बांग्लादेश की ढाका यूनिवर्सिटी में हिजाब के समर्थन में रैली, तस्लीमा नसरीन ने जताई निराशा
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बांग्लादेश की ढाका यूनिवर्सिटी में हिजाब के समर्थन में रैली, तस्लीमा नसरीन ने जताई निराशा

स्लीमा नसरीन ने सोशल मीडिया पर अपनी चिंता और क्रोध व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “बहुत से लोग कहते हैं कि औरतें ही औरतों की दुश्मन होती हैं। मैं आमतौर पर ऐसा नहीं मानती। लेकिन ढाका में हिजाब के पक्ष में मार्च करने वाली महिलाओं को देखकर मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि वे औरतों की दुश्मन हैं।“

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Feb 2, 2025, 06:47 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
Hijab Day hijab supporting rally in Bangladesh

ढाका विश्वविद्यालय में निकाली गई हिजाब समर्थित रैली (फोटो साभार: डेली ऑब्जर्वर)

Hijab Day: एक तरफ जहां ईरान और अफगानिस्तान जैसे देशों में मुस्लिम महिलाओं को हिजाब और परदे में कैद किया जा रहा है और ईरान में लगातार ही अनिवार्य हिजाब को लेकर महिलाएं प्रदर्शन कर रही हैं, तो वहीं यह और भी हैरानी की बात है कि जिन मुस्लिम देशों को कथित रूप से प्रगतिशील माना जाता हैं, वहां पर मुस्लिम लड़कियां हिजाब के समर्थन में रैली निकाल रही हैं। ऐसा ही बांग्लादेश में भी हो रहा है। वहां भी हिजाब डे मनाया जा रहा है।

दरअसल, 1 फरवरी को कथित रूप से हिजाब डे मनाया जाता है और इस दिन पूरे विश्व में हिजाब के समर्थन में कदम उठाए जाते हैं। हालांकि, हिजाब डे को लेकर विरोध करने वाली महिलाएं भी इस दिन हिजाब का विरोध करती हैं। शनिवार 1 फरवरी को बांग्लादेश की राजधानी ढाका में ढाका यूनिवर्सिटी के कैम्पस में हिजाब डे मनाया गया और एक शैक्षणिक संस्थान को हिजाब के बारे में प्रचार के लिए प्रयोग किया गया। ढाका यूनिवर्सिटी की आम छात्राओं ने हिजाबोफोबिया के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए एक रैली निकाली।

डेलीओब्सर्वर के अनुसार, इस रैली का आयोजन “प्रोटेस्ट अगेंस्ट हिजाबोफोबिया- ढाका यूनिवर्सिटी” द्वारा हिजाब से सम्बन्धित भेदभाव का विरोध करने के लिए किया गया था। इस अवसर पर काफी छात्राओं ने इस रैली में भाग लिया। इस रैली में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए एक छात्रा, मिश्कतुल जन्नत ने जागरूकता पर बल दिया और कहा कि जुलाई में हुई क्रान्ति के बाद उनके खिलाफ प्रोपोगेन्डा फैलाया जा रहा है और इतिहास को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है। उसने कहा कि अगर वे लोग अपना इतिहास नहीं जानेंगे, तो हिजाब डे जैसी घटनाएं लोग भुला देंगे। आयोजकों ने हिजाब और नकाब पहनने वाली लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पश्चिम हिजाब और नकाब के साथ ही दाढी वाले मुस्लिम आदमियों के प्रति भेदभाव करता है और उन्हें चरमपंथी के रूप में बताता है और हमारा उद्देश्य इन सभी प्रोपोगेन्डा को तोड़ना होना चाहिए।

इसे भी पढ़ें: Canada patient death: इलाज के इंतजार में कनाडा में मारे गए 15,000 से अधिक रोगी

जहां इस रैली में मुस्लिम समाज की मजहबी पहचान पर जोर दिया गया, उनकी तहजीबी नैरेटिव पर बात की गयी तो वहीं, इस रैली को लेकर बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने सोशल मीडिया पर अपनी चिंता और क्रोध व्यक्त किया।

उन्होंने एक्स पर लिखा, “शर्म, शर्म, शर्म!

मेरा सिर आज शर्म से झुक रहा है। आज मुझे अपने देश की महिलाओं के कारण शर्म का अनुभव हो रहा है।”

उन्होंने लिखा कि ईरान बांग्लादेश से बहुत दूर नहीं है। क्या ये महिलाएं यह नहीं जानतीं कि उनकी ही साथी मुस्लिम महिलाओं को ईरान में जबरन हिजाब के विरोध में विरोध प्रदर्शन करना पड़ रहा है। क्योंकि उनके देश में हिजाब विकल्प नहीं बाध्यता है। हजारों महिलाओं को जेल में डाला गया है, उन्हें पीट-पीट कर मार डाला गया है और वह भी किसलिए या तो उन्होंने हिजाब नहीं पहना था या सही से नहीं पहना था।”

उन्होंने आगे लिखा कि “बहुत से लोग कहते हैं कि औरतें ही औरतों की दुश्मन होती हैं। मैं आमतौर पर ऐसा नहीं मानती। लेकिन ढाका में हिजाब के पक्ष में मार्च करने वाली महिलाओं को देखकर मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि वे औरतों की दुश्मन हैं।“

ढाका में हिजाब के समर्थन में यह रैली पहचान की उसी लड़ाई की और एक और कदम है, जिसके विषय में हमने लगातार लिखा है कि अगस्त 2024 में शेख हसीना को देश से भगाने के लिए आन्दोलन दरअसल बांग्लादेश की मुस्लिम पहचान वाले मुल्क के लिए की गयी लड़ाई थी। शेख हसीना हिजाब की पहचान नहीं बल्कि साडी और पल्ले की पहचान की बात करती थीं, जो बांग्लादेश की महिलाओं की पोशाक हुआ करती थी। बांग्लादेश का ऐतिहासिक सन्दर्भ साड़ी की पहचान के साथ है न कि हिजाब के साथ, फिर ऐसे में हिजाब की पहचान के साथ बांग्लादेश की महिलाओं को जोड़ना उस पहचान के साथ सीधा संघर्ष है, जो वर्ष 1971 में बांग्लादेश ने हासिल की थी।

बांग्ला संस्कृति में हिजाब नहीं है, क्योंकि हिजाब इस भूमि की पहचान नहीं है, यदि ढाका यूनिवर्सिटी में हिजाबोफोबिया के खिलाफ प्रदर्शन किया जा रहा है, तो यह स्पष्ट होता है कि मुस्लिम मुल्क में हिजाबोफोबिया कैसे हो सकता है और यदि कोई ऐसी बात कर रहा है तो वह हिजाबोफोबिया की बात नहीं कर रहा है, बल्कि उस भूमि की अपनी पहचान पर हिजाब का अतिक्रमण कर रहा है।

तस्लीमा नसरीन ने लिखा कि एक समय था जब ढाका विश्वविद्यालय महिला मुक्ति का गढ़ था। आज, यह मदरसों से आए अज्ञानी, मजहबी रूप से ब्रेनवाश की गयी ज़ोम्बीज़ से भरा पड़ा है।“

Topics: BangladeshTaslima Nasreenबांग्लादेशतस्लीमा नसरीनहिजाब रैलीढाका यूनिवर्सिटी हिजाब रैलीHijab rallyDhaka University Hijab rally#hijabहिजाब
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