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अंतरिक्ष में ‘नाविक’ संसार

भारत अपनी स्वदेशी तकनीक के माध्यम से अंतरिक्ष में नित नए कीर्तिमान रच रहा है। ‘नेविगेशन सैटेलाइट मिशन’ (नाविक) बनेगा भारत की ताकत

Written byडॉ. निमिष कपूरडॉ. निमिष कपूर
Feb 21, 2025, 11:33 am IST
in भारत, विश्लेषण, विज्ञान और तकनीक
इसरो ने एनवीएस-02 सैटेलाइट का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया

इसरो ने एनवीएस-02 सैटेलाइट का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया

इसरो ने हाल ही में अपना 100वां मिशन पूरा किया और इसके साथ ही भारत अंतरिक्ष नेविगेशन में नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया। इस मिशन में इसरो ने अपने ‘नाविक’ मिशन के अंतर्गत एनवीएस-02 सैटेलाइट प्रक्षेपित किया है। नेविगेशन सैटेलाइट मिशन-‘नाविक’ इसरो द्वारा विकसित एक उपग्रह आधारित भारतीय नेविगेशनल प्रणाली है, यानी भारत का अपना जीपीएस है। अब नक्शों से लेकर मोबाइल-कम्प्यूटर पर समय तक के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। इस सफल मिशन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत बड़ी हस्तियों ने इसरो को बधाई दी है। इसरो ने 29 जनवरी, 2025 को प्रात: 6:23 बजे श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेश से जीएसएलवी-एफ15 रॉकेट के जरिए एनवीएस-02 सैटेलाइट का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया। यह प्रक्षेपण इसरो के नेविगेशन सैटेलाइट मिशन – नेविगेशन विथ इंडियन कन्स्टेलेशन (नाविक) के अंतर्गत किया गया। इसरो का यह 100वां प्रमोचन भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। नेविगेशन उपग्रह एनवीएस-2 नाविक शृंखला का दूसरा उपग्रह है। इस शृंखला में कुल पांच उपग्रह भेजे जाने हैं।

देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण

डॉ. निमिष कपूर
विज्ञान संचार विशेषज्ञ

भारत के अंतरिक्ष विशेषज्ञों के अनुसार, एनवीएस-02 उपग्रह के माध्यम से देश अपनी नेविगेशन सैटेलाइट (नाविक) प्रणाली को और सशक्त बनाएगा और विदेशी निर्भरता को पूरी तरह खत्म करेगा। इसरो का यह उपग्रह पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर आधारित है और इसे यूआर सैटेलाइट सेंटर (यूआरएससी) में डिजाइन, विकसित और तैयार किया गया है। नवंबर-दिसंबर 2024 के बीच इसका परीक्षण किया गया, जिसमें विभिन्न परिस्थितियों में इसकी कार्यकुशलता को जांचा गया।

इस उपग्रह में भारत के सटीक समय की जानकारी देने के लिए एक अत्याधुनिक परमाणु घड़ी भी लगाई गई है, जिसे रूबिडियम एटॉमिक फ्रीक्वेंसी स्टैंडर्ड के नाम से जाना जाता है। एनवीएस-02 सैटेलाइट दूसरी जनरेशन का नेविगेशन उपग्रह है और नेविगेशन विथ इंडियन कन्स्टेलेशन (नाविक) का हिस्सा है, जो ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम का क्षेत्रीय संस्करण है। यानी यह भारत का अपना नेविगेशन सिस्टम है। नेविगेशन सैटेलाइट मिशन के अंतर्गत भारत के स्वदेशी क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम को इसरो द्वारा विकसित किया गया है। इसे भारत और उसके आस-पास के 1500 किमी के क्षेत्र में सटीक स्थिति, वेग और समय सेवा प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है।

