गत 1 अप्रैल को नयी दिल्ली में प्रख्यात साहित्यकार डॉ. कमल किशोर गोयनका का निधन हो गया। यह हिंदी साहित्य-जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। वे प्रेमचंद-साहित्य के अप्रतिम मर्मज्ञ थे, परंतु उनका योगदान केवल प्रेमचंद तक सीमित नहीं था। उन्होंने हिंदी साहित्य का गंभीर शोध, आलोचना और प्रवासी हिंदी साहित्य के क्षेत्र में भी असाधारण कार्य किया।
डॉ. गोयनका चार दशक तक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक रहे और रीडर पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने पांच दशक से अधिक समय तक प्रेमचंद और अन्य लेखकों पर शोध किया। उनकी 62 पुस्तकों में से 36 प्रेमचंद पर केंद्रित हैं, जिससे वे ‘प्रेमचंद के बॉसवेल’ (जेम्स बाॅसवेल 18वीं सदी में एक प्रसिद्व जीवनीकार थे) के रूप में विख्यात हुए। उनकी खोजी दृष्टि ने प्रेमचंद-साहित्य की दशकों पुरानी धारणाओं को चुनौती दी और भारतीयता के व्यापक परिप्रेक्ष्य में उनकी पुनर्व्याख्या की। उन्होंने हिंदी साहित्य में ऐतिहासिक खोज का कार्य किया और लगभग 1,000 पृष्ठ के अज्ञात एवं दुर्लभ साहित्य, सैकड़ों मूल दस्तावेज, पत्र, पांडुलिपियां आदि को खोजकर प्रेमचंद के साहित्यिक स्वरूप को और अधिक प्रामाणिकता प्रदान की। उन्होंने प्रेमचंद को मार्क्सवादी विचारधारा के संकुचित दायरे से बाहर निकालकर उन्हें भारतीय आत्मा का साहित्यिक शिल्पी सिद्ध किया। यह हिंदी आलोचना के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन था।
गोयनका जी प्रेमचंद पर पीएच.डी. और डी.लिट्. करने वाले पहले शोधार्थी थे। उनके शोधग्रंथों ने प्रेमचंद के शिल्प और जीवन-दर्शन को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों का कालक्रम स्थापित किया और उनकी अज्ञात रचनाओं को खोजकर प्रकाशित किया। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित ‘प्रेमचंद कहानी रचनावली’ (छह खंड) और ‘नया मानसरोवर है’ (आठ खंड) उनके श्रमसाध्य शोध के प्रमाण हैं। उन्होंने ‘गोदान’ के दुर्लभ प्रथम संस्करण को पुन: प्रकाशित कराकर उसके मूल पाठ को सुरक्षित रखने का प्रयास किया। आलोचकों ने यहां तक कहा कि प्रेमचंद के पुत्र भी जो कार्य न कर सके, वह गोयनका जी ने कर दिखाया।
डॉ. गोयनका ने प्रेमचंद-जन्मशताब्दी पर राष्ट्रीय समिति बनाई और देश-विदेश में कार्यक्रम आयोजित किए। 1980 में वे मॉरीशस गए, जहां उनकी ‘प्रेमचंद प्रदर्शनी’ का उद्घाटन वहां के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम ने किया। उन्होंने दूरदर्शन के लिए प्रेमचंद पर वृत्तचित्र बनवाया और साहित्य अकादमी में ‘प्रेमचंद प्रदर्शनी’ का आयोजन किया।
प्रवासी हिंदी साहित्य को गोयनका जी का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में उनकी 12 पुस्तकें प्रकाशित हुईं और उन्होंने 40 से अधिक प्रवासी लेखकों की पुस्तकों की भूमिकाएं लिखीं। वे पांच विश्व हिंदी सम्मेलनों में भाग ले चुके थे और कई सरकारी विशेषज्ञ समितियों के सदस्य भी रहे। गांधी साहित्य पर भी उनका विशेष कार्य रहा। उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय पर पहली पुस्तक लिखी, जिसे बाद में नेशनल बुक ट्रस्ट ने पुन: प्रकाशित किया। डॉ. गोयनका लंबे समय तक ‘पाञ्चजन्य’ के लिए भी लिखते रहे। ऐसे साहित्य साधक को भावभीनी श्रद्धांजलि।













