फिल्मों के प्रख्यात अवार्ड समारोह ऑस्कर में फिलिस्तीन पर बनी डाक्यूमेन्ट्री No Other Land को सर्वश्रेष्ठ डाक्यूमेन्ट्री का अवार्ड मिला है। इसे निर्देशित करने वाले बासेल एडरा ने कहा कि फिलिस्तीन के लोगों की जातीय हत्याएं बंद होनी चाहिए।
यह डाक्यूमेन्ट्री वर्ष 2024 में बनी थी और इसके माध्यम से वेस्ट बैंक में इज़रायली सेना की गतिविधियों को दिखाया गया है। इसमें बासेल एडरा के दृष्टिकोण से वेस्ट बैंक में हो रही घटनाओं को दिखाया गया है। इजरायल ने उस जगह के फिलिस्तीनियों को यह आदेश दिया है कि वे सेना के प्रशिक्षण के मैदान के लिए जगह दें।
इसमें एक इज़रायली पत्रकार की भी भूमिका है। युवल अब्राहम, जो सिनेमेटोग्राफर रेचल सजोर के साथ वहां आता है और फिर उनके साथ मिलकर फिलिस्तीनियों की पीड़ा को उठाता है। इसमें स्कूलों, खेल के मैदानों का नष्ट होना दिखाया गया है और यह दिखाया गया है कि फिलिस्तीनी अधिकतर बिना हथियारों के हैं, उनके पास केवल सेलफोन कैमरा हैं और जिससे इजरायल के सैनिक नफरत करते हैं।
इस डाक्यूमेन्ट्री को मिले ऑस्कर के कारण जहां एक तरफ फिलिस्तीन समर्थकों में जश्न का माहौल है, तो वहीं इजरायल ने इस पर निराशा व्यक्त की है। इस डाक्यूमेन्ट्री को जब अवार्ड मिला तो अवार्ड लेने गए बासेल ने कहा कि वे हाल ही में पिता बने हैं और वे नहीं चाहते कि उनकी बेटी भी उसी असुरक्षा के माहौल में रहे, जिसमें वे रह रहे हैं। उन्होनें कहा कि वे दुनिया से अनुरोध करते हैं कि वे फिलिस्तीन के लोगों की जातीय हत्याओं को रोकने के लिए कदम उठाएं।
#Oscars2025 🇵🇸 @basel_adra: “We call on the world to take serious actions to stop the injustice and to stop the ethnic cleansing of the Palestinian people.” #NoOtherLand pic.twitter.com/2yVfryoAWC
— State of Palestine (@Palestine_UN) March 3, 2025
इजरायल के संस्कृति मंत्री ने इस डॉक्यूमेंट्री को अवार्ड मिलने को सिने जगत के लिए दुख का क्षण बताया। उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि
“फिल्म “नो अदर लैंड” के लिए ऑस्कर जीतना सिनेमा की दुनिया के लिए एक दुखद क्षण है। इजरायल की वास्तविकता की जटिलता को प्रस्तुत करने के बजाय, फिल्म निर्माताओं ने उन नैरेटिव को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना चुना जो अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने इजरायल की छवि को विकृत करती हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक महत्वपूर्ण मूल्य है, लेकिन इजरायल की बदनामी को अंतरराष्ट्रीय प्रचार के लिए एक उपकरण में बदलना कला नहीं है – यह इजरायल राज्य के खिलाफ षड्यन्त्र है, खासकर 7 अक्टूबर के जीनोसाइड और चल रहे युद्ध को ध्यान में रखते हुए।“
The Oscar win for the film "No Other Land" is a sad moment for the world of cinema. Instead of presenting the complexity of Israeli reality, the filmmakers chose to amplify narratives that distort Israel’s image vis-à-vis international audiences. Freedom of expression is an…
— Miki Zohar מיקי זוהר (@zoharm7) March 3, 2025
