लोकमंगल और लोकरंजन के लिये लोकसंपृक्त साहित्य की शाश्वत आवश्यकता है : हेमंत मुक्तिबोध
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लोकमंगल और लोकरंजन के लिये लोकसंपृक्त साहित्य की शाश्वत आवश्यकता है : हेमंत मुक्तिबोध

विश्व संवाद केंद्र द्वारा आयोजित नर्मदा साहित्य मंथन के अहिल्या पर्व का विचार मंथन के नये संकल्प के साथ समापन

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 6, 2025, 09:01 pm IST
inमध्य प्रदेश
नर्मदा साहित्य मंथन में विचार व्यक्त करते श्री हेमंत मुक्तिबोध।

नर्मदा साहित्य मंथन में विचार व्यक्त करते श्री हेमंत मुक्तिबोध।

इंदौर। विश्व संवाद केन्द्र मालवा द्वारा आयोजित नर्मदा साहित्य मंथन के चतुर्थ सोपान अहिल्या पर्व का समापन देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के सभागृह में संपन्न हुआ। समापन सत्र के प्रथम सत्र में पत्रकारिता के भारतीय तत्व पर परिचर्चा में वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री और जयदीप कर्णिक के साथ सोनाली नरगुंडे शामिल हुईं।

दूसरे सत्र में नर्मदा परिक्रमा पर मूर्धन्य लेखक अशोक जमनानी ने नर्मदा परिक्रमा के आध्यात्मिक एवं सामाजिक महात्म्य के साथ नर्मदा के पर्यावरणीय महत्व, लोकजीवन और लोक में नर्मदा के महत्व पर चर्चा की। इतिहास लेखन के इतिहास सत्र में श्रीकृष्ण श्रीवास्तव ने भारतीय इतिहास लेखन की त्रुटियों और उसके दूरगामी परिणामों की व्याख्या करते हुए भारतीय इतिहास के प्रामाणिक स्रोतों का उद्घाटन किया।

भारतीय ज्ञान परंपरा और विविध दृष्टिकोण विषय पर संवाद सत्र में श्री एम एस चैत्रा ने मैकॉले शिक्षा पद्घति द्वारा भारतीय ज्ञान परपंरा को प्रतिस्थापित करने के षड्यंत्रों को स्पष्ट किया एवं जीवन को आनन्द प्रदान करने वाली भारतीय ज्ञानपरंपरा को स्थापित करने एवं शोध की आवश्यकता पर बल दिया। नर्मदा साहित्य मंथन के समापन सत्र में वरिष्ठ साहित्यकार श्रीराम परिहार ने ज्ञान और कर्म के समन्वय की भारतीय परंपरा में संवाद और मंथन की पद्धति को प्रतिपादित किया। लोक मंगल के साहित्य की व्याख्या और प्रसार में नर्मदा साहित्य मंथन के प्रयासों को रेखांकित किया। भारत के पुनर्निर्माण के लिये अपनी मिट्टी से जुड़ने का आग्रह किया।

नर्मदा साहित्य मंथन में पुस्तक का विमोचन करते अतिथि।

समापन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र सह कार्यवाह हेमंत मुक्तिबोध ने विचार शून्यता के दौर में नर्मदा साहित्य मंथन की सार्थक भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि विचार विविधता की स्वीकृति और विचारों की विभिन्नता के आदर की संवाद परंपरा का ही विस्तार नर्मदा साहित्य मंथन है। हर प्रकार के विचार को सुनने और वैचारिक पाचन शक्ति बढ़ाने के लिये नर्मदा साहित्य मंथन हमारी संवाद का परंपरा है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में संवाद के द्वारा ज्ञान-भक्ति और कर्म का संदेश देने पश्चात भी अपने विचार को मानने के लिये बाध्य नहीं किया। आपने लोकमंगल की कामना करने वाले साहित्य की अधिकाधिक रचना और समाज में प्रचार-प्रसार के लिये साहित्य मंथन जैसे कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करने पर बल दिया। बहुजन हिताय के लिये लोकमंगल और लोकरंजन के लिये लोकसंपृक्त साहित्य की रचना समय की आवश्यकता है।

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय और कालिदास अकादमी के सहप्रायोजकत्ल में आयोजित नर्मदा साहित्य मंथन के विभिन्न सत्रों में 25 से अधिक पुस्तकों का विमोचन हुआ । मालवा-निमाड के विभिन्न नगरों और गाँवों से साहित्यानुरागी, विचारक, चिंतक, शोधार्थी और अध्येता इस नर्मदा साहित्य मंथन में सम्मिलित हुए।

