आज सुबह (1 अप्रैल) सूचना मिली कि डॉ. कमल किशोर गोयनका जी नहीं रहे। वे कुछ समय से अस्वस्थ थे। उम्र के 85 वर्ष पार कर चुके थे। आयुजनित शारीरिक अस्वस्थता स्वभाविक थी। उनकी स्मृति में लिखने बैठा तो एक वर्ष कौंधा दिमाग में 1992। वर्तमान तेलंगाना और तब के आंध्र प्रदेश में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् का राष्ट्रीय अधिवेशन था। दिल्ली से, ट्रेन से मैं, डॉ. सत्यपाल चुघ, जीत सिंह जीत, आनंद आदीश, डॉ. कमल किशोर गोयनका सभी साथ चले। ट्रेन की यात्रा थी, रास्ते में सह-यात्री जुड़ते गए, किंतु दिल्ली से जो विषय शुरू हुआ वह नहीं बदला। डॉ. सत्यपाल चुघ ने भी हिंदी उपन्यासों पर काम किया था। गोयनका जी ने भी प्रेमचंद के अध्ययन से शुरुआत की थी। पूरी यात्रा में गोयनका जी प्रेमचंद को वामपंथी बनाने के विश्वविद्यालयीय तर्क का खंडन करते रहे। प्रमाण देते रहे। सत्यपाल जी भोले और भावुक थे। गोयनका जी के तर्क शांत होते और सत्यपाल जी की प्रतिक्रिया भावुकतापूर्ण होती। बाद में ट्रेन यात्रा में देवेंद्र दीपक जी भी जुड़े, पर यह पूरी यात्रा ‘प्रेमचंद यात्रा’ में बदल गई।
गोयनका जी का निवास दिल्ली के अशोक विहार क्षेत्र में था। इसी अशोक विहार में दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल महाविद्यालय से सेवानिवृत्ति के उपरांत डॉ. सत्यपाल चुघ का भी रहना हुआ। डॉ. सत्यपाल का घर हिंदी की राष्ट्रीय सांस्कृतिक वैचारिकी से जुड़े लोगों का स्थायी पता बना। 1996 में गोयनका जी ही मुझे तब के जाकिर हुसैन स्नातकोत्तर सांध्य महाविद्यालय का रास्ता दिखाने वाले बने। गोयनका जी के मन में कुछ बातों को लेकर अक्सर पीड़ा रहती थी। पहली पीड़ा थी विश्वविद्यालयीय उच्च शिक्षा में वामपंथी वर्चस्व। दूसरी पीड़ा थी बड़े साहित्यकारों को चयनित और पूर्वाग्रह प्रेरित उदाहरणों से वामपंथी सिद्ध करने का कुटिल बौद्धिक प्रयास। तीसरी पीड़ा थी तथाकथित पंथनिरपेक्ष पैकेजिंग में मुस्लिम सांप्रदायिकता की प्रस्तुति। चौथी पीड़ा थी कि उनके अपने कहे जाने वाले लोग उन्हें समझते नहीं।
गोयनका जी के साथ तब के जाकिर हुसैन स्नातकोत्तर सांध्य महाविद्यालय में मुझे सहकर्मी होने का अवसर मिला। शाम का कॉलेज था। हम दोनों क्लास खत्म होन पर कमला मार्किट थाने के पास 901 नंबर बस पकड़ने जाते थे। इन्हीं दिनों 1995-96 में दयाप्रकाश सिन्हा जी से परिचय हुआ। दयाप्रकाश जी भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय में बैठा करते थे। कॉलेज शुरू होने से पहले दयाप्रकश जी का 11, अशोक रोड स्थित कमरा अपना नया अड्डा बना। वहां भी प्रेमचंद, विश्वविद्यालय आदि ही होता रहता था। हां, दयाप्रकाश जी के होने से उसमें नाटक भी जुड़ गया। प्रेमचंद के संबंध में गोयनका जी के पास प्रामाणिक जानकारी थी। प्रेमचंद की कहानियों, लेखों, व्यक्तिगत सूचनाओं का अज्ञात पक्ष गोयनका जी को उपलब्ध था।
गोयनका जी ने इस प्रामाणिक सूचना का यथासंभव उपयोग प्रेमचंद को वामपंथी छाया से निकालने के लिए किया। कालांतर में मॉरीशस के भारतीय साहित्यकार अभिमन्यु अनत से मित्रता के उपरान्त प्रवासी भारतीय हिंदी लेखन में गोयनका जी की रुचि बढ़ी। गोयनका जी ने प्रवासी हिंदी लेखन की दिशा में प्रामाणिक कार्य भी किया। अपने पुत्र के पास, अमेरिका प्रवास के दिनों में ‘गांधी की पत्रकारिता’ पर गोयनका जी ने प्रामाणिक पुस्तक लिखी। गोयनका जी के प्रेमचंद भारतीयता के प्रेमचंद थे, हिंदू प्रेमचंद थे। गोयनका जी के ही शब्दों को उधार लें तो हिंदू होकर ही प्रेमचंद हुआ जा सकता है। होरी हिंदू है। घीसू और माधव हिंदू हैं। सूरदास हिंदू है। गोयनका जी की बौद्धिक कर्मठता हिंदी में वामपंथी बौद्धिक वर्चस्व का बौद्धिक प्रतिपक्ष रचने में सन्नद्ध रही। गोयनका जी को जानने वाले उनके बौद्धिक योगदान को भारत भाव के रूप में स्वीकारें, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
(लेखक कला संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं)