इजरायल के संस्कृति मंत्री मिकी जोहर ने यह बात बहुत महत्वपूर्ण कही है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक महत्वपूर्ण मूल्य है, मगर अंतर्राष्ट्रीय प्रचार के लिए इजरायल को बदनाम करना कहीं से भी कला नहीं है।
हालांकि यह फिल्म इजरायल को बदनाम करने के लिए और एकतरफा तस्वीर दिखाने के लिए फिलिस्तीनी नागरिकों के द्वारा प्रयोग की गई है, मगर भारत में एक दूसरी ही समस्या है। भारत में कला का प्रयोग भारत या कहें हिंदुओं के विरुद्ध अभियान चलाने के लिए काफी लंबे समय से प्रयोग किया जाता रहा है।
मिकी जोहर ने लिखा , “यही कारण है कि हमने राज्य-वित्तपोषित सिनेमा में सुधार पारित किया है – ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि करदाताओं का पैसा उन कलाकृतियों पर खर्च हो जो इजरायली दर्शकों से संवाद करती हों, न कि ऐसे उद्योग पर, जो वैश्विक मंच पर इजरायल को बदनाम करने पर अपना करियर बनाता हो।“
भारत में एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है, जिसने लगातार भारत की गलत छवि ही कला के माध्यम से प्रस्तुत की। अनेक फिल्में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कला के नाम पर ऐसी बनीं, जिसमें भारतीय सेना का गलत चित्रण किया गया। जिन फिल्मों ने भारत और भारत की सेना को खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया, उन्हें सराहा गया और जिन फिल्मों ने भारत की समकालीन वास्तविक चुनौतियों की बात की, उन्हें एजेंडा फिल्म बताया गया।
एक कश्मीरी छात्र के जीवन पर बनी फिल्म हैदर, जिसमें भारत और भारतीय सेना का गलत चित्रण किया गया था, उसे केवल सराहा ही नहीं गया, बल्कि उसे अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड भी मिले, तो वहीं एक कश्मीरी छात्र के इर्दगिर्द घूमती फिल्म कश्मीर फाइल्स को एजेंडा फिल्म कहा गया।
साथ ही, आतंकी संगठन आईएसआईएस की गिरफ्त में फँसने वाली भारतीय लड़कियों के जीवन पर बनी फिल्म, केरल स्टोरी, जिसने केवल भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक समस्या पर बात की थी, कि कैसे लड़कियों को प्यार के नाम पर निशाना बनाया जाता है, और कैसे उन्हें इस्तेमाल करके उनका धर्म बदलकर आतंकी ठिकानों पर भेजा जाता है, को एजेंडा फिल्म ही नहीं कहा गया, बल्कि उसे रिलीज होने से रुकवाने के लिए भी सतत प्रयास किये गए।
आज के युग में सिनेमा अपनी बात रखने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है, जिसका उपयोग बासेल ने किया और एक बहुत ही जटिल मामले को अपने नैरेटिव से बनाकर पेश किया और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति और मान्यता पाई, वहीं इजरायल को अत्याचारी बनाकर प्रस्तुत कर दिया गया।
यही कला की शक्ति होती है, हर नैरेटिव को पुष्ट करने के लिए कला की आवश्यकता होती है। मगर दुर्भाग्य यह है कि भारत में जब भारत के नैरेटिव को लेकर जो भी फिल्में बनती हैं, उन्हें एक बड़े वर्ग द्वारा एजेंडा कहकर किनारे करने की, और जब यह समझ मे आ जाए कि वे अब जनता को और बरगला नहीं सकते तो फिर कोर्ट में जाकर फिल्म रोकने का प्रयास किया जाता है, जैसे केरल स्टोरी के साथ हुआ या फिर जैसा भारत का पक्ष रखने वाली या फिर भारत विरोधियों के एजेंडे का पर्दाफाश करने वाली फिल्म के साथ होता है।

