कैसे करेगा कार्य

नेविगेशन सैटेलाइट (नाविक) प्रणाली के अंतर्गत यह एनवीएस-02 उपग्रह दो प्रमुख प्रकार की सेवाएं प्रदान करेगा, जिसमें मानक स्थिति सेवा और प्रतिबंधित सेवा शामिल हैं। यह सिस्टम इतना सटीक होगा कि यह भारत की धरती पर 10 मीटर की दूरी तक की सही गणना बता देगा। यानी सैटेलाइट हर 10 मीटर के क्षेत्र पर निगाह रखेगा। भारत के बाहर यह 20 मीटर तक सटीक होगा। इसकी क्षमता भारत और आसपास के क्षेत्र में 1500 किलोमीटर तक होगी।

प्रतिबंधित सेवा केवल भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के लिए उपलब्ध होगी। इस सेवा का उपयोग उच्च सुरक्षा आवश्यकताओं वाले क्षेत्रों जैसे कि सेना, आपातकालीन सेवाएं और रणनीतिक कार्यों के लिए किया जाएगा। इन दोनों सेवाओं के माध्यम से नाविक भारत की उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणाली को नागरिक और सुरक्षा उद्देश्यों के लिए प्रभावी बनाता है।

क्यों आवश्यक था ‘नाविक’ मिशन

वर्तमान में, भारत को नक्शों से लेकर मोबाइल और कंप्यूटर पर समय तक के लिए विदेशी तकनीकों पर निर्भर रहना पड़ता है। भारत में सटीक स्थिति, गति और सही समय के लिए अब तक अमेरिका के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) या रूस के ग्लोनास पर निर्भरता रही है। दुनिया के प्रमुख देशों ने भी सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम के क्षेत्र में अपनी स्वायत्तता के लिए अलग प्रणालियां बनाई हैं, जैसे कि चीन का बाइडू और यूरोपीय संघ का गैलिलियो। भारत ने अपनी नाविक प्रणाली बनाने का निर्णय कूटनीतिक स्वतंत्रता के लिए लिया है। विदेशी शक्तियां तनावपूर्ण स्थितियों मेंअपने सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम को बंद कर सकती हैं। जैसे 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान भारत को उच्च गुणवत्ता वाले जीपीएस डेटा तक पहुंच से वंचित कर दिया गया था। उस समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत के सामरिक समुदाय के लिए जीपीएस का स्वदेशी संस्करण बनाने की बात कही थी। इस घटना के बाद 2006 में नाविक मिशन की शुरुआत हुई।

अब स्वदेशी तकनीक का राज

नेविगेशन सैटेलाइट और रॉकेट से जुड़ी शुरुआती चुनौतियां अब अतीत की बात हो चुकी हैं। पहली बार स्वदेशी नेविगेशनल प्रणाली – नाविक के सिग्नल प्राप्त करने और उन्हें संसाधित करने में सक्षम चिपसेट या माइक्रोचिप्स को अब अमरिका से न मंगवा कर भारतीय कंपनी द्वारा भारत में डिजाइन और निर्मित किया जाएगा। यह मिशन इसरो की तकनीकी क्षमताओं का प्रमाण है और भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता को दर्शाता है। इसरो के अनुसार उपग्रह की सभी प्रणालियां ठीक से काम कर रही हैं। इसरो से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस मिशन में एनवीएस-02 नेविगेशन उपग्रह को सफलतापूर्वक जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर आॅर्बिट में डाला जा चुका है। प्रक्षेपण यान के सभी चरणों ने शानदार प्रदर्शन किया है और उपग्रह को उच्च सटीकता के साथ निर्धारित कक्षा में स्थापित किया गया है। इसके बाद, उपग्रह पर लगे सौर पैनल भी सफलतापूर्वक खोले गए और ऊर्जा उत्पादन सामान्य रूप से हो रहा है। उपग्रह और पृथ्वी स्टेशन के बीच संचार स्थापित कर लिया गया है।