सनातनी धर्म-संस्कृति से ही मार्क्सवादी हमलों से बचाव संभव

नर्मदा साहित्य मंथन ’अहिल्या पर्व’ के दूसरे दिन पहले सत्र में विचारक डॉ. पवन विजय ने ‘कल्चरल मार्क्सवाद का परिवारों पर प्रभाव’ विषय पर अपने विचार रखे। डॉ. विजय ने कहा, भारतीय समाज की चार प्रमुख इकाइयां हैं, जिन्हें हम विचार, धर्म, परिवार और समाज कहते हैं। इन चारों पर मार्क्सवादी लगातार हमले कर रहे हैं और इन हमलों का उद्देश्य केवल हमें कमजोर करना है। लैंगिक असमानता, समलैंगिकता और फैमिनिज्म जैसे मुद्दों को समाज में स्थापित करने की कोशिश हो रही है। साहित्य से लेकर फिल्मों को माध्यम बनाया जा रहा है। मार्क्सवादी हमारी संस्कृति के विरोध करने वाले तत्वों को सामाजिक व्यवस्था में एक एजेंडे के साथ स्थापित करने में लगे हुए है। मार्क्सवाद वास्तव में स्थापित व्यवस्था के खिलाफ बात करता है, जिसमें परिवारों को तोड़ना भी शामिल है। मार्क्सवाद वास्तव में एक मजहब है, एक रिलीजन है, जिसकी अपनी विचारधारा है। मार्क्सवाद का ही प्रभाव है कि हर नकारात्मक संस्कृति जैसे सिंगल पैरेंटिग, लिव इन, डिवोर्स सेलिब्रेशन को प्रमोट किया जा रहा है। मार्क्सवाद हमलों से हमें केवल हमारा धर्म, संस्कृति, मर्यादा, त्याग, धर्म, परंपरा ही बचा सकती है। परिवारों के मुखिया की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण है। इस सत्र का संचालन चेतन मीणा ने किया।

मां नर्मदा का पवित्र जल विश्वविद्यालय प्रांगण में लाया गया

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और जनसंचार अध्ययनशाला के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुए नर्मदा साहित्य मंथन में देशभर के साहित्यकार, चिंतक और विचारकों ने भाग लिया। तीन दिवसीय साहित्योत्सव के प्रथम दिन सर्वप्रथम मां अहिल्या के जीवन पर आधारित प्रदर्शनी का उद्घाटन इतिहासकार दिलीपसिंह जी जाधव एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक डॉ प्रकाश जी शास्त्री ने किया। इस अवसर पर महेश्वर से मां नर्मदा का पवित्र जल पूजन कर कलश में विश्वविद्यालय प्रांगण में लाया गया।

शास्त्रार्थ करते हुए सभी विचारों पर चर्चा होनी चाहिए

उद्घाटन सत्र में सर्वप्रथम मां नर्मदा जल कलश एवं मां सरस्वती की प्रतिमा के चरणों मे पुष्प अर्पण कर एवं दीप प्रज्वलन कर किया। नर्मदा साहित्य मंथन के संयोजक श्रीरंग पेण्ढारकर ने साहित्योत्सव नर्मदा साहित्य मंथन की भूमिका सभी के समक्ष रखी। सभा को सम्बोधित करते हुए देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कुलगुरू राकेश सिंघई ने नर्मदा के सांस्कृतिक एवं भौगोलिक महत्व को प्रतिपादित किया। उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारणी सदस्य सुरेश जी सोनी ने विचारों के खंडन-मंडन की भारतीय परंपरा विषय पर सम्बोधन में कहा कि अनुभूति के माध्यम से विचार एवं विचार के माध्यम से आचार को पुष्ट करना होगा, शास्त्रार्थ करते हुए सभी विचारों पर चर्चा होनी चाहिए, जिसमें से राष्ट्रीय विचारों की पुष्टता होनी चाहिए।

नर्मदा साहित्य मंथन में विचार व्यक्त करते श्री सुरेश सोनी जी।

श्याम जी मनावत ने “विश्व कल्याण में राम राज्य की भूमिका” विषय पर सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि रामराज्य के लिए प्रजा को भी राजा की तरह त्यागी एवं मर्यादित होना होगा। भारती ठाकुर ने “लोकमाता अहिल्याबाई होलकर का पुण्य प्रवाह” विषय के माध्यम से लोकमाता अहिल्या देवी के जीवन परिचय सभी के सामने रखा। क्षमा कौल ने “हिन्दू विस्थापन की पीड़ा” विषय पर कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के मार्मिक घटनाक्रम को सभी के सामने रखा। पांचवें सत्र में श्री गिरधरदान रतनू ने “हिन्दू संस्कृति सरंक्षण में मातृशक्तियों का योगदान” विषय पर ऐसी मातृशक्ति और लोकदेवियों के धर्मरक्षा, राष्ट्ररक्षा, गोरक्षा, पर्यावरण रक्षा में अनुपम योगदान का स्मरण किया।

समूह व परिचर्चा सत्र में विकास जी दवे ने “मंचीय कविता का वर्तमान परिदृश्य- चिंताएं एवं समाधान” विषय पर गौरव साक्षी, अमन अक्षर और देवकृष्ण व्यास के साथ परिसंवाद किया। परिसंवाद में मंचीय कविता के वर्तमान स्वरूप को लोकहित और राष्ट्रहित में मोड़ने के प्रयासों पर सभी ने चर्चा की। प्रथम दिवस का समापन पुण्यश्लोका नृत्यनाटिका के साथ हुआ।

 

Topics: विश्व संवाद केंद्रनर्मदा साहित्य मंथनमालवा प्रांत
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