यह समझना कठिन नहीं रह गया है। यह शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर्रहमान ही थे, जिन्होंने पाकिस्तान द्वारा अपने ही नागरिकों पर किये जा रहे अत्याचारों के विरोध में बांग्लादेश के लिए आंदोलन किया था और भारत की सहायता से एक आजाद मुल्क पाया था, जिसका आधार इस्लाम तो था ही, परंतु भाषा भी थी।

चूंकि अत्याचार का आधार भाषा थी, इसलिए जो मुल्क नया बना उसमें भाषाई पहचान ही मुख्य पहचान रही। हालांकि उस भाषाई पहचान के साथ इस्लाम की पहचान भी मुख्य थी और यही कारण है कि सरकार कोई भी रही हो, बांग्लादेश के हिंदुओं के साथ अत्याचार हर सरकार में होते रहे। फिर भी अवामी लीग की छवि काफी हद तक धर्मनिरपेक्ष रही थी।

ऐसा माना जाता है कि हिन्दू अवामी लीग के स्वाभाविक समर्थक हैं और यही कारण है कि जब शेख हसीना देश छोड़कर गईं तो हिंदुओं पर हुए हमलों को धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों से प्रेरित बताया। बांग्लादेश ने बार-बार यही कहा कि हिंदुओं पर हिंसा तो हुई हैं, परंतु उनका कारण राजनीतिक है क्योंकि हिन्दू अवामी लीग के समर्थक हैं और अवामी लीग के प्रति लोगों के दिल में गुस्सा था। 

मगर अवामी लीग के प्रति इतना गुस्सा क्यों है कि देश की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में उसे भाग ही लेने नहीं दिया जा रहा है? उसे प्रतिबंधित कर दिया गया है? दरअसल शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग बांग्लादेश को उस पहचान से दूर करती है, जो उसने मुस्लिम लीग की स्थापना के समय हासिल की थी।

इस प्रतिबंध से नोबल विजेता मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि अब नया बांग्लादेश बनेगा। इस नए बांग्लादेश में उसका वह इतिहास शामिल नहीं होगा, जो उसने वर्ष 1971 में हासिल किया था, बल्कि उसका वही इतिहास होगा जो वर्ष 1906 से आरंभ हुआ था और जिसकी परिणिती 1947 में पूर्वी पाकिस्तान के रूप में हुई थी।

कई कट्टरपंथी दल यूनुस सरकार से यह मांग कर रहे थे कि शेख हसीना की पार्टी को चुनावों में भाग लेने से रोका जाए और सड़कों पर आंदोलन भी कर रहे थे। वे मोहम्मद यूनुस को ऐसा न करने पर परिणाम भुगतने की धमकी भी दे रहे थे। अब चूंकि इस दबाव के कारण मोहम्मद यूनुस ने शेख हसीना की पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया है, तो यह मान लिया जाना चाहिए कि अब मोहम्मद यूनुस की सरकार ने बांग्लादेश को पूरी तरह से इस्लामिक देश बनाने की तरफ औपचारिक कदम बढ़ा दिया है।

हमने अपने लेखों में लगातार इसी बात का उल्लेख किया कि शेख हसीना को देश से निकाला जाना कोई राजनीतिक कारणवश नहीं था, बल्कि वह एक पहचान की लड़ाई थी, और उसी महजबी पहचान की स्थापना की लड़ाई थी, जो 1906 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना के साथ हासिल की थी और जिसे शेख मुजीबुर्रहमान ने वर्ष 1971 में उस मुल्क से छीन लिया था। शानबाग में शनिवार को इस बात के लिए आंदोलन जारी रहा था कि अवामी लीग को प्रतिबंधित किया जाए। सबसे हैरानी की बात यह है कि इस विरोध प्रदर्शन में कुछ लोगों ने जब बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान गाना चाहा, तो उन्हें रोक दिया गया था।

अवामी लीग पर प्रतिबंध की मांग करने वालों में मुफ्ती जसिमुद्दीन रहमानी भी शामिल था। यह एक कट्टरपंथी मौलाना है, जिसे एक समय में अमेरिका आधारित आतंकवाद विरोधी प्रोजेक्ट द्वारा चरमपंथ फैलाने के रूप में गिरफ्तार किया गया था, क्योंकि वह अलकायदा का समर्थन कारणए वाले अनवर अल अवलकी का समर्थक था। उसने भी शेख हसीना के खिलाफ रैली की थी और भड़काऊ और उकसाने वाले भाषण दिए थे। उसने सरकार को चेतावनी दी थी कि अगर वह अवामी लीग को प्रतिबंधित नहीं करेगी तो लोग मामला अपने हाथ में ले लेंगे।

नव गठित पार्टी नेशनल सिटिज़न पार्टी के नेताओं ने इस विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया था, मगर उन्होनें रहमानी से दूरी बना ली थी। उन्होंने कहा कि न ही रहमानी को बुलाया गया था और न ही उनके पास यह अधिकार है कि वह रहमानी को वहाँ से हटा सकें। एनसीपी वह पार्टी है जो कथित छात्र आंदोलन के नेताओं ने बनाई है। यह स्पष्ट है कि कथित छात्र आंदोलन के नेता जिन्होनें शेख हसीना को हटाने में मुख्य भूमिका निभाई थी और अलकायदा का समर्थन करने वाले सभी एक मंच पर शेख हसीना की पार्टी को प्रतिबंधित करने के लिए आए हैं। और यूनुस सरकार इन धमकियों के आगे पूरी तरह से झुक गई है और उसने अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया है।

Topics: अवामी लीगIslamic identityमोहम्मद यूनुसMohammad Yunusfundamentalistsकट्टरपंथीawami leagueBangladeshHindu attacksमुस्लिम लीगहिंदू हमलेबांग्लादेशइस्लामिक पहचानशेख हसीनाSheikh Hasina
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