कुछ चुनौतियां अभी बाकी

हालांकि, कक्षा में उपग्रह को अंतिम निर्धारित स्थान पर पहुंचाने के लिए की जाने वाली कक्षा वृद्धि की प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी है। इसके कारण, उपग्रह के थ्रस्टर में ईंधन पहुंचाने के लिए जिम्मेदार वाल्व्स नहीं खुले हैं, जिससे कक्षा वृद्धि का कार्य नहीं हो सका है। आॅर्बिट बढ़ाने के लिए सैटेलाइट के इंजन में आक्सीडाइजर पहुंचाने वाले वॉल्व नहीं खुल पाए, जिसकी वजह से इसकी ऊंचाई बढ़ गई और आगे होने वाली कार्रवाई में मुश्किलें पैदा हो गईं। इसे जियोस्टेशनरी कक्षा में स्थापित किया जाना था। इसके तरल ईंधन इंजन में आई खराबी की वजह से अब इसे निर्धारित कक्षा में भेजने में दिक्कत आ रही है। अब, इसरो द्वारा उपग्रह का दीर्घवृत्तीय कक्षा में नेविगेशन कार्य के लिए उपयोग करने के लिए वैकल्पिक मिशन रणनीतियों पर काम किया जा रहा है।

वैश्विक नेविगेशन के लिए उपयोग

जैसा कि जीपीएस और ग्लोनास का उपयोग वैश्विक स्तर पर होता है, वैसे ही भारत का नाविक भी पृथ्वी के हर हिस्से में नेविगेशन और निगरानी के काम आएगा। यह सिर्फ भूमि क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समुद्र में जहाजों और अन्य गतिविधियों की निगरानी करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

विशेषज्ञों के अनुसार भारत को अपने नाविक सिस्टम को वैश्विक स्तर पर लागू करने के लिए पृथ्वी से लगभग 24,000 किलोमीटर ऊपर 24 सैटेलाइट्स का एक उपग्रह समूह स्थापित करना होगा, जो बड़े क्षेत्र को कवर कर सके। रिपोर्ट्स के अनुसार, इसरो ने केंद्र सरकार को पृथ्वी की मध्य कक्षा में 12 उपग्रह स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है, जिसके माध्यम से धीरे-धीरे नाविक का वैश्विक नेविगेशन के लिए उपयोग किया जा सकेगा।

भारत ने इस मिशन के तहत उपग्रहों को प्रक्षेपण करने की प्रक्रिया 2013 में शुरू की थी, जब उसने भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) के उपग्रह की शुरुआत की थी। 2013 से 2018 तक इस श्रेणी में कुल नौ उपग्रह प्रक्षेपित किए गए। इसके बाद भारत ने एनवीएस शृंखला के उपग्रह प्रक्षेपित करना आरंभ किया, जिसका उद्देश्य भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली को और अधिक सशक्त बनाना है। एनवीएस-2 इस श्रेणी का सबसे नया उपग्रह है। अब तक इस मिशन के अंतर्गत कुल 11 उपग्रह प्रक्षेपित किए गए हैं। इनमें से एक उपग्रह प्रक्षेपण सफल नहीं रहा था।

वर्तमान में, 10 उपग्रह अपनी कक्षाओं में कार्यरत हैं। छह उपग्रह पूरी तरह से कार्य कर रहे हैं, जबकि चार उपग्रह शॉर्ट मैसेज ब्रॉडकास्ट सेवाओं में उपयोग हो रहे हैं। भारत के सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम को फिलहाल सैन्य उपयोग के लिए सीमित रखा गया है और इसका मुख्य उद्देश्य कूटनीतिक क्षेत्र में काम आना है। हालांकि, एनवीएस सैटेलाइट्स की कक्षा में स्थापना के बाद नाविक सिस्टम और अधिक सशक्त होगा। एनवीएस श्रेणी की पांच सैटेलाइट्स के बाद यह उम्मीद की जा रही है कि नाविक सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम को नागरिकों के लिए भी उपलब्ध कराया जाएगा।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषनाविक मिशनNavICअत्याधुनिक परमाणु घड़ीNavigation with Indian Constellationरूबिडियम एटॉमिक फ्रीक्वेंसी स्टैंडर्डNavigation Satellite Mission100th MissionNVS-02 SatelliteIndian GPSPrime Minister Narendra Modiindia-navic-world-in-space-indigenous-technology-navigation-satellite-mission-isroस्वदेशी तकनीकनेविगेशन सैटेलाइट मिशनindigenous technologyअंतरिक्ष में नित नए कीर्तिमानISROभारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियां
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